Wednesday, August 12, 2020

भजन

प्रभु आपके प्रेम में ,पागल मैं ,पगले से प्यार करोगे क्या
मैं फंसा हुआ मझधार मेरा ,तुम बेडा पार करोगे  क्या
नारायण नाम पुकार रहा हूँ दुष्ट अजामिल के जैसा ,
गज हूँ मैं ,ग्राह के चंगुल में ,मेरा उद्धार करोगे क्या
मैं  कुब्जा सा टेड़ा मेढा ,निकली मोह माया की कूबड़ ,
तुम मुझको ठोकर एक मार ,मेरा उपचार करोगे क्या
मैं छल की मारी अहिल्या सा ,निर्जीव शिला बन पड़ा हुआ ,
निज चरणों की रज से छूकर ,मेरा उद्धार करोगे क्या
मैंने शबरी से चख चख कर ,कुछ बैर रखे है चुन चुन कर ,
जूठे है ,लेकिन मीठे है ,इनको स्वीकार  करोगे क्या
हे नाथ,अनाथ मैं अज्ञानी, भोग और विलास में डूब रहा ,
अब आया शरण आपकी हूँ ,भवसागर पार करोगे क्या

मदन मोहन बाहेती'घोटू '
मैं रणछोड़

शुरू शुरू में गरम खून था, बहुत जोश उत्साह भरा था
मन में एक गलतफहमी थी ,जो मैं सोचूँ ,वही खरा था
चमचागिरी नहीं करता था, ना आती थी मख्खनबाजी
मेरे इस व्यवहार के कारण ,रहती थी सबकी नाराजी
सच को सच कहने चक्कर में ,सबसे उलझ उलझ जाता था
लोग मुझे झगड़ालू कहते ,पर क्यों समझ नहीं आता था
मेरे अड़ियल 'एटीट्यूड 'के ,कारण मुझसे सब चिढ़ते थे
बात बात में तू तू मैं मैं ,होती ,मुझसे आ भिड़ते थे
बिना वजह से पाल लिया करता था कितनो से ही अनबन
कार्यकुशल था ,लेकिन फिर भी ,होता मेरा  नहीं प्रमोशन
शुभचिंतक एक मित्र मिल गए ,उनने मुझको जब समझाया
रहो रोम में रोमन  बन कर  ,'यस सर 'का  जादू बतलाया  
मैंने उनकी बात मान ली ,बदला अपना  तौर तरीका
तौबा अड़ियलपन से कर ली , मख्खनबाजी करना सीखा
जब से मैंने छोड़ दिया रण ,खुशियों की बरसात हो रही
खूब प्रमोशन मुझे मिल रहे ,किस्मत मेरे साथ हो रही
घर पर भी बीबी से अक्सर ,रोज रोज होता झगड़ा था
वो कहती  मेरी मानो ,मैं ,जिद पर रहता सदा अड़ा था
वही पालिसी ऑफिस वाली ,घर पर पत्नी संग अपनाई
छोड़ा युद्ध ,कर दिया सरेंडर ,जीवन में फिर खुशियां छाई
प्यार बढ़ा पत्नी का दूना ,अब न रूठना और मनाना
सुख शांति का मूलमंत्र है ,बन रणछोड़ ,प्यार फैलाना
छोड़ा रण श्री कृष्ण चंद्र ने ,जबसे वो रणछोड़ कहाये
बने द्वारिकाधीश ,शांति से ,बाकी जीवन वहीँ  बिताये
इसीलिये  मेरे प्रिय मित्रों ,सबको मेरी , यह  सलाह है
मत झगड़ो,रणछोड़ बनो तुम ,सच्चे सुख की यही राह है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Monday, August 10, 2020

रणछोड़ कृष्ण

गोकुल छोड़ा ,गोपी छोड़ी और नन्द यशोदा को छोड़ा
जिसके संग नेह लगाया था ,उस राधा का भी दिल तोडा
खारे सागर का तट भाया ,मीठी यमुना के छोड़ घाट
और बसा द्वारका राज किया ,छोड़ा मथुरा का राजपाट
रबड़ी छोड़ी ,खुरचन छोड़ी ,पेड़े छोड़े ,छोड़ा माखन
ढोकले ,फाफड़े मन भाये ,तज दिए भोग तुमने छप्पन
उत्तर भारत की राजनीति में चक्र तुम्हारा था चलता
और युद्ध महाभारत के भी ,तुम्ही तो थे करता धरता
तुमने गीता का ज्ञान दिया और पूजनीय ,सिरमौर बने
पर जब उत्तर भारत छोड़ा ,रण छोड़ दिया ,रणछोड़ बने
उत्तर की संस्कृति को तुमने ,पश्चिम में जाकर फैलाया
गौ प्रेम तुम्हारा गोकुल का ,गुजरात के घर घर में छाया
जो प्रेम भाव तुमने सीखा ,बचपन में गोपी ,राधा से
गुजरात में जाकर सिखा दिया,तुमने सबको मर्यादा से
वह महारास वृन्दावन का ,बन गया डांडिया और गरबा
कहती है नमक को भी मीठा ,इतनी शांति प्रिय है जनता
यह तुम्हारा रणछोड़ रूप ,है प्रेम ,शांति का ही प्रतीक
घर घर में इसी रूप में तुम ,पूजे जाते  द्वारिकाधीश

मदन मोहन बाहेती ;घोटू '  
आधुनिक सुदामा चरित्र 
( ब तर्ज नरोत्तमलाल )

१ 
मैली और कुचैली ,ढीलीढाली और फैली ,
 कोई बनियान जैसी वो तो पहने हुए ड्रेस है 
जगह जगह फटी हुई ,तार तार कटी हुई ,
सलमसल्ला जीन्स जिसमे हुई नहीं प्रेस है 
बड़ी हुई दाढ़ी में वो दिखता अनाडी जैसा ,
लड़की की चोटियों से ,बंधे हुए  केश है 
नाम है सुदामा ,कहे दोस्त है पुराना ,
चाहे मिलना आपसे वो ,करे गेट क्रेश है 
२ 
ऑफिस के बॉस कृष्णा,नाम जो सुदामा सुना ,
याद आया ये तो मेरा ,कॉलेज का फ्रेंड था 
सभी यार दोस्तों से ,लेता था उधार पैसे ,
मुफ्त में ही मजा लेना ,ये तो उसका ट्रेंड था 
लोगों का टिफ़िन खोल ,चोरी चोरी खाना खाता ,
प्रॉक्सी दे मेरी करता ,क्लास वो अटेंड था 
पढ़ने में होशियार ,पढ़ाता था सबको यार ,
नकल कराने में भी ,एक्सपीरियंस हेंड था 
३ 
कृष्ण बोले चपरासी से ,जाओ अंदर लाओ उसे ,
और सुनो केंटीन से ,भिजवा देना ,चाय  दो 
सुदामा से कृष्ण कहे ,इतने दिन कहाँ रहे ,
व्हाट्सएप,फेसबुक पर,कभी ना दिखाय  दो 
फ्रेण्डों के फ्रेंड कृष्ण ,सुदामा से करे प्रश्न ,
थके हुए लगते हो, थोड़ा  सा सुस्ताय लो 
होकर के इमोशनल ,कृष्ण बोले माय डीयर,
भूखे हो ,पिज़ा हम,मंगवा दें,खाय  लो 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
ये लोग किसलिए जलते हैं

ये लोग किसलिए जलते है
इर्षा के मारे तिल तिल जल ,
मन ही मन बहुत उबलते है
ये लोग किसलिए जलते है

कोई जल कर होता उज्जवल ,
बन कर भभूत ,चढ़ता सर पर
कोई जल कर बनता काजल ,
नयनो में अंज, करता सुन्दर  
कोई जल कर दीपक जैसा ,
फैलता जग भर  में प्रकाश
तो कोई शमा जैसा जलता ,
परवानो का करता  विनाश
हो पास नहीं जिसका प्रियतम ,
वह विरह आग में जलता है
भोजन को पका ,पेट भरने ,
घर घर में चूल्हा जलता है
कोई औरों की प्रगति देख ,
जलभुन कर खाक हुआ करता
कोई  गुस्से में गाली दे ,
जल कर गुश्ताख हुआ करता
कोई की प्रेम प्रतीक्षा में ,
जलते आँखों के दीपक है
होते सपूत है जो बच्चे ,
वो कहलाते कुलदीपक है
मनता दशहरा,जला रावण ,
दीपावली  , दीप जलाते  है
होली पर जला होलिका को,
हम सब त्यौहार मनाते है
पूजा में दीप आरती में ,
करते जब हवन ,जले समिधा
माँ  के मंदिर में ज्योत जले ,
मातारानी, हरती दुविधा
जलना संस्कृति का अभिन्न अंग ,
काया जलती ,जब मरते है
ये लोग इसलिए जलते है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '         

Sunday, August 9, 2020

देवी वंदन

मैंने जब जब भी कहा तुम्हे ,लक्ष्मी ,तुम दौड़ी आयी और ,
श्रद्धा से सेवाभाव लिए ,तुम लगी दबाने पैर  मेरे
जब तुम्हे पुकारा सरस्वती ,तुम आ जिव्हा पर बैठ गयी ,
अपनी तारीफ़ में लिखवाये ,कविता और गीत बहुतेरे
जब अन्नपूर्णा मैं बोला ,मुझको स्वादिष्ट मिला भोजन ,
हो गयी  तृप्त  मेरी काया ,ढेरों मिठाई ,पकवान मिले
गलती से दुर्गा कभी कहा ,तुमने दिखलाये निज तेवर ,
हो गयी खफा और कह डाले ,मन के सब शिकवे और गिले
तुम सती साध्वी सीता सी ,मेरे संग संग ,भटको  वन वन ,
तुमको न अकेली मैं छोड़ूँ ,मुझको लगता डर रावण का
लेकिन मेरे मन को भाता ,वह रूप राधिका का ज्यादा ,
वह प्यार ,समर्पण ,छेड़छाड़ ,वह मधुर रास वृन्दावन का
मैं गया भूल गोकुल गलियां ,माखन की मटकी गोपी की ,
जब से रुक्मणि के संग बंधा ,रहना पड़ता अनुशासन में
तुम ही लक्ष्मी ,तुम सरस्वती ,मेरी अन्नपूर्णा  देवी तुम ,
तुम प्यार लुटाती सच्चे मन ,और सुख सरसाती जीवन में

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
तुम मेरी प्रियतम

तुम पूनम के चंदा जैसी ,अमृत बरसाती चंद्र किरण
प्राची की लाली से प्रकटी ,सूरज की रश्मि, प्रथम प्रथम
तुम्हारा प्रेम प्रकाश पुंज ,आलोकित करता है जीवन
मनभावन और मनोहर तुम ,सुन्दर ,सुंदरतर ,सुन्दरतम

है गाल गुलाब पंखुड़ियों से ,रस भरे अधर, रक्तिम रक्तिम
है कमलकली अधखुले नयन ,मदमाता सा चम्पई बदन
है पूरा तन रेशम रेशम ,और महक रहा चन्दन चन्दन
हो रही पल्ल्वित पुष्पों सी ,कोमल ,कोमलतर ,कोमलतम

 उर में है युगल कलश अमृत ,संचित पूँजी यौवन धन की
पतली डाली,कमनीय कमर,निखरी निखरी छवि है तन की
हिरणी सी चपल चाल ,मनहर ,और चंचल चंचल सी चितवन
मन के कण कण में बसी हुई ,तुम मेरी प्रिय ,प्रियतर,प्रियतम

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '