Wednesday, May 2, 2018

मेरी राधायें 

मेरे जीवन की कितनी ही राधायें 
रह रह कर के याद मुझे वो अक्सर आये 
मेरी पहली राधा मेरी पड़ोसिन थी 
जो नाजुक सी प्यारी,सुन्दर,कमसिन थी 
उसकी सभी अदाये होती दिलकश थी 
हाँ,वो ही मेरा सबसे पहला 'क्रश 'थी 
जिसे देख कर मुझको कुछ कुछ होता था 
मैं उसकी उल्फत के सपन संजोता था 
वो भी तिरछी नज़र डाल ,मुस्काती थी
 मेरे दिल पर छुरियां कई चलाती थी 
कभी पहल  मैं करता,नज़र झुकाती वो 
कभी पहल वो करती ,पर शर्माती वो 
चहल पहल होती थी लेकिन दूरी से 
मिलन हमारा हो न सका ,मजबूरी से 
उसकी चाहत में थे मेरे सपन रंगीले 
पर कुछ दिन में हाथ हो गए उसके पीले 
उस दिन पहली बार दिल मेरा टूटा था 
चखा प्यार का स्वाद ,किसी ने लूटा था
ये मन  मुश्किल  से समझा था ,समझाये 
मेरे जीवन की कितनी ही राधाये 
जो रह रह कर याद मुझे अक्सर आये 
दूजी राधा , सिस्टर जी  की सहेली थी 
उसे समझना मुश्किल ,कठिन पहेली थी
 यूं तो मुझको देख प्यार से मुस्काती 
पास जाओ तो बड़ा भाव थी वो खाती 
चंचल बड़ी ,चपल थी और सुहानी थी 
मैंने था तय किया कि वो पट जानी थी 
वेलेंटाइन डे पर उसे गुलाब दिया 
मंहगी मंहगी गिफ्टों से था लाद दिया 
इम्पोर्टेड चॉकलेट उसे थी  खिलवाई 
पर  वो लड़की ,मेरे काबू  ना आयी 
इसके पहले कि मैं आगे बढ़ पाता 
उसकी ऊँगली पकड़ ,कलाई पकड़ पाता 
मेरी प्यारी , सुंदर सी वो वेलेंटाइन 
हुई किसी लाला के घर की थी  लालाइन
और बह गए आंसूं में थे मेरे अरमां 
सुनते चार पांच बच्चों की है अब वो माँ  
सोचूं उसके बारे में ,तो मन तड़फाये 
मेरे जीवन की कितनी ही राधायें 
रह रह कर वो याद मुझे अक्सर आये 
कितनी राधायें ,यूं आयी जीवन में 
मीठी खट्टी यादें घोल गयी मन में 
था कोई का करना मस्ती मौज इरादा 
करने टाइम पास बनी थी कोई राधा 
कई बार हम खुद को समझे सैंया थे 
उन राधाओं के कितने ही कन्हैया थे 
लेकिन जो भी मिली वो सभी  राधाये 
जिनने पार करी  जीवन की बाधाएं 
कोई बन चुकी अब कोई की रुक्मण है 
कोई रम गयी,पूरी आज गृहस्थन है 
कोई  दुखी है अब तक अपने कंवारेपन में  
कोई रह रही  'लिविंग इन के  रिलेशन' में 
हमने अब राधा का चक्कर छोड़ दिया है 
फेरे ले ,रुक्मण संग ,मन को जोड़ लिया है 
अब समझे ,राधायें तो है आती,जाती 
पर रुक्मण ही जीवन भर का साथ निभाती 
बहुत सुख मिला ,उसको अपने हृदय बसाये 
फिर भी जीवन में आयी कितनी राधाये 
रह रह कर जो ,याद मुझे है अक्सर आये 

मदन मोहन बाहेती'घोटू '
हम ओ सी के वासी 

ये ही हमारा वृन्दावन है ,ये ही मथुरा ,काशी 
शांति,प्रेम का जीवन जीते ,हम ओसी के वासी 

वानप्रस्थ की उमर ,जवानी का जज्बा है सब में 
मन में सेवा भाव भरा है  और  आस्था रब  में 
राधाकृष्ण यहीं मंदिर में ,दुर्गा माँ और हनुमन 
भक्तिभाव में और कीर्तन में ,रमता है सबका मन 
शर्बत,छाछ छबीले लगते ,और होते  भंडारे 
जन्म दिवस की ख़ुशी मनाते है मिलजुल कर सारे 
खुल कर हँसते लाफिंगक्लब में,मन में नहीं उदासी 
शांति प्रेम का जीवन जीते ,हम ओसी के वासी
 
सुबह सुबह व्यायाम केंद्र में ,नित होती है कसरत 
काम सभी के सब आते है,जब भी पड़ती जरूरत 
क्रीड़ास्थल पर बच्चे  खेलें , और  गूंजे  किलकारी  
फव्वारों के पास मारती ,गप्पें ,महिला  सारी 
कोई सैर सवेरे करता ,कोई 'जिम' में जाता 
हमें यहाँ   दिखता हर चेहरा ,हँसता और मुस्काता 
खुशियां बरसे सदा,अमावस हो या पूरनमासी 
 शन्ति प्रेम का जीवन जीते ,हम ओसी के वासी 

मदन मोहन बाहेती ' घोटू '

Monday, April 30, 2018

पढ़ाना हमको आता है 

चने के झाड़ पर सबको, चढ़ाना हमको आता है 
कोई भी काम में टंगड़ी अड़ाना  हमको आता है 
भले ही खुद परीक्षा में ,हो चुके फैल हो लेकिन,
ज्ञान का पाठ औरों को ,पढ़ाना हमको आता है 
कोई की भी पतंग को जब ,देखते ऊंची है उड़ती ,
तो उसको काटने पेंचें ,लड़ाना हमको आता है 
किसी की साईकिल अच्छी ,अगर चलती नज़र आती ,
उसे पंक्चर करें ,कांटे गड़ाना हमको आता है 
बिना मतलब के ऊँगली कर मज़ा लेने की आदत है ,
बतंगड़ बात का करके ,बढ़ाना  हमको आता है 
न तो कुछ काम हम करते ,न करने देते औरों को ,
कमी औरों के कामो में ,दिखाना हमको आता है 
हमारे सुर में अपना सुर ,मिला देते है कुछ चमचे ,
यूं ही हल्ला मचाकर के सताना हमको आता है 

घोटू 
बुढ़ापा छाछ होता है 

दूध और जिंदगी का एक सा अंदाज होता  है 
जवानी दूध होती है , बुढ़ापा   छाछ  होता है
 
दूध सा मन जवानी में ,उबलता है ,उफनता है ,
पड़े शादी का जब जावन ,दही जैसा ये जमता है 
दही जब ये मथा जाता ,गृहस्थी वाली मथनी में 
तो मख्खन सब निकल जाता ,बदल जाता है जो घी में 
बटर जिससे निकल जाता ,बटर का मिल्क कहलाता 
जो बचता लस्सी या मठ्ठा , गुणों की खान बन जाता 
कभी चख कर तो देख तुम ,बड़ा ही स्वाद होता है 
जवानी दूध  होती है , बुढ़ापा  छाछ  होता है 

दूध से छाछ बनने के ,सफर में झेलता मुश्किल 
गमाता अपना मख्खन धन ,मगर बन जाता है काबिल 
न तो डर  डाइबिटीज का ,न क्लोरोस्ट्राल है बढ़ता 
बहुत आसानी से पचता ,उदर  को मिलती शीतलता 
खटाई से मिठाई तक ,करने पड़ते है समझौते 
बुढ़ापे तक ,अनुभवी बन,काम के हम बहुत होते 
पथ्य बनता ,बिमारी का कई, ईलाज होता है 
जवानी दूध होती है ,बुढ़ापा  छाछ  होता है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Wednesday, April 25, 2018

वो अब भी परी है 

मेरी बीबी अब भी ,जवानी भरी है 
सत्रह बरस की ,लगे छोकरी  है 
उम्र का नहीं कोई उसमे असर है ,
निगाहों में मेरी वो अब भी परी है
 
भले जाल जुल्फों का ,छिछला हुआ है 
भले पेट भी थोड़ा ,निकला हुआ है 
हुई थोड़ी मोटी  ,वजन भी बढ़ा है 
भले आँख पर उनकी ,चश्मा चढ़ा है
मगर अब भी लगती है आँखें नशीली 
रसीली थी  पहले ,है अब भी रसीली 
वही नाज़ नखरे है वही है अदाए 
सताती थी पहले भी,अब भी सताये 
नहीं आया पतझड़,वो अब भी हरी है 
निगाहों में मेरी ,वो अब भी परी  है
 
भले अब रही ना वो दुल्हन नयी है 
दिनोदिन मगर वो निखरती गयी है 
भले तन पे चरबी ,जरा चढ़ गयी है 
मुझसे महोब्बत ,मगर बढ़ गयी है , 
बड़ी नाज़नीं ,खूबसूरत ,हसीं थी 
ख्यालों में मेरे जो रहती  बसी थी 
मगर रंग लाया है अब प्यार मेरा 
रखने लगी है वो अब ख्याल मेरा 
कसौटी पे मेरी ,वो उतरी  खरी है 
निगाहों में मेरी ,वो अब भी परी है

महकती हुई अब वो चंदन बनी है 
जवानी की उल्फत,समर्पण बनी है 
संग संग उमर के मोहब्बत है बढ़ती 
जो देखी है उसकी ,नज़र में उमड़ती 
 हम एक है अब ,नहीं दो जने है 
हम एक दूजे पर  ,आश्रित बने है   
जवानी का अब ना,रहा वो जूनून है 
देता मगर साथ उसका सुकून है 
मैंने सच्चे दिल से ,मोहब्बत करी है 
निगाहो में अब भी वो लगती परी है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 

Tuesday, April 24, 2018

तुम इतनी सीधी सादी क्यों हो ?

 न कोई शिकवा है ,न कोई शिकायत है 
हमेशा मुस्करा कर ,रहने की आदत  है  
न मुझमे कुछ कमी या खामियां ढूंढती हो 
पति को परमेश्वर ,समझ कर  पूजती हो 
न कोई जिद है ,न कोई फरमाइशें  है 
और न ऊंची ऊंची ,कोई भी ख्वाइशे है 
न कभी खीजती हो ,नहीं होती रुष्ट  हो 
हर एक  हाल में तुम,रहती सन्तुष्ट  हो 
न कभी गुस्सा होती हो ,न  झल्लाती हो 
रूप पर अपने तुम ,कभी ना इतराती हो  
काम में घर भर के,व्यस्त सदा रहती हो 
परेशानियों से तुम,त्रस्त  सदा रहती हो 
मांग पूरी करने में,सबकी तुम हो तत्पर 
दो दिन में अस्तव्यस्त ,होता है तुम बिन घर 
पीछे पड़ बात अपनी ,मुझसे नहीं मनवाती क्यों हो 
मेरी जान, तुम इतनी सीधी सादी क्यों हो ?
लोगबाग अक्सर अपनी बीबी से रहते है परेशान 
छोटी छोटी बातों पर , मचाती  है जो तूफ़ान  
कभी ननद से नहीं पटती ,कभी सास से शिकायत है 
सदा कुछ न कुछ रोना,रोने की आदत  है 
किसी को कपडे चाहिए,किसी को गहना चाहिए 
किसी को फाइव स्टार होटल में रहना चाहिए 
कोई बाहर खाने और घूमने फिरने की शौक़ीन होती है 
कोई आलसी है,काम नहीं करती.दिन भर सोती है 
कोई किटी पार्टी और   दोस्तों में रहती व्यस्त है 
कोई फेसबुक और व्हाट्स अप में मस्त है 
कोई बिमारी का  बहाना बना,पति से काम करवाती है 
कोई अपने घरवाले को ,अपनी  उँगलियों पर नचाती है 
तुम बिना कोई प्रश्न किये ,मेरी हर बात मानती हो 
मेरी आँखों के इशारों को ,अच्छी तरह पहचानती हो 
तुम भी अपनी बात मनवाने ,होती नहीं उन्मादी क्यों हो 
मेरी जान,तुम इतनी सीधी सादी क्यों हो ?    
तुम  सुशील ,समझदार और  जहीन हो 
तुम छरहरे बदन वाली हो, हसीन हो    
फिर भी तुममे न कोई नाज़ है ,न नखरा है 
तुम्हारा रूप कितना सादगी से भरा है 
न   तो ब्युटीपालर्र जाकर,सजना सजाना  
न ही चेहरे पर तरह तरह के लोशन लगाना 
तुम शर्मीली लाजवंती हो ,तुम्हारी नजरों में हया है 
भगवान में आस्था है और व्यवहार में  दया है     
 कभी ना कहना ,तुमने नहीं सीखा है 
पति के दिल लूटने का तुम्हारा अपना ही तरीका है 
पति के  दिल की राह, आदमी के पेट से होकर है जाती 
इसलिए तुम मुझे नित नए ,पकवान बनाकर हो खिलाती 
तुम अन्नपूर्णा हो और तुम ही गृह लक्ष्मी हो 
मैं खुशनसीब हूँ कि तुम मेरे लिए ही बनी हो 
अपनी इन्ही अदाओं से तुम मुझको लुभाती क्यों हो 
मेरी जान,तुम इतनी सीधी सादी क्यों हो ?
हमारी जिंदगी में ,मियां बीबी वाली नोकझोंक क्यों नहीं होती 
मेरे लिए तुम्हारी कोई रोक टोक क्यों नहीं होती 
इस दुनिया में लोग तरसते है पत्नी के प्यार के लिए 
लेकिन मैं तरस जाता हूँ ,झगड़े और तकरार के लिए 
जी करता है की तुम रूठो और मैं तुम्हे मनाऊं
 तुम नखरे दिखा इठलाओ और मैं तुम्हे मख्खन  लगाऊं 
तुम जिद करो और मैं तुम्हे मन चाही वस्तु दिलवाऊं 
कभी जी करता है तुम ब्यूटी पालर्र में सजवाऊं 
पर तुम तो जैसी हो ,उस हाल में ही खुश हो 
जितना भी मिलता है ,उस प्यार में ही खुश हो 
पर सिर्फ मीठा खाने से भोजन में मज़ा नहीं आता 
वैसे ही सिर्फ प्यार से  जीवन का मज़ा नहीं आता 
जिंदगी में प्यार के साथ ,झगडे का तड़का आवश्य्क है 
कभी कभी प्यार बढाती ,रोज की झक झक है 
पर तुम शांति प्रेमी ,झगड़ने से घबराती क्यों हो 
मेरी जान,तुम इतनी सीधीसादी  क्यों हो ?

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

दान पुण्य  

भूखे को भोजन और प्यासे को जल  पिलाओ ,
               यह सच्ची सेवा और दान बड़ा  होता है 
भंडारे का खाना ,गुरूद्वारे का लंगर ,
              परशादी भोजन अति स्वाद भरा होता है 
गरमी में सुबह सुबह ,लोगों को छाछ पिला ,
                   शीतलता देने से ,पुण्य खरा होता है 
सरदी में कंबल और वस्त्रहीन को कपडे ,
             अंत समय ,पुण्य करम ,साथ खड़ा होता है 

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संपर्क सूत्र  
१ मदन मोहन बाहेती 701 टावर 1 - मोबाईल 9350805355 
२ शिव कुमार मित्तल 1502  टावर 1 - मोबाईल 9910344688