Wednesday, June 3, 2020

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Florinda Lechner �












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मेरी जीवन शैली बदल गयी

                              १
जब कंवारा था ,मनमौजी था ,अपनी मर्जी का मालिक था
कॉलेज की हर सुन्दर लड़की ,पर मरता ,उनका आशिक था
वो दिन बेफिक्र लड़कपन के ,अल्हड़पन था और मस्ती थी
था जोश जवानी का मन में ,जीवन में हुस्न परस्ती थी
लेकिन फिर मेरे जीवन में ,आयी एक सुन्दर सी बाला
जिसने मेरी पत्नी बन कर ,मेरा  व्यवहार  बदल डाला
उसके अनुशासन में बंध कर ,मेरी हवा ही सारी निकल गयी    
जब से मैं शादीशुदा हुआ ,मेरी जीवन शैली  बदल गयी
                           २
मैं बना गृहस्थ ,नौकरी कर ,जाता था रोज सुबह ऑफिस
संध्या को सजी धजी बीबी ,स्वागत करती थी देकर 'किस '
मस्ती से कटता था जीवन ,पर आया ऐसा खलनायक
जिससे डर पत्नी ने अपने ,होठों को लिया ,मास्क से ढक
ना  तो चुंबन ,ना हस्तमिलन ,ना बाहुपाश ,दो गज दूरी
ऐसा लॉक डाउन हुआ शहर ,गृह कार्य करो ,थी मजबूरी
करते घर का झाड़ू पोंछा ,मेरी चर्बी सारी  पिघल गयी
जब से आया है कोरोना ,मेरी जीवन शैली बदल गयी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Tuesday, June 2, 2020

अब तो दया करो भगवान

हे भगवान !
कृपानिधान !
क्यों हमारे जज्बातों से खेल रहे है
हम कितनी मुसीबतें झेल रहे है
पूरी दुनिया में कोरोना के वाइरस की मार है
हर तरफ हाहाकार है
पिछले ढाई महीनो से देश में तालाबंदी है
घर से निकलने की पाबंदी है
दूकान ,बाजार कारखाने सब बंद पड़े है
प्रवासी मजदूर वापस घर जाने को अड़े है
क्योंकि यहाँ पड़ रहे है रोजी रोटी के लाले
पर रेल और बसों पर भी पड़े है ताले
तो वो होकर के परेशान और बेकल
निकल पड़े है घर की ओर पैदल
अफरा तफरी का माहौल हो रहा है
अर्थव्यवस्था का बिस्तर गोल हो रहा है
स्तिथि संभाले नहीं सम्भल पा रही है
हर तरफ त्राहि त्राहि छा रही है
और आप  अपने सब मंदिर बंद करवा ,
आराम फरमा रहे है
काहे हमें इतना सता रहे है
सितम पर सितम ढा रहे है
पिछले तीन महीनो में देहली को ,
पांच पांच बार भूकंप से कँपाया
 पूर्वी तटों पर विनाशकारी तूफ़ान आया
वहां के निवासियों पर अभी भी संकट है
पश्चिम तट पर भी तूफ़ान आने की आहट है
कहीं भीषण गर्मी है ,कहीं बाढ़ आरही है
करोड़ों की संख्या में टिड्डियाँ आकर ,
हमारी फसलें खा रही है
एक तरफ पकिस्तान की,
 आतंकी गतिविधियां कायम है
दूसरी तरफ चाइना दिखा रहा अपना दम है
और तो और वो पिद्दी सा,
 नेपाल भी फुफकारने लगा है
आदमी महसूस कर रहा ठगा है
और प्रभु आप तो खुद ही देख रहे है
ऐसे माहौल में भी कुछ विरोधी दल ,
अपनी चुनावी रोटियां सेक रहे है
और आप हम पर नित्य नयी विपत्ति देकर ,
लोहे के चने चबवा रहे है
और खुद क्षीरसागर में लेटे ,
लक्ष्मीजी से पैर दबवा रहे है
हम से हो गयी है कौनसी गलती
जो लेकर आरहे हो इतनी त्रासदी
इतनी सारी  मुसीबतें ,वो भी एक साथ
बस बहुत हो गया दीनानाथ  
हम  आपकी संतान है
अभी नादान है
पर आप तो भगवान  है
सर्वशक्तिमान है
हे दयामय हम पर दया करो
हमारी विपदायें हरो
अपने इन बच्चों पर,
 थोड़ी कृपादृष्टि दिखला दो
कोरोना के संहार का उपाय बतला दो
हमारी डगमगाती जिंदगी को,
 फिर से पटरी पर ला दो

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
अलोक के जन्मदिन पर

ढूंढो तीनो लोक में ,लेकर आप चिराग
नहीं मिलेगा आपको,अलोक सा दामाद
अलोक सा दामाद ,गुणी है सुन्दर प्यारा
उसका और श्वेता बिटिया का साथ निराला
कह 'घोटू 'है यही प्रार्थना अब ईश्वर से
बनी रहे जोड़ी जीवन भर खुशियां बरसे

घोटू 

Monday, June 1, 2020

             संगत का असर

              एक छक्का
देखो संगत के असर,का है कितना तथ्य
दाल बिचारी मूंग की ,बन जाती है पथ्य
बन जाती है पथ्य ,साथ चावल का पाती
तो स्वादिष्ट सुपाच्य ,खिचड़ी मन को भाती
मिला मसाले तलें ,मंगोड़ी का लो जलवा
घी चीनी संग बने गरिष्ठ  दाल का हलवा

घोटू 

Saturday, May 30, 2020

पलायन गीत
(कोरोना काल में गावों को पलायन
करनेवाले मजदूरों की मानसिकता
दर्शाता हुआ एक गीत )

फैल रह्यो शहर में कोरोनवा रे
गाँव चलो  भइया  फौरनवा  रे
बंद है बज़ार और कारखाने जब तक
रोजी नहीं रोटी नहीं ,भूखे पेट कब तक
जियेंगे हम बिना भोजनवा रे
गाँव चलो भइया फौरनवा रे
आई चीन देश से है ,बिमारी जबर है ये
ताला बंदी लम्बी ही ,खिचेंगी खबर है ये
कैसे होगा अपना गुजरवा रे
गाँव चलो भइया फौरनवा रे
करेंगे क्या इतने दिन ,बैठ के बेकार यहाँ
बिमारी मारे न मारे ,भूख देगी मार यहाँ
अब तो उचट गया मनवा रे
गाँव चलो भइया फौरनवा रे
होय रहे खरचा है ,थोड़े जो बचे थे पैसे
रेल बंद ,बेस बंद ,ऐसे में जाएंगे  कैसे
आओ चले निकल पैदलवा रे
गाँव चलो भइया फौरनवा रे
गाँव में परिवार संग ,खुशियां अनोखी होगी
रूखीसूखी जैसी भी हो,खाने को दो रोटी होगी
अपनी माटी अपना अंगनवा रे
गाँव चलो भइया फौरनवा रे

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '