Monday, February 24, 2020

दिल की सुन-लोगों की मत सुन

मुझे ज़माना ,अपने अपने ढंग, से समझाता रहता है  
लेकिन मै  वो ही करता हूँ,जैसा मेरा मन कहता  है 
मम्मी कहती ऐसा करले,पापा कहते वैसा करले
कहते दोस्त ,संभल कर कुछ कर ,मत तू ऐसा वैसा करले
पडूं बीमार,कोई कहता है,जाओ,डाक्टर को दिखलाओ
कोई कहता ,डाक्टर छोडो,तुम देशी इलाज  करवाओ
देता है कोई सलाह कि होम्योपेथी आप दवा लो
कोई कहता किसी सयाने से तुम झाड फूंक करवा लो
कोई कहता ,जा हकीम के पास दवा लो तुम यूनानी
तुम आयुर्वेदिक इलाज लो,तभी बिमारी जड़ से जानी
लोगबाग़ कुछ समझाते है ,छोडो यार दवा का चक्कर
बाबा रामदेव के आसन ,तुमको स्वस्थ रखे जीवन भर
बीमारी में हालचाल जो ,मेरा कोई पूछने आता
तरह तरह की राय बता कर ,सलाहकार मेरा बन जाता
जितने मुंह है,उतनी बातें,कन्फ्यूजन  हरदम रहता है
लेकिन मै वो ही करता हूँ,जैसा मेरा दिल कहता है
बच्चे ने स्कूल करलिया ,आगे इसको क्या पढवाना
कितने ही मेरे शुभचिंतक ,देते मुझे सलाहें  नाना
यूं कर कोटा भेज इसे तू,आई आई टी की कोचिंग करवा
कोई कहे पी एम टी करवा,इसे डाक्टर अच्छा बनवा
अच्छा जॉब कराना है तो ,तू करवा इसको एम बी ए
जो अच्छी कमाई करवाना ,तो तू बनवा  ,इसको सी ए
कोई कहे फोरेन  भेज दे,वहां पढाई  करना  अच्छा
कोई कहे ये मत कर वर्ना ,निकल हाथ से जाए बच्चा
कोई ना कहता है पूछो,कि बच्चे के मन में क्या है
या उसका इंटरेस्ट किधर है,आगे  उसको बनना क्या है
हम खुद,कुछ हों या ना हो पर,सलाहकार सबसे अच्छे है 
कोई पूछे या ना पूछे,मुफ्त मशविरा दे देते है  
दिल की सुन,लोगों की मत सुन,बस इसमें ही सुख रहता है
इसीलिए मै वो करता हूँ,जो भी मेरा दिल कहता  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, February 21, 2020

शहादत 
अपनी रंगत ,अपनी सेहत ,अपनी खुशबू छोड़ कर ,
          भीगता है रोज ,घिसता , साफ़ करता गंदगी 
खुद फना हो जाता ,जिससे साफ़ इन्सां  हो सके ,
             ऐसे साबुन की शहादत  को है मेरी बंदगी   

घोटू

Thursday, February 20, 2020

ठोकर खाकर सीखेगा  

बात बात पर गर्मी मत  खा,
                            तू गम खाकर  सीखेगा 
ठीक किस तरह ,सेहत रखना ,
                             तू कम खाकर सीखेगा 
माँ बोली कि खा बादामें ,
                              अक्ल तेज हो जायेगी,
देसी घी का मालताल तू,
                              सब तर खा के ,सीखेगा 
कहा पिताजी ने चलने दो ,
                              इसको अपने ही ढंग से ,
इधर उधर जब ये भटकेगा ,
                               चक्कर खाकर  सीखेगा 
गुरु ने बोला ,जीवन का ये,
                           सफ़र,जटिल आसान नहीं
पथरीले रास्तों पर चल कर ,
                            ठोकर खाकर  सीखेगा 
समझदार कोई ये बोला ,
                            इसकी शादी करवा दो,
डाट ऊमर भर घरवाली की ,
                            ये खा खा कर सीखेगा 
मदन मोहन बाहेती'घोटू '

Tuesday, February 18, 2020

मजबूरी

कभी कभी मन चिंतित पर मुस्काना पड़ता है
सूनेपन में डर  लगता ,तो गाना  पड़ता  है
कर मनुहार खिलाये जब वो अपने हाथों से ,
भूख नहीं होती है फिर भी खाना पड़ता है
भले पड़ोसन ,बहुत सुंदरी ,तुम्हे सुहाती है ,
घरवाली से लेकिन काम चलाना पड़ता है
कितनी चीजें होती जो हमको ललचाती है ,
खाली जेब,मगर मन की समझाना पड़ता है
यूं तो हम झगड़ा करते है ,रौब दिखाते है ,
दुश्मन भारी हो, पीछे हट जाना पड़ता है  
घटघट में भगवान बसे है फिर भी भक्तों को
प्रभु के दर्शन करने मंदिर जाना पड़ता है
रोज रोज झगड़ा होता है ,पति से ना पटती ,
पर व्रत करके ,करवा चौथ मनाना पड़ता है
नई कार साइलेंट देख कर ,कहा फटफटी ने ,
क्या रईस को मुंह ताला लगवाना पड़ता है
'घोटू 'देख हुस्न को मन में कुछ कुछ होता है ,
लेकिन मन मसोस कर ही रह जाना पड़ता है ,

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
जल बिच मीन पियासी रे
जल बिच मीन पियासी रे, मोहे आये हांसी रे
पति दफ्तर में साहब ,इज्जत अच्छी खासी रे
घर में पत्नी ,उन्हें समझती ,एक चपरासी  रे
खाये परांठे खुद, पति को दे ,रोटी बासी रे
घर की मुर्गी ,दाल बराबर ,बात जरा सी रे
पत्नी का व्यवहार देख कर ,छाई उदासी रे
करे बुराई सबसे ,मुख पर ,मीठी मासी  रे
वोट न दे पत्नी भी ,हम है ,वो प्रत्याशी रे
 ऐसा हम पर,आया बुढ़ापा ,सत्यानाशी रे
सांप छुछन्दर गति ,मुसीबत अच्छी खासी रे
जल बिच मीन पियासी रे ,मोहे आये हांसी रे

घोटू 
आगमन -बुढ़ापे का

सुनो बुढ़ापा जब आता है
बार बार है नींद उचटती ,बेचैनी भी बढ़ जाती है
अपने सुनते नहीं जरा, ये बात हृदय में गड़ जाती है
आती काया में जर्जरता ,बढ़ती औरों पर निर्भरता
सहमा सहमा डरता डरता ,रोज आदमी जीता ,मरता
वाणी में आता विकार है ,सारा ओज  बिखर जाता है
सुनो बुढ़ापा जब आता है
थोड़ा चलते ,सांस फूलती ,और होती महसूस थकन है
जाती फिसल जवानी तन से ,और भटकता रहता मन है
काम नहीं कुछ ,पड़े निठल्ले ,कुछ करते तो थक जाते है
पार उमर जब करती सत्तर ,तब हम थोड़े पक जाते है
सब रंग ढंग बदल जाते है ,अंग अंग कुम्हला जाता है
सुनो बुढ़ापा जब आता है

घोटू 
जीवन
 
यही कामना ,सबके मन में , ज्यादा  जिये
सुखमय जीवन बीते ,यूं ही ,बिना कुछ किये
,
जो आया है ,वो जाएगा ,सच  शाश्वत है  
सबकी ही साँसों की संख्या  ,पूर्व नियत है
फिर भी हम कोशिश करते है कहाँ कहाँ से
 लम्बी उमर हमे मिल जाय  यहाँ वहां से
कैसे भी अमृत मिल जाए ,उसको पियें
यही कामना ,सबके मन में ,ज्यादा जियें

 जितनी लम्बी उमर ,बुढ़ापा उतना लम्बा
तन जर्जर ,इच्छा जीने की ,यही अचम्भा
जितने भी दिन जियें ,चैन से ,हंसी ख़ुशी से
प्रेमभाव और मेलजोल हम रखें सभी से
स्वस्थ रहें, निरोग,प्रेम से ,खाएं, पियें
यही कामना सबके मन में ,ज्यादा जियें

घोटू