Wednesday, September 20, 2017

सर्वपितृ अमावस -नमन पुरखों को 

हम अपने पुरखों को ,कोटि कोटि करें नमन  ,
दौड़ रहा रग रग में ,अंश उनका अब भी है 
उनकी ही कृपा और आशीषों का फल है,
विकसित,फलफूल रहा वंश उनका अब भी है 
उनके ही भले करम और दिया दान धरम ,
का ही ये  परिणाम ,आज नाम और यश है 
आओ हम श्रद्धा से ,उनको दें श्रद्धांजलि ,
श्राद्ध करें ,क्योंकि आज ,सर्वपितृ मावस है 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, September 19, 2017

हम साथ साथ है 

बहुत उछाला, इक दूजे पर हमने कीचड़ 
बहुत गालियां दी आपस में आगे बढ़ बढ़ 
जो भड़ास थी मन में ,सारी निकल गयी है 
ये जुबान भी अब चुप है,कुछ संभल गयी है 
भाई भाई में ,खटपट तो चलती रहती  है 
जाने अनजाने  होती  गलती   रहती   है 
अहम और दुर्भाव हृदय से सभी निकाले 
बिखर न जाए,ये घर अपना ,इसे  संभाले 
छोड़ दुश्मनी,चलो मिला ले,हाथआज हम 
कल भी थे और सदा रहेंगे ,साथ साथ हम

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

Monday, September 11, 2017

अकेले जिंदगी जीना 

     किसी को क्या पता है कब ,
     बुलावा किसका  आ जाये 
     अकेले जिंदगी  जीना ,
     चलो अब सीख हम जाये 
अकेला था कभी मैं भी,
अकेली ही कभी थी तुम 
मिलाया हमको किस्मत ने ,
हमारा बंध गया  बंधन 
मिलन के पुष्प जब विकसे,
हमारी बगिया मुस्काई 
बढ़ा परिवार फिर अपना ,
और जीवन में बहार आई 
हुए बच्चे, बड़े होकर 
निकल आये जब उनके पर 
हमारा घोसला छोड़ा ,
बसाया उनने अपना घर 
        अकेले रह गए हमतुम ,
        मगर फिर भी न घबराये 
        अकेले जिंदगी जीना ,
       चलो अब सीख हम जाये 
हुआ चालू सफर फिर से,
अकेले जिंदगी पथ पर 
सहारे एक दूजे  के ,
आश्रित एक दूजे पर 
बड़ा सूना सा था रस्ता ,
बहुत विपदा थी राहों में 
गुजारी जिंदगी हमने ,
एक दूजे की बाहों में 
गिरा कोई जब थक कर ,
दूसरे ने उसे थामा  
कोई मुश्किल अगर आई 
कभी सीखा न घबराना 
       परेशानी में हम ,हरदम,
        एक दूजे के  काम आयें 
        अकेले जिंदगी जीना ,
        चलो अब सीख हम जाये 
ये तय है कोई हम में से,
जियेगा ,ले, जुदाई  गम 
मानसिक रूप से खुद को,
चलो तैयार कर ले हम 
तुम्हारी आँख में आंसूं ,
देख सकता कभी मैं ना  
अगर मैं जाऊं पहले तो ,
कसम है तुमको मत रोना 
रखूंगा खुद पे मैं काबू,
अगर पहले गयी जो तुम 
तुम्हारी याद में जीवन ,
काट लूँगा,यूं ही गुमसुम 
        मिलेंगे उस जहाँ में हम ,
        रखूंगा ,मन को समझाये 
       अकेले जिंदगी जीना ,
       चलो अब सीख हम जाये 
भले ही यूं अकेले में ,
लगेगा ना ,किसी का जी 
काटना वक़्त पर होगा ,
बड़ी मुश्किल से ,कैसे भी 
साथ में रहने की आदत ,
बड़ा हमको सतायेगी 
तुम्हारा ख्याल रखना ,
प्यार,झिड़की ,याद आयेगी 
सवेरे शाम पीना चाय 
तनहा ,बहुत अखरेगा 
दरद  तेरी जुदाई का ,
कभी आँखों से छलकेगा 
        पुरानी यादें आ आ कर ,
       भले ही दिल को तड़फाये 
       अकेले जिंदगी जीना ,
       चलो अब सीख हम जायें 

मदन मोहन बहती'घोटू'
उचकते है 

कुछ पैसे पा उचकते है 
कुछ कुर्सी पा उचकते है 
मिले जो सुंदरी  बीबी ,
कुछ खुश होकर उचकते है 
 कोई सुन्दर ,जवां लड़की ,
गुजरती जो नज़र आती 
झलक हलकी सी पाने को,
वो पागल से उचकते है 
किसी बेगानी शादी में ,
बने अब्दुल्ला दीवाने ,
उनकी फोटो भी आ जाए 
वो रह रह कर उचकते है 
ये पंजों से गले तक की,
उचकना एक कसरत है ,
कई व्यायाम के प्रेमी,
सवेरे से उचकते है
जहाँ कुछ देना होता है ,
वो चुपके से खिसक जाते,
हो लेना तो मुझे दे दो,
ये कह कह कर उचकते है 

घोटू  
क्या मैं न्याय कर पारहा हूँ?

मुझे मेरे माँ बाप ने मिल कर जन्म दिया 
बड़े ही प्यार से मेरा पालन पोषण  किया 
माँ ने ऊँगली पकड़ कर चलना सिखाया 
पिताजी ने जीवनपथ में संभलना सिखाया 
माँ ने उमड़ उमड़ कर बहुत सारा लाड़ लुटाया 
पिताजी ने डाट डाट कर अनुशासन सिखलाया 
उन्होंने पढ़ालिखा कर जिंदगी में 'सेटल'किया 
हर मुश्किल में  हाथ  थाम कर ,मुझे संबल दिया 
एक दिन पिताजी ना रहे ,एक दिन माँ भी ना रही  
उनके बिना जीवन में कुछ दिनों बड़ी बेचैनी रही
मैंने उनकी तस्वीर दीवार पर टांगी ,पर इंटीरियर 
डेकोरेटर की सलाह पर पत्नी ने उसे हटा दिया 
फिर पूजागृह में रखी पर मृत व्यक्तियों की तस्वीर 
पूजागृह में रखने से  ,वास्तुशास्त्री ने मना किया 
औरआजकल माताऔर पिताजी मेरी यादो में बंद है  
और उन दोनों की तस्वीरें ,कबाड़ के बक्से में बंद है 
पिताजी का नाम तो जब तक मैं जिन्दा हूँ ,जिंदा रहेगा 
क्योकि मेरे नाम के साथ वल्दियत में वो लिखा जा रहा है 
पर मेरी माँ ,जिसने मुझे नौ महीने तक  कोख में रखा ,
उनका नाम कभी भी,कहीं भी ,नज़र नहीं आ रहा है 
मैं वर्ष में दो बार ,एक उनकी पुण्यतिथि पर और एक श्राद्ध में ,
ब्राह्मण को भोजन करवा कर ,अपना कर्तव्य निभा रहा हूँ 
पर रह रह कर मेरा दिल मुझ से एक सवाल पूछता है  
कि क्या मैं सचमुच ,उनके साथ न्याय कर पा रहा हूँ?

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Saturday, September 9, 2017

कोई मगरूर हो जाये 

किसी नादान की बीबी,अगर जो हूर हो जाए 
पा माला मोतियों की ,बावला,लंगूर हो जाए 
मिले चूहे को चिन्दी ,और वो बजाज बन बैठे ,
बड़ा समझे बहुत खुदको,नशे में चूर हो जाए 
संभाले न संभल पाए ,खुदा की मेहरबानी जब ,
मिले तक़दीर से कुर्सी तो वो मगरूर हो जाए 
मेंढकी मारी ना जाती और तीरंदाज बन बैठे,
दिखाए खोखली ताक़त ,बड़ा ही शूर हो जाए 
करे वो बेतुकी बातें और हरकत पागलों जैसी ,
इसतरहअपनीआदत से जो वो मजबूर हो जाए 
जरूरी है दवाई और मलहम उसके घावों पर ,
कहीं ऐसा न हो एकदिन ,वो बढ़ नासूर हो जाए 
अगर लगाम जो उस पर,समय पर ना लगाईं तो,
बहुत मुमकिन हैअपनों से,वो इकदिन दूर हो जाए 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, September 7, 2017

न जाने कौन,कब किस दिन.... 

किसी से भी कभी यारों 
न  कोई  दुश्मनी पालो 
न जाने कौन,कब किस दिन ,तुम्हारे काम आ जाये  
मिटा दो मैल सब मन का 
भरोसा क्या है जीवन का ,
न जाने किस घडी ,इस जिंदगी की शाम आ जाये 
वही वो काम कर सकता ,
है  जिसका काम जो होता 
नहीं तलवार कर सकती,
सुई का काम  जो   होता 
दवा जब बेअसर होती,
टोटके काम कर जाते 
जो शेरो से नहीं डरते,
वो मच्छर से भी डर जाते 
करे कोई, भरे कोई 
दोष किसका,मरे कोई 
खतावार दूसरा हो पर ,तुम्हारा नाम आ जाये 
न जाने कौन कब किस दिन तुम्हारे काम आजाये 
कभी ये हो नहीं सकता 
कि सबसे दोस्ताना हो 
समझकर सोच कर परखो,
हाथ जिससे मिलाना  हो 
दोस्ती  गर न कर पाओ ,
करो ना दुश्मनी भी तुम 
बना कर जो नहीं रख्खो ,
करो ना अनबनी भी तुम 
मिलो तुम मुस्करा सबसे 
बुरा  सोचो  नहीं अब से 
बुराई करने वाले का ,बुरा अन्जाम  आ  जाये 
न जाने कौन कब किस दिन ,तुम्हारे काम आजाये  
कभी अनजान भी कोई ,
फरिश्ता बन के आता है 
मुसीबत में  ,मदद  देता 
सभी बिगड़ी बनाता  है 
ख़ुशी में होते सब शामिल,
कभी गम में सहारा दो 
किसी भी डूबते को तुम,
बचाओ और ,किनारा दो 
किसी के श्राप से तुम गर,
अहिल्या से बनो ,पत्थर ,
करे उद्धार तुम्हारा ,कोई बन राम आ जाये 
न जाने कौन कब किस दिन ,तुम्हारे काम आजाये 
ख़ुशी बांटो तो दूनी है ,
जो गम बांटो तो आधे है 
सफलताएं चरण छूती ,
अगर अच्छे इरादे है 
दुखाओ मत किसीका दिल,
कोई की बददुआ मत लो 
रखो विश्वास तुम खुद पर,
हौसला और हिम्मत लो 
आशीषें हो बुजुर्गों की 
फतह करवाती दुर्गों की 
तुम्हारी जीत निश्चित गर,कभी संग्राम आ जाये 
न जाने कौन कब किस दिन तुम्हारे काम आजाये 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'