Saturday, May 4, 2019

एक वो भी ज़माना होता था

एक वो भी ज़माना होता था

जब तुम्हें अम्मा की याद आती थी

और तुम जिस करके मैके चली जाती थी

पर मुझसे दूर रहकर जब सताती थी विरह पीड़ा

और तुम्हें सोने नहीं देता था मेरी याद का कीड़ा

तुम मुझे बार बार याद किया करती थी

तुम्हारी बेचैनी तुम्हारे ख़तों में झलकती थी

तुम लिखा करती थी होकर के बेक़रार

आइ लव यू 'मैं करती हूँ तुम्हें बहुत प्यार

बस मुझे लिवाने आ जाओ चिट्ठी को समझ कर तार

वो भी क्या दिन थे ,अजीब सास दीवनापन था

तन्हाई में आग लगाता सावन था

गरमी में सिहरन और सर्दी में पसीना आता था

एक दूजे के बिन पल भर भी नहीं जिया जाता था

और अब

दो चार दिन के लिये भी तुम मैके जाती हो जब

रास्ते में मोबाइल से चार बार

और मैके पहुँच कर व्हाटएप पर बार बार

मुझसे पूछती हो क्या हाल है

फ्रिज में रख कर आइ हूँ ,रोटी और दाल है

गरम करके ख़ा लेना

और याद रख कर टाइम से दवा लेना

काम वाली बाई

आइ या नहीं आइ

उससे ठीक से करवा लेना घर की सफ़ाई

तुम्हारी शुगर बढ़ी हुई है , ख़याल रखना

भूल कर भी मिठाई मत चखना

रोज़ रात को दूध गरम करके पी लेना

दो चार दिन हमारे बग़ैर भी जी लेना

सर भारी हो तो बाम लगा लेना

नारियल पानी नारियल वाले से रोज़ मंगालेना

टीवी के चक्कर में ज़्यादा देर से मत सोना

गरम पानी से नहाना और चड्डी बनियान मत धोना

मुझे तरह तरह की शिक्षा देती रहती हो

पर पहले की तरह 'आई लव यू 'कभी नहीं कहती हो

क्या बूढ़ापे में प्यार प्रदर्शन का तरीक़ा बदल जाता है

एक दूसरे की तबियत का ध्यान पहले आता है

जवानी का प्यार हुआ करता है तूफ़ानी

कुछ आग दिल की कुछ आग जिस्मानी

बुढ़ापे का इश्क़ मगर तिमारदारी है

पर उसमें छुपी मोहब्बत पड़े सब पे भारी है

बुढ़ापे का दर्द पति पत्नी मिल कर बाटते है

एक दूसरे के पैर के नाख़ून काटते है

बुढ़ापे के प्यार का एक अलग अपनापन है

एक दूसरे के प्रति पूर्णसमर्पण है

पति पत्नी का आपस में अटूट बंधन बंध जाता है

प्यार का सही मतलब बुढ़ापे में हीसमझ आता है


मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Friday, May 3, 2019

स्थान और वक़्त

धरती घूम रही निज धुरी पर सूरज के चक्कर खातीहै 
वैसे वक़्त बदलता रहता ,जैसे जगह बदल जाती है 

देश देश में अलग वक़्त यह इसीलिएमुमकिन होता है 
रात हुआ करती लन्दन में ,जब दिल्ली में दिन होता है 
मौसम भी बदला करते है ,सर्दी गरमी बरसाती है 
वैसे वक़्त बदलता रहता , जैसे जगह बदल जाती है 

कल का छुटभैया नेता जब एमपी चुन दिल्ली जाता है 
हो जाती उसकी पौबारह ,एसा वक़्त बदल जाता है 
आ जाती चेहरे पर रौनक़ थोड़ी तोंद निकल आती है 
वैसे वक़्त बदलता रहता ,जैसे जगह बदल जाती है 

रहती कितने अनुशासन में जब लड़की होजायसयानी 
वक़्त बदलता ससुराल जा बन जाती है घर की रानी 
एक इशारे पर ऊँगली के पतिदेव को नचवाती है 
वैसे वक़्त बदलता रहता ,जैसे जगह बदल जाती है 

घोटू

दिल के अरमान

दिल के अरमां ,आंसूओ में खो  गये
                       १ 
शाम को सजती,संवरती मै रही,
                      आओगे तुम,प्यार निज दरशाओगे
बाँध लोगे बांहों  में अपनी मुझे ,
                       या कि मेरी बांहों  में बंध  जाओगे
आये थके हारे तुम ,खाया पिया ,
                         टी वी देखा  और झटपट  सो गये
क्या बताएं ,रात फिर कैसे कटी ,
                           दिल के अरमां ,आंसूओं में खो गये 
                            २
मुश्किलों से पार्टी का पा टिकिट ,
                       उतरे हम चुनाव के मैदान में
गाँव गाँव ,हर गली ,सबसे मिले ,
                   पूरी ताकत झोंकी अपनी जान  में
पानी सा पैसा बहाया ,सोच ये,
                       कमा लेंगे ,एम पी. जो हो गये
नतीजा  आया ,जमानत जप्त थी,
                       दिल के अरमां , आंसूओं में खो  गये 
                         ३
हुई शादी,प्यारी सी बीबी मिली,
                       धीरे धीरे ,बेटे भी दो हो गये
बुढ़ापे का सहारा ये बनेगें ,
                      लगा कर ये आस हम खुश हो गये
पढ़े,लिख्खे,नौकरी अच्छी  मिली ,
                      हुई शादी,अलग हमसे हो गये
बुढ़ापे में हम अकेले रह गये,
                  दिल के अरमां , आंसूओं में खो  गये

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

बुढ़ापा -एक वरदान

उम्र बुढ़ापे की होती थी त्रास कभी 
मजबूरी का दिलवाती अहसास कभी 
आज बुढ़ापा वो ही है वरदान  बना 
मौज और मस्ती का ये  सामान बना
फ़र्क़ नहीं कुछ ,सिर्फ़ नज़रिया है बदला
सुख से जीने की हमको आ गयी कला
गया ज़माना जब हम पूरे जीवन भर 
पैसा ख़ूब कमाया करते ,मेहनत कर 
पाई पाई कर ,पैसा जोड़ा करते थे 
सात पुश्त के ख़ातिर छोड़ा करते थे 
सारा जीवन जीते थे कंजूसी कर 
मज़ा न जीवन का लेते थे रत्ती भर 
एसे फँसते ननयानू के  फेरे में 
सिमटे रहते थे बस अपने घेरे में 
साथ वक़्त के अब बदलाव लगा आने 
ख़ुद पर ख़र्चो ,मन में भाव लगा आने 
पूत सपूत ,कमायेगा ख़ुद ,खायेगा
पूत कपूत ,तुम्हारी बचत उड़ाएगा
खुल्ली दौलत ,उसमें आलस भर देगी 
उसे निठल्ला और निकम्मा कर देगी 
लिखा भाग्य में ,वैसा जीवन जियेगा 
जो क़िस्मत में है वो खाये पीयेगा
वैसे भी व्यवहार शून्य है अब बच्चे
मातपिता प्रति ,प्यार शून्य है अब बच्चे
अब वो ख़ुद में मस्त ,अलग हो रहते है 
निज जनकों पर ध्यान भला कब देते है 
जैसे शादी हुई ,बदल वो जाते है 
संस्कार तुम्हारे दिये,भुलाते है 
इसीलिये उनके पीछे मत हाय करो 
ख़ुद कमाओ ,ख़ुद पर ख़र्चो,एंजोय करो 
यही सोच सब सुख के साधन जुटा रहे 
निज कमाई का पूरा आनंद उठा रहे 
अब तक जो सिमटे रहते थे निज घर में 
आज घूमते फिरते है दुनिया भर में 
साठ साल के बाद रिटायर होने पर 
अक्सर उगने लगते है लोगों के पर 
ना कमाई की चिंता में घुटते,मरते 
खपत बचत कीख़ुद अपने ख़ातिर करते 
करते है वो जो भी आये मर्ज़ी में 
जाते तीरथ,हिल स्टेशन ,गर्मी में 
सिंगापुर ,योरोप अमेरिका घूम रहे 
या मस्ती में गोआ तट पर झूम रहे 
इन्शुरन्स बीमारी का कर रखते है 
मोटी पेंशन ,दिन मस्ती से कटते है 
मौज मनाते और करते अठखेली है 
बदल गयी बूढ़ों की जीवन शैली है 
मज़ा लिया करते है खाने पीने का 
बदल गया है आज तरीक़ा जीने का 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

बहू बेटी 

सास भी कभी थी बहू,हुई पुरानी बात 
अब तो पहले दिवस से ,बहू बने है सास 
बहू बने है सास ,छीन माता का जाया
एसा जादू करती ,बेटा बने  पराया 
'घोटू' सुख बरसे ,मिट जाये जब ये अंतर 
बहू रहे ससुराल ,सदा बेटी सी बन कर 

घोटू

पतझड़ की उमर

ये पतझड़ की उम्र डाल पर किसको कितना टिकना है 
हमको तुमको सबको एकदिन टूट शाख़ से गिरना है
विकसे थे हम कभी वृक्ष पर नरम मुलायम किसलयथे 
 नन्हें नन्हें ,चिकने चिकने ,हम कितने कांतिमय थे 
साथ वक़्त के हरे भरे हो ,बड़े हुये हम ,इतराये
ख़ूब पवन झोंको में डोले ,हम सबके ही मन भाये
ग्रीष्म ऋतु में छाया दी और शीतल मस्त बयार बने 
एक दूजे संग की अठखेली,हम यारों के यार बने 
रितुयें बदली साथ वक़्त के ,पतझड़ का मौसम आया
हम पीले कमज़ोर पड़ गये ,हवा चली ,संग बिखराया
कोई जला दिया जायेगा और किसी को गढ़ना है 
बन कर खाद ,नये पौधों को ,हराभरा फिर करना है 
ये पतझड़ की उम्र डाल पर किसको कितना टिकना है 
हमको तुमको सबको एकदिन टूट शाख़ से गिरना है 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Thursday, May 2, 2019

फ्लर्टिंग 
                   १ 
मज़ा लैला और मजनू सी,मोहब्बत में नहीं आता 
मज़ा मियां और बीबी की ,सोहबत में नहीं  आता 
चुगे या ना चुगे चिड़िया ,रहो तुम डालते दाना ,
मज़ा जो आता फ्लर्टिंग में ,कहीं पर भी नहीं आता 
                           २ 
तुम्हारी हरकतों से वो,अगर जो थोड़ा हंसती है 
कर रहे फ्लर्ट तुम उससे ,भली भांति समझती है 
हंसी तो फंस गयी है वो,ग़लतफ़हमी में मत रहना ,
मज़ा उसको भी आता है ,वो टाइम पास करती है 
                             ३ 
देख कर हुस्न मतवाला ,तुम्हारी बांछें जाती खिल 
लिया जो देख बीबी ने ,बड़ी हो जाएगी   मुश्किल 
जवानी देखते उसकी ,बुढ़ापा  अपना भी देखो ,
कहेगी जब तुम्हे अंकल,जलेगा फिर तुम्हारा दिल 
                           ४ 
ये तुम्हारा दीवानापन ,ज़माना ताकता  होगा 
फलूदा होगी इज्जत जो,गये पकड़े,पता होगा 
बड़ा छुप छुप के मस्ती में ,इधर तुम मौज लेते हो,
उधर घर में तुम्हारे भी ,पड़ोसी झांकता होगा  

मदन मोहन बाहेती'घोटू'