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Monday, September 16, 2019
【SEAnews】Review:The baptism of the Holy Spirit (Parable of vineyard)-e
Friday, August 16, 2019
【SEAnews:India Front Line Report】August 15, 2019 (Thu) No. 3935
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Wednesday, August 14, 2019
इंसान और जानवर
हे भगवान !
आपने तो बनाकर भेजा था मुझे इंसान
पर ये संसार ,जो मेरा सगा है
मुझे बार बार जानवर बनाने में लगा है
जब मैं पैदा हुआ ,मुझे देखने लोग आते थे
अपनी गोदी में उठाते थे
और कहते कितना मासूम और अच्छा है
एकदम लगता 'खरगोश 'का बच्चा है
कोई कहता देखो मुंह खोलता है ऐसे
'चिड़िया' का बच्चा मुंह खोलता हो जैसे
वो जब मुझसे बातें करते तो मैं ,
गर्दन हिला कर करता था हूँ हूँ
तो लोग कहते कैसा कर रहा है ,
'कबूतर' सा गुटर गू
फिर मैं बड़ा हुआ ,स्कूल जाने लगा
पाठ वाठ याद नहीं रहता ,
तो गुरूजी को मुझमे 'गधा' नज़र आने लगा
बार मुझे गधा कहते थे
पर जब सजा देते थे तो 'मुर्गा 'बना देते थे
गणित की लंगड़ी भिन्न का हल ,
जब मेरी समझ में नहीं आता था
तो मुझे 'उल्लू' की उपाधि से नवाजा जाता था
और घर पर
मेरी दादी मुझे कहती थी नटखट' बंदर '
घर पर मेरी माँ भी मुझे थी समझाती
पर पढ़ाई की बात मेरी समझ में थी नहीं आती
माँ की खीज देख पिताजी कहते ,
क्यों हो 'भैंस' के आगे बीन बजाती
स्कूल के दोस्त
सब मिल मेरे साथ केन्टीन जाते थे
मस्ती से समोसे खाते थे
और पेमेंट के समय मुझे 'बकरा ' बनाते थे
जवानी में आशिक़ हो फूल जैसी लड़कियों पर
काटता था जब उनके इर्दगिर्द चक्कर
दोस्त कहते क्यों 'भँवरे ' की तरह मंडराते रहते हो
लड़कियों के आगे पालतू 'कुत्ते 'की तरह ,
दुम हिलाते रहते हो
खैर जैसे तैसे 'कछुवे ' की चाल से ,
मैंने पूरी की अपनी पढाई
और किसी की रिकमंडेशन से ,
एक अच्छी नौकरी भी पाई
फिर शादी की ,गृहस्थी बसाई
और गृहस्थी चलाने को ,
कोल्हू के' बैल 'की तरह ,
दिनरात चक्कर काटता रहा
दफ्तर में 'शेर 'बन कर ,
अपने मातहतों को डाँटता रहा
पर घर जाकर हालत हो जाती थी पिलपिल्ली
बीबी के आगे बन जाता था भीगी 'बिल्ली'
रोज रोज की मुश्किलों से होता रहता था गुथ्थमगुथ्था
न घर का रहा न घाट का ,
बन गया धोबी का' कुत्ता '
अब भी जब कभी कभी ,
गर्म जलेबी या पकोड़े खाता हूँ
तो बीबी की फटकार पाता हूँ
क्यों बहशी की तरह इतना खा रहे हो
जरा ध्यान दो, 'हाथी' की तरह फूलते जा रहे हो
अब आप ही देखलो भगवान् ,
मेरे साथ कितनी ज्यादती हो रही है ,
जो मेरा दिल दुखाती है
बार बार मेरी तुलना जानवरों से क्यों की जाती है ?
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
हे भगवान !
आपने तो बनाकर भेजा था मुझे इंसान
पर ये संसार ,जो मेरा सगा है
मुझे बार बार जानवर बनाने में लगा है
जब मैं पैदा हुआ ,मुझे देखने लोग आते थे
अपनी गोदी में उठाते थे
और कहते कितना मासूम और अच्छा है
एकदम लगता 'खरगोश 'का बच्चा है
कोई कहता देखो मुंह खोलता है ऐसे
'चिड़िया' का बच्चा मुंह खोलता हो जैसे
वो जब मुझसे बातें करते तो मैं ,
गर्दन हिला कर करता था हूँ हूँ
तो लोग कहते कैसा कर रहा है ,
'कबूतर' सा गुटर गू
फिर मैं बड़ा हुआ ,स्कूल जाने लगा
पाठ वाठ याद नहीं रहता ,
तो गुरूजी को मुझमे 'गधा' नज़र आने लगा
बार मुझे गधा कहते थे
पर जब सजा देते थे तो 'मुर्गा 'बना देते थे
गणित की लंगड़ी भिन्न का हल ,
जब मेरी समझ में नहीं आता था
तो मुझे 'उल्लू' की उपाधि से नवाजा जाता था
और घर पर
मेरी दादी मुझे कहती थी नटखट' बंदर '
घर पर मेरी माँ भी मुझे थी समझाती
पर पढ़ाई की बात मेरी समझ में थी नहीं आती
माँ की खीज देख पिताजी कहते ,
क्यों हो 'भैंस' के आगे बीन बजाती
स्कूल के दोस्त
सब मिल मेरे साथ केन्टीन जाते थे
मस्ती से समोसे खाते थे
और पेमेंट के समय मुझे 'बकरा ' बनाते थे
जवानी में आशिक़ हो फूल जैसी लड़कियों पर
काटता था जब उनके इर्दगिर्द चक्कर
दोस्त कहते क्यों 'भँवरे ' की तरह मंडराते रहते हो
लड़कियों के आगे पालतू 'कुत्ते 'की तरह ,
दुम हिलाते रहते हो
खैर जैसे तैसे 'कछुवे ' की चाल से ,
मैंने पूरी की अपनी पढाई
और किसी की रिकमंडेशन से ,
एक अच्छी नौकरी भी पाई
फिर शादी की ,गृहस्थी बसाई
और गृहस्थी चलाने को ,
कोल्हू के' बैल 'की तरह ,
दिनरात चक्कर काटता रहा
दफ्तर में 'शेर 'बन कर ,
अपने मातहतों को डाँटता रहा
पर घर जाकर हालत हो जाती थी पिलपिल्ली
बीबी के आगे बन जाता था भीगी 'बिल्ली'
रोज रोज की मुश्किलों से होता रहता था गुथ्थमगुथ्था
न घर का रहा न घाट का ,
बन गया धोबी का' कुत्ता '
अब भी जब कभी कभी ,
गर्म जलेबी या पकोड़े खाता हूँ
तो बीबी की फटकार पाता हूँ
क्यों बहशी की तरह इतना खा रहे हो
जरा ध्यान दो, 'हाथी' की तरह फूलते जा रहे हो
अब आप ही देखलो भगवान् ,
मेरे साथ कितनी ज्यादती हो रही है ,
जो मेरा दिल दुखाती है
बार बार मेरी तुलना जानवरों से क्यों की जाती है ?
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
Sunday, August 11, 2019
अतिवृष्टि -अनावृष्टि
अतिवृष्टि भी नहीं चाहिए अनावृष्टि भी नहीं चाहिए
इतनी जगह हृदय में रखना ,जहाँ ठीक से समा सकूं मैं
इतना प्यार मुझे बस देना ,जिसे ठीक से पचा सकूं मैं
न तो प्रेम की बाढ़ चाहिये ,हेयदृष्टि भी नहीं चाहिए
अतिवृष्टि भी नहीं चाहिए ,अनावृष्टि भी नहीं चाहिए
ना चाहूँ दुर्लभ हो दर्शन ,ना बस चुंबन के बौछारें
सावन के रिमझिम के जैसी ,रहे बरसती प्रेम फुहारें
अस्त व्यस्त हो जीवन का क्रम ,ऐसी सृष्टि नहीं चाहिए
अतिवृष्टि भी नहीं चाहिए ,अनावृष्टि भी नहीं चाहिए
मैं चाहूँ बस इतना बरसो ,प्यास बुझे ,तृप्ति मिल जाए
प्रेम नीर में मुझे भिगो दे ,ऐसी कृपा दृष्टि मिल जाए
भूल जाऊं दुनिया की सुदबुध ,ऐसी मस्ती नहीं चाहिए
अतिवृष्टि भी नहीं चाहिए ,अनावृष्टि भी नहीं चाहिए
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
अतिवृष्टि भी नहीं चाहिए अनावृष्टि भी नहीं चाहिए
इतनी जगह हृदय में रखना ,जहाँ ठीक से समा सकूं मैं
इतना प्यार मुझे बस देना ,जिसे ठीक से पचा सकूं मैं
न तो प्रेम की बाढ़ चाहिये ,हेयदृष्टि भी नहीं चाहिए
अतिवृष्टि भी नहीं चाहिए ,अनावृष्टि भी नहीं चाहिए
ना चाहूँ दुर्लभ हो दर्शन ,ना बस चुंबन के बौछारें
सावन के रिमझिम के जैसी ,रहे बरसती प्रेम फुहारें
अस्त व्यस्त हो जीवन का क्रम ,ऐसी सृष्टि नहीं चाहिए
अतिवृष्टि भी नहीं चाहिए ,अनावृष्टि भी नहीं चाहिए
मैं चाहूँ बस इतना बरसो ,प्यास बुझे ,तृप्ति मिल जाए
प्रेम नीर में मुझे भिगो दे ,ऐसी कृपा दृष्टि मिल जाए
भूल जाऊं दुनिया की सुदबुध ,ऐसी मस्ती नहीं चाहिए
अतिवृष्टि भी नहीं चाहिए ,अनावृष्टि भी नहीं चाहिए
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
जिंदगी का सफर
जिंदगानी के सफर के दरमियाँ
सबसे अच्छी उम्र होती बचपना
मन में ना चिंता कोई ना है फिकर ,
परेशानी नहीं कोई खामखाँ
नालियों में नाव कागज की तैरा ,
नाचते थे हम बजा कर तालियां
गोदियों में हसीनो की खेलते ,
मिला करती हमको उनकी पप्पियां
बाद इसके आता ऐसा दौर है ,
खुलने लगती बंद दिल की खिड़कियां
सब पे चढ़ता जवानी का जोश है
अच्छी लगने लगती सारी लड़कियां
इश्क़ है मन में उछालें मारता ,
ये वो आतिश है जलाता जो जिया
नशा इसका बना देता बावला ,
बड़ी मुश्किल से उतरता है मियां
और फिर बन कर के बीबी एक दिन ,
दिल में बस जाती है कोई दिलरुबाँ
फेर में फंस गृहस्थी के आदमी ,
घूमता है बैल कोल्हू का बना
चैन पल भर भी उसे मिलता नहीं ,
इतनी बढ़ जाती है जिम्मेदारियां
पिसते घिसते ,ढलने लगता जिस्म है ,
दिखने लगते है बुढ़ापे के निशां
भोग कर जीवन के सुख और दुःख सभी ,
शुरू बेफिक्री का होता सिलसिला
वृद्धि होती अनुभव की वृद्ध बन ,
आती जीवन जीने की हमको कला
बांटो अपना प्रेम आशीर्वाद तुम ,
सभी अपने परायों को हर दफा
चैन से जियो करो बस मौज तुम ,
बुढ़ापे का हो यही बस फ़लसफ़ा
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
जिंदगानी के सफर के दरमियाँ
सबसे अच्छी उम्र होती बचपना
मन में ना चिंता कोई ना है फिकर ,
परेशानी नहीं कोई खामखाँ
नालियों में नाव कागज की तैरा ,
नाचते थे हम बजा कर तालियां
गोदियों में हसीनो की खेलते ,
मिला करती हमको उनकी पप्पियां
बाद इसके आता ऐसा दौर है ,
खुलने लगती बंद दिल की खिड़कियां
सब पे चढ़ता जवानी का जोश है
अच्छी लगने लगती सारी लड़कियां
इश्क़ है मन में उछालें मारता ,
ये वो आतिश है जलाता जो जिया
नशा इसका बना देता बावला ,
बड़ी मुश्किल से उतरता है मियां
और फिर बन कर के बीबी एक दिन ,
दिल में बस जाती है कोई दिलरुबाँ
फेर में फंस गृहस्थी के आदमी ,
घूमता है बैल कोल्हू का बना
चैन पल भर भी उसे मिलता नहीं ,
इतनी बढ़ जाती है जिम्मेदारियां
पिसते घिसते ,ढलने लगता जिस्म है ,
दिखने लगते है बुढ़ापे के निशां
भोग कर जीवन के सुख और दुःख सभी ,
शुरू बेफिक्री का होता सिलसिला
वृद्धि होती अनुभव की वृद्ध बन ,
आती जीवन जीने की हमको कला
बांटो अपना प्रेम आशीर्वाद तुम ,
सभी अपने परायों को हर दफा
चैन से जियो करो बस मौज तुम ,
बुढ़ापे का हो यही बस फ़लसफ़ा
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
भारत देश महान चाहिए
पतन गर्त में बहुत गिर चुके,अब प्रगति,उत्थान चाहिए
हमको अपने सपनो वाला ,प्यारा हिन्दुस्थान चाहिए
ऋषि मुनियों की इस धरती पर,बहुत विदेशी सत्ता झेली
शीतल मलयज नहीं रही अब ,और हुई गंगा भी मैली
अब ना सुजलां,ना सुफलां है ,शस्यश्यामला ना अब धरती
पंच गव्य का अमृत देती ,गाय सड़क पर ,आज विचरती
भूल धरम की सब मर्यादा ,संस्कार भी सब बिसराये
कहाँ गए वो हवन यज्ञ सब,कहाँ गयी वो वेद ऋचाये
लुप्त होरहा धर्म कर्म अब ,उसमे नूतन प्राण चाहिए
हमको अपने सपनो वाला ,प्यारा हिन्दुस्थान चाहिए
परमोधर्म अहिंसा माना ,शांति प्रिय इंसान बने हम
ऐसा अतिथि धर्म निभाया,बरसों तलक गुलाम बने हम
पंचशील की बातें करके ,भुला दिया ब्रह्मास्त्र बनाना
आसपास सब कलुष हृदय है,भोलेपन में ये ना जाना
मुंह में राम,बगल में छुरी ,रखनेवाले हमे ठग गए
सोने की चिड़िया का सोना,चुरा लिया सब और भग गए
श्वेत कबूतर बहुत उड़ाए ,अब तलवार ,कृपाण चाहिए
हमको अपने सपनो वाला प्यारा हिन्दुस्थान चाहिए
अगर पुराना वैभव पाना है ,तो हमें बदलना होगा
जिस रस्ते पर दुनिया चलती उनसेआगे चलना होगा
सत्तालोलुप कुछ लोगों से ,अच्छी तरह निपटना होगा
सत्य अहिंसा बहुत हो गयी,साम दाम से लड़ना होगा
हमकोअब चाणक्य नीति से,हनन दुश्मनो का करना है
वक़्त आगया आज वतन के,खातिर जीना और मरना है
हर बंदे के मन में जिन्दा ,जज्बा और तूफ़ान चाहिए
हमको अपने सपनो वाला ,प्यारा हिन्दुस्थान चाहिए
कभी स्वर्ग से आयी थी जो,कलकल करती गंगा निर्मल
हमें चाहिए फिर से वो ही ,अमृत तुल्य,स्वच्छ गंगाजल
भारत की सब माता बहने ,बने विदुषी ,लिखकर पढ़कर
उनको साथ निभाना होगा ,साथ पुरुष के ,आगे बढ़ कर
आपस का मतभेद भुला कर ,भातृभाव फैलाना होगा
आपस में बन कर सहयोगी ,सबको आगे आना होगा
हमे गर्व से फिर जीना है ,और पुरानी शान चाहिए
हमको अपने सपनो वाला ,प्यारा हिन्दुस्थान चाहिए
सभी हमवतन ,रहे साथ मिल ,तोड़े मजहब की दीवारे
छुपे शेर की खालों में जो ,कई भेड़िये ,उन्हें संहारे
जौहर में ना जले नारियां ,रण में जा दिखलाये जौहर
पृथ्वीराज ,प्रताप सरीखे ,वीर यहाँ पैदा हो घर घर
कर्मक्षेत्र या रणभूमि में ,उतरें पहन बसंती बाना
कुछ करके दिखलाना होगा,अगर पुराना वैभव पाना
झाँसी की रानी के तेवर और आत्म सन्मान चाहिए
हमको अपने सपनो वाला वो ही हिन्दुस्थान चाहिए
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
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