Thursday, July 5, 2018

जीवन की फड़फड़ाहट 

उन्मुक्त बचपन की चहचहाहट 
किशोरावस्था की कुलबुलाहट 
जवानी की सुगबुगाहट 
हुस्न की चमचमाहट 
मन में  प्यार की गरमाहट 
पत्नी के कोमल हाथों की थपथपाहट 
हनीमून की खिलखिलाहट 
प्यार और जिम्मेदारियों ली मिलावट 
गृहस्थी की गड़बड़ाहट 
पैसा कमाने की हड़बड़ाहट 
जीवन की गाडी की खड़खड़ाहट 
परेशानिया और छटपटाहट 
आने लगती है थकावट  
जब रूकती है व्यस्तता की फड़फड़ाहट  
आती है बुढ़ापे की फुसफुसाहट 
शिथिल तन की कुलबुलाहट 
नज़रों की धुंधलाहट 
गायब होती मौजमस्ती की गमगमाहट
मन में होती झनझनाहट 
अंकल कहे जाने पर चिड़चिड़ाहट 
स्वास्थ्य  में गिरावट 
हर काम में रुकावट 
ऐसे में भगवान के प्रति झुकावट   
पुरानी  यादों की गरमाहट 
और चेहरे पर मुस्कराहट 
दूर कर देती है बुढ़ापे की गड़बड़ाहट 

मदनमोहन बाहेती 'घोटू '
फलती फूलती औरतें 

अहमियत औरतों की ,जिंदगी में ख़ास है 
मगर उनके दर्द का ,हमको नहीं अहसास है 
गुलबदन ,शादी के पहले होती नाज़ुक फूल है
काम जब करती नहीं तो बदन जाता फूल है  
काम ज्यादा अगर करती ,फूल जाती सांस है 
काम यदि कम करे तो मुंह फुला लेती सास है 
फुला देता उन्हें पति के प्यार का आहार है 
उनके बलबूते ही फलता फूलता परिवार है 
देती बच्चों को दुआएं ,उनकी हर एक सांस है 
अहमियत औरतों की ,जिंदगी में ख़ास है 

घोटू 

Friday, June 22, 2018

नेताजी से 

परेशानी बढ़ , गयी अब चौगुना है 
कर रहे हर शिकायत को अनसुना है 
वोट पाकर , नोट के बस फेर में हो ,
क्या इसी के वास्ते तुमको  चुना है 
दूध चट कर  हमें कह कर चाय है ,
पिलाते तुम सिर्फ  पानी  गुनगुना  है
मुंह हमारा बंद रहे इस वास्ते 
आश्वासन  देते  पकड़ा झुनझुना है 
रजाई की तपिश पाने के लिए ,
रुई जैसा आपने हमको धुना है 
चाह कर भी हम निकल पाते नहीं ,
इस तरह से जाल वादों का बुना है 
अपने ही पैरों कुल्हाड़ी मार कर ,
मन हमारा ,बहुत जल जल कर भुना है 
ज्यादा उड़ने वाले अक्सर अर्श से ,
फर्श पर गिर जाते ,देखा और सुना है  

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Sunday, June 17, 2018

मुझे याद रहेगी देर तलक 

वो तेरी सूरत  मुस्काती 
वो तेरी जुल्फें  लहराती 
वो चाल तेरी हिरण जैसी ,
वो तेरी कमरिया बल खाती 
       मुझे याद रहेगी  तेरी झलक 
     बड़ी देर तलक ,बड़ी दूर तलक 
वो महकाता चंदन सा बदन 
वो बहकाती चंचल चितवन 
तू रूप भरी ,रस की गागर ,
वो मचलाता तेरा यौवन 
       जो भी देखे वो जाए बहक 
       बड़ी देर तलक बड़ी दूर तलक 
मुस्कान तेरी वो मंद मंद 
रसभरे ओंठ ,गुलकंद कंद 
तेरी हर एक अदा कातिल ,
मेरे मन को आती पसंद ,
        मद भरे नयन ,अधखुले पलक 
        बड़ी देर तलक,बड़ी दूर तलक 
वो तेरे तन की दहक दहक 
वो तेरी खुशबू,महक महक 
खन खन करती वो तेरी हंसी,
वो तेरी बातें चहक चहक 
        तू जाम रूप का ,छलक छलक 
         बड़ी देर तलक ,बड़ी दूर तलक 
तू मूरत  संगेमरमर की 
तू अनुपम कृति है ईश्वर की 
जैसे धरती पर उतरी हो ,
तू कोई अप्सरा अंबर की 
       तू सबसे जुदा ,तू सबसे अलग 
        बड़ी देर तलक ,बड़ी दूर तलक 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
 

बावन पत्ते 

हम और तुम और बावन पत्ते 

जब तुम पीसो ,तब मै काटूँ 
जब तुम काटो ,तब मैं बांटू 
चौके,पंजे ,अट्ठे,सत्ते 
हम और तुम और बावन पत्ते 

इक्के दुक्के कभी कभी हम 
तीन पांच करते आपस में 
तुम चौका, मैं छक्का मारूं,
बड़ा मज़ा आता है सच में 
ये क्या कम हम साथ साथ है 
और बिखरे, सात आठ नहीं है 
तुम मारो नहले पर दहला ,
फिर भी मन में गाँठ नहीं है 
तुम बेगम बन रहो ठाठ से ,
बादशाह मैं ,पर गुलाम हूँ 
तुम हो हुकुम ,ईंट मैं घर की ,
तुम चिड़िया मैं लालपान हूँ 
कभी जीतते,कभी हारते ,
हँसते हँसते  बावन हफ्ते 
हम और तुम और बावन पत्ते 

मदन मोहन बाहेती'घोटू '

पिताजी आप अच्छे थे 

संवारा आपने हमको ,सिखाया ठोकरे सहना 
सामना करने मुश्किल का,सदा तत्पर बने रहना 
अनुभव से हमें सींचा ,तभी तो हम पनप पाये 
जरासे जो अगर भटके ,सही तुम राह पर लाये 
मिलेगी एक दिन मंजिल ,बंधाया हौंसला हरदम 
बढे जाना,बढे जाना ,कभी थक के न जाना थम 
जहाँ सख्ती दिखानी हो,वहां सख्ती दिखाते थे 
कभी तुम प्यार से थपका ,सबक अच्छा सिखाते थे 
तुम्हारे रौब डर  से ही,सीख पाए हम अनुशासन 
हमें मालुम कितना तुम,प्यार करते थे मन ही मन 
सरल थे,सादगी थी ,विचारों के आप सच्चे थे 
तभी हम अच्छे बन पाए ,पिताजी आप अच्छे थे 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, June 13, 2018

आजकल तो रह गए हम छाछ है 

जवानी के वो सुहाने दिन गए ,बुढ़ापे का हो गया आग़ाज़ है 
थे कभी फुलक्रीम वाले दूध हम,आजकल तो रह गए बस छाछ है 
जवानी में थोड़ी भी ऊष्मा मिली ,खूं हमारा था उछालें  मारता 
दूध जैसे उफनने लगते थे हम,बड़ा ही मस्ती भरा  संसार था 
मलाई बन हसीं गालों पर लगे ,होते थे टॉनिक सुहागरात के 
उन दिनों की बात ही कुछ और थी ,मुश्किलों से संभलते जज्बात थे 
दिल किया खट्टा किसी ने फट गए ,किसी ने जावन जो डाला ,जम गए 
खोया बन के खोया अपने रूप को ,मथा जो कोई ने मख्खन बन गए 
अब पिघलते झट से आइसक्रीम से ,हमसे यौवन हो गया नाराज है 
थे कभी फुलक्रीम वाले दूध हम ,आजकल तो रह गए बस छाछ है 
जवानी का सारा मख्खन खुट गया ,कुछ यहाँ कुछ वहां यूं ही बंट गया 
लुफ्त तो सबने ही जी भर कर लिया ,खजाना सब लुट यूं ही झटपट गया 
मलाई जो भी थी थोड़ी सी बची ,बुढ़ापे की बिल्ली ,आ चट कर गयी 
स्निग्धता अब भी बची है प्यार की ,दूध की ताक़त भले ही घट गयी 
अब तो खट्टी छाछ सी है जिंदगी ,मगर फिर भी ,स्वास्थवर्धक स्वाद है 
तुम बनाओ कढ़ी चाहे रायता ,अब  भी देती ,हृदय को आल्हाद है 
सुरों में अब भी मधुरता है वही ,भले ही अब ये पुराना  साज है 
थे कभी फुलक्रीम वाले दूध हम,आजकल तो रह गए बस छाछ है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '