Saturday, July 11, 2020

कौन कहता तुम पुरानी

नहा धो श्रृंगार करके
और थोड़ा सजसंवर के
भरी लगती ताजगी से
एक नूतन जिंदगी से
प्यार खुशबू से महकती
पंछियों जैसा चहकती
वही प्यारी सी सुहानी
कौन कहता तुम पुरानी

वो ही सुंदरता ,सुगढ़ता
प्यार आँखों से उमड़ता
प्रेम वो ही ,वो ही चाहत
वो ही पहली मुस्कराहट
राग वो ही साज वो  ही
प्यार का अंदाज वो ही
हो गयी थोड़ी सयानी
कौन कहता तुम पुरानी

नाज वो ही वो ही नखरे
और कातिल वो ही नज़रें
वो ही चंचलता ,चपलता
सादगी वो ही सरलता
वो ही मस्तानी अदायें
आज भी मुझको रिझायें
प्रेम करती हो दीवानी
कौन कहता तुम पुरानी

वो ही शरमाना ,सताना
रूठ जाना और मनाना
वो ही पहले सी नज़ाकत
शोखियाँ वो ही शरारत
हंसी वो ही खिलखिलाती
आज भी बिजली गिराती
तुम हो मेरी राज रानी
कौन कहता तुम पुरानी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
जिंदगी

उमर बढ़ती है
जिंदगी घटती है
चाहत बढ़ती है
संतुष्टि घटती है
दौलत बढ़ती है
शांति घटती है
हवस बढ़ती है
हंसी घटती है
और की चाह
करती है तबाह
मौत का दिन तय है
तो काहे का भय है
जब तक जियो
हंस कर जियो

घोटू 
आज मन बदमाश सा है

आज मन बदमाश सा है  
करेगा हरकत ये कोई ,हो रहा अहसास सा है
आज मन बदमाश सा है

न जाने क्यों ,आज अंदर ,सुगबुगाहट हो रही है
कुछ न कुछ करने की मन में ,कुलबुलाहट हो रही है
जागृत  सी हो रही है  ,वही फिर  आदत  पुरानी
कोई आ जाये  नज़र में ,करें  उससे  छेड़खानी
उठ रहा  शैतानियों का ,ज्वार मन में ख़ास सा है
आज मन बदमाश सा है

बहुत विचलित हो रहा,उतावला   और  बेसबर है
आज  मौसम है रूमानी ,क्या उसी का ये असर है
चाहता मिल जाये कोई , बना  कर कोई बहाना
शरारत  करने को आतुर ,हो रहा है ये दीवाना
डोलता ,कर मटरगश्ती ,कर रहा तलाश सा है
आज मन बदमाश सा है

देख सब दुनिया रही है ,डर इसे पर नहीं किंचित
लाख कोशिश कर रहा मैं ,पर न हो पाता नियंत्रित
गुल खिलायेगा कोई  ये ,ढूंढ बस मौका रहा है
आज यह व्यवहार उसका ,खुद मुझे चौंका रहा है
शराफत पर लग रहा ,जैसे ग्रहण  खग्रास सा है
आज मन बदमाश सा है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Friday, July 10, 2020

प्रिय स्नेही जनो
सबसे पहले मैं स्वागत करता हूँ अग्रवाल परिवार का
जिनके साथ हमारे मधुर स्नेह बंधन बंधने जा रहे है
फिर बधाई है शिवांगी और अक्षय को जो परिणय सूत्र
की प्रथम सोपान पर आज चढ़ रहे है ,
कहते है
  समय के संग हमको चलना चाहिये
  रुख लचीला ,अपना रखना चाहिए
  जैसी भी हो सामने परिस्तिथिया ,
  मान्यता अपनी  बदलना  चाहिये
इन्ही पंक्तियों का अनुसरण करते हुए
आज का जो कार्यक्रम रखागया है वह
उत्तम सुधारवादी प्रयास है और इसके लिए
दोनों पक्षों को बधाई
आज के इस शुभ अवसर पर,
 एक छोटी सी कविता प्रस्तुत है

शिवांगी का आज रोका हो गया
अतुल ने कर दी मुनादी ज़ूम पर
सुनीता की  चाह  पूरी हो गयी ,
और खुश है दादा ,दादी ज़ूम पर
अनिल ने गाना सुनाया झूम कर ,
धूम बच्चों ने  मचा दी ज़ूम पर
हमने आशीर्वाद और शुभकामना
वर वधु को पहुँचादी  ज़ूम पर
यदि रही कोविद की पाबंदियां ,
तो सगाई ,होगी शादी ज़ूम पर
न तो डेस्टिनेशन ना इवेंट कुछ ,
एकदम सिम्पल और सादी ज़ूम पर
बैंड ना ,म्यूजिक का सिस्टम बजेगा ,
और होंगे सब बाराती ज़ूम पर
स्वामीजी उज्जैन से  मंतर पढ़ें ,
नॉएडा में होगी शादी ज़ूम पर
ख़ास थाली सबको हल्दीराम की
स्विगी से घर घर पहुंचादी घूम कर
दिखावे की होड़ सब थम जायेगी ,
बात ये अच्छी बनादी ज़ूम पर
बजट लाखों का था ऐसा होगा फिर  ,
सब फिजूल खर्ची बचा दी ज़ूम पर
काम बच्चों के उमर भर आएगी ,
ऍफ़ डी यदि जो बनादी ज़ूम पर

धन्यवाद और बधाइयाँ 

Wednesday, July 8, 2020

ज़ूम पर

ऐसी कोविद ने करी पाबंदियां ,
बच्चों की शादी करादी ज़ूम पर
न तो मैरिज हॉल ना इवेंट  था ,
एकदम सिम्पल और सादी ज़ूम पर
बेंड ना था,म्यूजिक का सिस्टम बजा,
और थे सारे बाराती ज़ूम पर
पंडितजी ने मंत्र अपने घर पढ़े ,
हमने सब रस्मे निभादी,ज़ूम पर
वर वधू ने सात फेरे ले लिए ,
और वरमाला पहनादी ज़ूम पर
ख़ास थाली ,सबको हल्दीराम की ,
स्विगी ने घर घर भिजादी घूम कर
आइफ़िल टावर के संग फोटो खिंचा ,
हनीमून सबको दिखादी  ज़ूम पर
दिखावे की होड़ सारी थम गयी ,
बात ये अच्छी  बना दी ,ज़ूम पर
बजट लाखों का था पर ऐसा हुआ ,
सब फिजूल खर्ची बचा दी ज़ूम पर
काम बच्चों के उमर भर आएगी ,
एफ डी  हमने बना दी झूम कर

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 

Tuesday, July 7, 2020

बीबी और ख़ुशी

कहने को तो कितना भला बुरा कहते है
इधर उधर भी नज़र मारते ही रहते है
लेकिन एक वो ही जो घास डालती तुमको ,
अपनी अपनी बीबी से सब खुश रहते है

जैसी भी ,साथ तुम्हारा निभा रही है
तुम्हारा घर बार ,गृहस्थी चला रही है
बड़े प्यार से खाना तुमको पका खिलाती
तुम्हारे सुख दुःख की जो है सच्ची साथी
देती दूध ,गाय की लात ,सभी सहते है
अपनी अपनी बीबी से सब खुश रहते है

एक वो ही जो वाकिफ तुम्हारी रग रग से
तुम्हारे खातिर  लड़ सकती, सारे जग से
जिसने माँ और बाप छोड़ कर तुमको पाया
तुमको परमेश्वर माना और प्यार लुटाया
वो ही पोंछती ,दुःख के आंसूं ,जब बहते है
अपनी अपनी बीबी से सब खुश रहते है

साथ समय के जब ऐसे भी दिन आते है
 अपने वाले  ,सभी पराये हो जाते  है
रूप जवानी ,साथ उमर के ढल जाती है
काम बुढ़ापे में केवल बीबी आती है
सुख दुःख की बातें जिससे ,सुनते कहते है
अपनी अपनी बीबी से सब खुश रहते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू '
जाने कहाँ गए वो दिन

याद आते है हमें वो दिन
जब जवानी के चमन में ,
मुस्कराती थी कलियाँ हसीन
हमेशा रहता था मौसम बहार का
हमारी भवरें सी नज़रें ,
टॉनिक पियां करती थी उनके दीदार का
लहराती जुल्फें ,हिरणी सी  नज़र
गुलाबी गाल,रसीले अधर
मोती सी दन्त लड़ी,कातिल मुस्कान
मीठी सी बोली जैसे कोयल का गान
याने पूरा का पूरा चन्द्रमुख दिखता था
प्यार जल्दी हो जाता देर तक टिकता था
पर अब इस कोरोना के खौफ ने ,
ऐसा सितम ढाया है    
हर हसीन चेहरे को मास्क में छुपाया है
किसी भी लड़की को देखो ,
बस दिखती है दो चमकती आँखें
और अपना बाकी चेहरा ,
रखती है वो मास्क में छुपाके
अब हम उन्हें कितना भी देखे घूर के
नजदीक से या दूर से
पता ही नहीं लगता उनका मुख कैसा है
उनके रुखसारों का रुख कैसा है
गुलाबी है या पीले है
कसे हुए है या ढीले है
 चिकने है या उनपर पिम्पल है
हँसते तो क्या गालों पर पड़ते डिम्पल है
सुंदरता के सब पैमाने
उनने छुपा रखें है अनजाने
पूरी की पूरी नाक ढकी रहती है
पता नहीं साफ़ है या बहती है
पतली है या मोटी  है
तिकोनी है या बोठी है
तोते सी है या समोसे सी है
पता ही नहीं लग पाता ,कैसी है
उनके 'अपर लिप्स 'पर बाल तो नहीं है
मर्दों जैसा हाल तो नहीं है
और चेहरे के सबसे मतवाले
सब से ज्यादा काम में आनेवाले
याने की उनके होठों का क्या हाल है
डार्क है या लाल है
मोटे  है या पतले है
सूखे है या रस से भरे है
चिकने है या उजाड़ है
छोटी है या लम्बी ,उनकी मुंहफाड़ है
और उनकी दंत लड़ी
मोती सी सफ़ेद है या पीली पड़ी
टेढ़े मेढे है या सीधे दिखलाते है
होठों के बाहर तो नहीं नज़र आते है
सबकुछ ढका रहने से खुल न पाता राज़
कैसा है उनकी मुस्कराहट का अंदाज
उनकी हंसी कातिल है कि नहीं
उनके होठों या गालों पर,तिल है कि नहीं
और उनकी ठोड़ी
तीखी है या  बैठी हुई है निगोड़ी  
गोया उनका पूरा मुखड़ा
लम्बा पतला है या गोल चाँद का टुकड़ा
और उनकी बोली मधुर है या भर्राई
मास्क के कारण ये बात समझ ना आई
बस फुसफुसाहट ही देती है सुनाई
समझ ही नहीं पाता ये दिमाग है
कोकिला सी मधुर है या काग है
तो जब चेहरे की सुंदरता का सब सामान
जब पूरा ही ढका रहता है श्रीमान
तो ये अंदाज लगाना भी मुश्किल हो जाता ,
कि सामनेवाली बूढी है या जवान
बस दो घूरती हुई आँखें
और हम क्या ताकें
हम देख ही नहीं पाते
उनके चेहरे का नूर
परी है या हूर
बदसूरत है या हसीन
प्रोढ़ा है या कमसिन
ऐसे में तो बस नैन लड़ सकते है
पर इश्क़ में कैसे आगे बढ़ सकते है
क्योकि जब तक ना हो पूरा दीदार
कैसे हो सकता है प्यार
फिर मॉल ,सिनेमा ,गार्डन और रेस्त्रारंट
सब पड़े है बंद
डेटिंग पर जाने का स्कोप नहीं है
दोनों के मुंह पर मास्क है ,
चुंबन की भी होप नहीं है
ऐसे हालातों में कैसे प्यार हो मुमकिन
और याद आते है वो पुराने दिन
जाने कहाँ गये वो दिन

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '