Saturday, June 6, 2020

देश की दशा -तीन छक्के

केरल से कश्मीर तक ,परेशान  है देश
दिन दिन बढ़ते जा रहे ,कोरोना के केस
कोरोना के केस ,चीन आँखें दिखलाता
आतंकी हरकत से पाक ,बाज ना आता
बार बार भूकम्प आ रहे , जाते है धमका
तूफानों ने बदला है मिज़ाज़ मौसम का

अर्थव्यवस्था देश की ,काफी खस्ता हाल
नहीं सुधरती आ रही ,हमे नज़र फिलहाल
हमे नज़र फिलहाल ,खुल रही तालाबंदी
खुलने लगे बाजार ,मगर छाई  है मंदी
पृथ्वी की ग्रह दशा और दिन लगते बिगड़े
एक माह में ,तीन तीन जब ग्रहण है पड़े

धीरे धीरे हो रहा ,लॉक डाउन ,अनलॉक
पर दिल्ली ने कर रखे ,अपने रस्ते ब्लॉक
अपने रस्ते ब्लॉक ,आदमी परेशान है
राजनीति की चला रहे नेता दूकान है
बीच बीच पप्पूजी भी  टी वी पर आते
हम भी है मौजूद ,जगत को ये दिखलाते

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
 

Friday, June 5, 2020

फिल्म -तीसरी कसम
गीत -पिंजरे वाली मुनिया
       पेरांडी

दुनिया को सारी नचाय  दियो री ,चाइना की कोरनवा

उड़ उड़ बैठी तो इटली ये पहुंची ,
पिज़ा को इडली बने दियो री ,चाइना की कोरनवा

उड़ उड़ बैठी जो पेरिस नगरिया ,
आइफ़िल को टावर हिलाय दियो री ,चाइना की कोरनवा

उड़ उड़ बैठी जो पहुंची अमेरिका ,
ट्रम्प के छक्के छुड़ाई दियो री ,चाइना की कोरनवा

उड़ उड़ बैठी जो भारत में पहुंची ,
दो महीने घर में बिठाय दियो री ,चाइना की कोरनवा

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
आ अब लौट चलें

पहले शहर छोड़ आये थे
कोरोना   से  घबराये  थे
काम और धंधे बंद पड़े थे
हम घर पर बेकार पड़े थे
ना कमाई ,कैसे खायेंगे
गाँव जायेंगे ,बच जाएंगे
सबके मन में यही हुड़क थी
देखादेखी गयी  भड़क थी
रेल ,बसें कोई न रहे चल
निकल पड़े हम घर को पैदल
रास्ते मे तकलीफें भोगी
पड़े बीमार ,हुए कुछ रोगी
रो रो काटा ,कठिन सफर को
जैसे तैसे पहुंचे घर को
सुखी हुआ मन सबसे मिलके
थोड़े दिन खुश होकर हुलसे
पर गाँवों में काम नहीं था
जीवन भी आसान नहीं था
कमा भेजते थे हम पैसे
घर चलता था जैसे तैसे
हम पहुंचे तो फरक पड़ गया
घर का खर्चा और बढ़ गया
और कमाई ना कोड़ी भर की
जिम्मेदारी सर पर, घर की
मन में उठी समस्या भीषण
यूं कैसे काटेंगे जीवन
उधर शहर की तालाबंदी
पर भी उठने लगी पाबंदी
खुली फैक्टरी और दुकाने
लोग पुराने ,लगे बुलाने
वहां जीवन आया पटरी पर
कोरोना का सभी जगह डर
ये जल्दी ना जानेवाला
करना इसके साथ गुजारा
सावधानियां रखनी होगी
तब कोई ना होगा रोगी
शहरों में इसका इलाज है
जो गाँवों में नहीं आज है
अच्छा होगा ,नहीं डरे  हम
शहर जाएँ ,ना देर करें हम
गाँवों में है नहीं गुजारा
जाना होगा शहर  दोबारा
मेहनत करें ,कमाए ,खाये
फिर से रोजी रोटी पायें
गाँवों में कुछ रोज भले हम
आओ फिर से लौट चले हम

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
मैं  बेवकूफ हूँ  

ढाल न पाता खुद को सबके अनुरूप हूँ
सब कहते ,अव्वल दर्जे का बेवकूफ  हूँ

मेरे अंदर छुपा हुआ कोई चोर नहीं है
मन में कुछ है और मुख में कुछ और नहीं है
लोगों की हाँ में हाँ नहीं मिला पाता हूँ
इसीलिए मैं थोड़ा मुंहफट कहलाता हूँ
चाटुकारिता ,चमचागिरी  नहीं आती है
लोग दूर रहते है ,मेरे कम साथी  है
गलत काम को देख ,बैठता नाहीं चुप हूँ
सब कहते अव्वल दर्जे का बेवकूफ हूँ

ये सच है ,दुनियादारी मुझको ना आती
मख्खनबाजी करने से तबियत घबराती
सच कहता तो कड़वी लगती ,मेरी बातें
इसीलिए ,झूठें ,लम्फट मुझसे घबराते
मेरी यह स्पष्टवादिता ,दुश्मन  मेरी
ना आती है करना चुगली हेरा फेरी
मुंह देखी ना ,खरी बात का मैं  स्वरूप हूँ
सब कहते ,अव्वल दर्जे का बेवकूफ हूँ

मदनमोहन बाहेती ;घोटू '
बार बार भूकंप

घर और परिवार में हमेशा खटपट सा ,
कुछ न कुछ लगा ही रहता है
किसी की कोई बात ,किसी को चुभती है ,
कोई चुपचाप सहता है
कोई फटाफट  दे देता है जबाब ,
अपनी प्रतिक्रिया दिखला ,
साफ़ कर देता है हिसाब
और मन का मलाल  हो जाता है सफा  
और मामला हो जाता है रफा दफा  
थोड़ा सा गुस्सा ,थोड़ी सी माफ़ी
सुचारु जिंदगी जीने के लिए है काफी
पर कुछ लोग इन छोटी छोटी बातों को ,
मन में दबा कर रख लेते है
प्रत्यक्ष में कोई प्रतिक्रिया नहीं देते है
बस सहन किये जाते है
पर अंदर से छटपटाते है
और एक दिन उनके मन में ,
इन बातों का गुबार इतना भर जाता है
कि जब फूटता है तो,
 परिवार का विभाजन कर जाता है
वैसे ही जब प्राकृतिक व्यवस्थाएं
उथल पुथल होती है
तो पृथ्वी के मन में हलचल होती है
तो पृथ्वी थोड़ी बहुत हिल कर
अपने को एडजस्ट लेती है कर
उस समय भूकंप के हल्के झटके आते है
तो सब घबराते है
मित्रों ,हमारी ये पृथ्वी माता ,
हमेशा से सहनशील रही है
जो हर बार एडजस्ट करके ठीक हो रही है
वरना कुपित होकर ,अगर
अपनी भावनाओं को रखेगी दबा कर
और मन का गुबार एक दिन जब फूट पड़ेगा
तो एक बड़ा भूकंप बन कर कहर टूट पड़ेगा
इसलिए अच्छा है भूकंप के ,
हल्के हल्के झटके आये और चले जायें
और हम एक बड़े भूकंप की,
 विभीषिका से बच जायें

मदन मोहन बाहेती ;घोटू '

Wednesday, June 3, 2020

re: Cheap Facebook Traffic

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Regards
Florinda Lechner �












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मेरी जीवन शैली बदल गयी

                              १
जब कंवारा था ,मनमौजी था ,अपनी मर्जी का मालिक था
कॉलेज की हर सुन्दर लड़की ,पर मरता ,उनका आशिक था
वो दिन बेफिक्र लड़कपन के ,अल्हड़पन था और मस्ती थी
था जोश जवानी का मन में ,जीवन में हुस्न परस्ती थी
लेकिन फिर मेरे जीवन में ,आयी एक सुन्दर सी बाला
जिसने मेरी पत्नी बन कर ,मेरा  व्यवहार  बदल डाला
उसके अनुशासन में बंध कर ,मेरी हवा ही सारी निकल गयी    
जब से मैं शादीशुदा हुआ ,मेरी जीवन शैली  बदल गयी
                           २
मैं बना गृहस्थ ,नौकरी कर ,जाता था रोज सुबह ऑफिस
संध्या को सजी धजी बीबी ,स्वागत करती थी देकर 'किस '
मस्ती से कटता था जीवन ,पर आया ऐसा खलनायक
जिससे डर पत्नी ने अपने ,होठों को लिया ,मास्क से ढक
ना  तो चुंबन ,ना हस्तमिलन ,ना बाहुपाश ,दो गज दूरी
ऐसा लॉक डाउन हुआ शहर ,गृह कार्य करो ,थी मजबूरी
करते घर का झाड़ू पोंछा ,मेरी चर्बी सारी  पिघल गयी
जब से आया है कोरोना ,मेरी जीवन शैली बदल गयी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '