Saturday, October 14, 2017

मेहमान 

उमर के एक अंतराल के बाद 
 एक कोख के जाये ,
और पले बढे जो एक साथ,
उन भाई बहनो के रिश्ते भी ,
इस तरह बदल जाते है 
कि जब वो कभी ,
 एक दूसरे के घर जाते है ,
तो मेहमान कहलाते है 
जिंदगी में  परिभाषाएं ,
इस तरह बदलती है 
अपनी ही जायी बेटी भी ,
शादी के बाद ,
हमे मेहमान लगती है 

घोटू 
बंटवारा 

जब हम छोटे होते है 
और घर में कोई चीज लाई जाती है 
तो सभी भाई बहनो में ,
बराबर बाँट कर खाई जाती है 
कोई झटपट का लेता है 
कोई बाद मे,सबको टुंगा टुंगा,
खाकर के  मजे लेता है 
बस इस तरह ,हँसते खेलते ,
जब हम बड़े होते है 
तब फिर होना शुरू झगड़े होते है  
एक दूसरे के छोटे हुए,
उतरे कपडे पहनने वाले ,अक्सर 
उतर आते है इतने निम्न स्तर पर 
कि समान 'डी एन ए 'के होते हुए भी ,
अपने अपने स्वार्थ में सिमट जाते है 
और बचपन में लाइ हुई चीजों की तरह ,
आपस में बंट जाते है 

घोटू 
रिश्ते 

जीवन के आरम्भ में ,
किसी के बेटे होते है आप 
और बढ़ते समय के साथ,
बन जाते है किसी के पति ,
और फिर किसी के बाप 
उमर जब बढ़ती है और ज्यादा 
तो आप बन जाते है ,
किसीके ससुर और किसी के दादा 
और इस तरह,
तरह तरह के रिश्ते निभाते हुए,
आप इतने थक जाते है 
कि तस्वीर बन कर ,
दीवार पर लटक कर ,
अपना अंतिम रिश्ता निभाते है 
 
 घोटू                             

Thursday, October 12, 2017

मैं गधे का गधा ही रहा 

मैं गधा था,गधे का गधा ही रहा ,
         गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी 
मै तो दीपक सा बस टिमटिमाता रहा ,
        तुम शीतल,चटक चांदनी बन गयी 
मैं तो कड़वा,हठीला रहा नीम ही,
     जिसकी पत्ती ,निबोली में कड़वास है 
पेड़ चन्दन का तुम बन गयी हो प्रिये ,
  जिसके कण कण में खुशबू है उच्छवास है 
मैं तो पायल सा खाता रहा ठोकरें ,
    तुम कमर से लिपट ,करघनी बन गयी 
मैं गधा था ,गधे का गधा ही रहा ,
       गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी 
मैं था तन्हा कुआँ,आयी पनिहारिने ,
     गगरियाअपनीअपनी सब भरती गयी 
तुम नदी की तरह यूं ठुमक कर चली,
        पाट  चौड़ा हुआ ,तुम संवरती गयी 
अपने पीतम का ' पी 'तुमने ऐसा पिया ,
     रह गया 'तम' मैं, तुम रौशनी बन गयी 
मैं गधा था,गधे का गधा ही रहा ,
        गाय थी तुम प्रिये, शेरनी बन गयी 
मैं तो रोता रहा,बोझा ढोता रहा ,
         बाल सर के उड़े, मैंने उफ़ ना करी 
तुम उड़ाती रही,सारी 'इनकम'मेरी,
        और उड़ती रही,सज संवर,बन परी   
मैं फटे बांस सा ,बेसुरा ही रहा,
          बांसुरी तुम मधुर रागिनी बन गयी
मैं गधा था ,गधे का गधा ही रहा,
          गाय थी तुम प्रिये ,शेरनी बन गयी           

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, October 11, 2017

अहमियत आपकी क्या है 

हमारी जिंदगानी में ,अहमियत आपकी क्या है 
खुदा की ये नियामत है,मोहब्बत आपकी क्या है 
कभी चंदा सी चमकीली ,कभी फूलों सी मुस्काती ,
आपसे मिल समझ आया कि दौलत प्यार की क्या है 
मेरे जीवन का हर मौसम,भरा है प्यार से हरदम,
बनाती लोहे को कुंदन,ये संगत  आपकी क्या  है 
अपनी तारीफ़ सुन कर के ,आपका मुस्कराना ये,
बिना बोले ,बता देता ,कि नीयत  आपकी क्या है 
सुहाना रूप मतवाला ,मुझे पागल बना डाला ,
गुलाबी ओठों को चूमूँ ,इजाजत आपकी क्या है 
कभी आँचल हटा देती,कभी बिजली गिरा देती,
इशारे बतला देते है कि हालत  आपकी  क्या है 
हो देवी तुम मोहब्बत की ,या फिर हो हूर जन्नत की,
बतादो हमको चुपके से, असलियत आपकी क्या है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
मुक्ती 

मैं जनम पत्रिकायें   दिखाता रहा ,
और ग्रहों की दशाएं बदलती रही 
पर दशा मेरी कुछ भी तो बदली नहीं ,
जिंदगी चलती ,वैसे ही चलती रही 
कोई ज्योतिष कहे ,दोष मंगल का है,
कोई पंडित कहे ,साढ़ेसाती चढ़ी 
कोई बोले चंदरमा ,तेरा नीच का,
उसपे राहु की दृष्टी है टेढ़ी पड़ी 
तो किसी ने कहा ,कालसर्प दोष है,
ठीक कर देंगे हम ,पूजा करवाइये 
कोई बोलै तेरा बुध कमजोर है ,
रोज पीपल पे जल जाके चढ़वाईये 
कोई बोलै कि लकड़ी का ले कोयला ,
बहते जल में बहा दो,हो जितना बजन 
दो लिटर तैल में ,देख अपनी शकल ,
दान छाया करो,मुश्किलें होगी कम 
मैं शुरू में  ग्रहों से था घबरा गया ,
पंडितों  था  इतना  डराया  मुझे 
मंहगे मंहगे नगों की अंगूठी दिला ,
सभी ने मन मुताबिक़ नचाया मुझे 
और होनी जो होना लिखा भाग्य में ,
वो समय पर सदाअपने घटता गया 
होता अच्छा जो कुछ तो उसे मुर्ख मैं ,
सब अंगूठी बदौलत ,समझता रहा 
रोज पूजा ,हवन और करम कांड  में ,
व्यर्थ दौलत मैं अपनी लुटाता रहा 
जब अकल आई तो ,अपनी नादानी पे,
खुद पे गुस्सा बहुत ,मुझको आता रहा 
उँगलियों की अंगूठी ,सभी फेंक दी ,
और करमकांड ,पूजा भी छोड़े सभी 
भ्रांतियों से हुआ ,मुक्त मानस मेरा ,
हाथ दूरी से पंडित से  जोड़े तभी 
और तबसे बहुत,हल्का महसूस मैं ,
कर रहा हूँ और सोता हूँ मैं चैन से 
रोक सकता न कोई विधि का लिखा,
जो भी घटता है,लेता उसे प्रेम से 
जबसे ज्योतिष और पंडित का चक्कर हटा ,
मन की शंकाये सारी निकलती गयी 
दूर मन के मेरे ,भ्रम सभी हो गए ,
जिंदगी जैसे चलनी थी,चलती रही 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

कज़िन मैं लैला की 

मजनू शहर के सारे 
लाइन मुझ पर  मारे 
मौका मिले है जब भी ,
नज़रें बचा के  ताड़े 
सारे के सारे बिचारे ,करे है ताकाझांकी 
मैं नार बड़ी अलबेली,कज़िन मैं लैला की 
मेरा रूप है सबसे निराला 
मेरे ओठों पर तिल काला 
मेरे जलवे और अदा ने ,
सबके दिल पर जादू डाला 
सारे  प्रोड्यूसर,फाइनेंसर ,
फिरते मेरे पीछे ,आगे 
सारे हीरो और एक्टर ,
मुझसे भीख प्यार की मांगे 
बैठे सब है आस लगाए 
कैसे  ये लड़की पट जाए 
मैं सबसे शोख हसीना हूँ फ़िल्मी दुनिया की 
हूँ  नार बड़ी अलबेली,कज़िन मैं  लैला की 
मुझको प्यार करे बच्चनजी 
मुझको धर्मेंदर जी घूरे 
बूढ़े होते सारे हीरो,
चाहे करना अरमां पूरे 
पीछे अभिषेक जी भागे,
संग संग सन्नी देवल दौड़े 
अरे पप्पा जी तो पप्पा, 
बेटे भी पीछा ना छोड़े 
सल्लू मियां और शाहरुख़ 
हसरत भर देखे मेरा मुख 
मैं सबको नाच नचाऊं ,बचा न कोई बाकी 
हूँ नार बड़ी अलबेली ,कज़िन  मैं लैला की 
मुझसे ऐश्वर्या है जलती 
कंगना राणावत भी जलती 
फिल्मो की सारी  हीरोइन ,
मेरे आगे हाथ है मलती 
कटरीना हो चाहे करीना ,
मुझ से रखती है सब द्वेष 
मेरा डंका देख प्रियंका ,
डर कर भागी ,गयी विदेश 
मुझको चाहत भरी नज़र से 
देखे सब विलेन,डर डर  के 
मैं डालूं न किसी को घास ,कसम है अम्मा की 
हूँ नार बड़ी अलबेली ,कज़िन मैं लैला की 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'