Saturday, October 10, 2020

जब से तुझसे नज़र लड़ गयी

जबसे तुझसे नज़र लड़ गयी
मचल उठा ये मन उन्मादी
पहले प्यार हुआ फिर शादी
तेरे साथ चोंचलों में ही ,
मैंने सारी उमर बिता दी
तेरे साथ साथ रहने की ,
ऐसी आदत मुझे पड़ गयी
जब से तुझसे नज़र लड़ गयी

सांझ सवेरे, पल पल क्षण क्षण
तेरे ख्यालों में खोया मन
ऐसा तूने अपने रंग में ,
मुझे रंग लिया ,ऐ रंगरेजन
मेरे दिल का चैन खो गया , ,
अब तो बात इस कदर बढ़ गयी
जब से तुझसे  नज़र लड़ गयी

कभी ख़ुशी है और कभी गम
हरदम प्यार  हमारा  कायम
तेरा साथ नहीं छोड़ूगा ,
जब तक है मेरे दम में दम
निकल सके ना अब तू दिल से ,
तू दिल में तिरछी हो अड़ गयी
जब से तुझसे नजर  लड़ गयी

घोटू 

Friday, October 9, 2020

बुढ़ापा आने का अहसास

घट रही उमर सांस दर सांस
जवानी  जाने का अहसास
बुढ़ापा आता दिखता पास
दुखी मन रहता बड़ा उदास

उमर भर करता है जुट काम
मेहनत  कर, पिसता  इंसान
जमा होते जब तक कुछ दाम
सिमटने लगते सब अरमान

दगा जब देने लगे उमंग
जोश भी तजे तुम्हारा संग
बदल जाये जीने का ढंग
पुरानी याद करे आ तंग

चहकनेवाला मन, ग़मगीन
लिया है चैन किसी  ने छीन
दिनबदिन बदन हो रहा क्षीण  
गए वो दिन ,जो थे रंगीन

बिमारी कई हमें तड़फाय
नहीं हम कर पाते एन्जॉय
वक़्त की ऐसी लगती हाय
आदमी हो जाता असहाय

नहीं मस्ती ना कोई मौज
अभी भी मन में है संकोच
पुरानी दकियानूसी  सोच
जिंदगी लगने लगती बोझ

छूटती ना माया ,ना मोह
जिंदगी का आता अवरोह
सदा मन में ये उहापोह
सभी से होगा शीध्र विछोह

देखते रहो दिनों का फेर
लिया है चिंताओं ने घेर
मनाओगे तुम कब तक खैर
कब्र में लटक रहे है पैर

अभी तो  मियां बीबी साथ
कर लिया करते दिल की बात
किसी ने छोड़ दिया जो हाथ
बुरे होंगे कितने हालात

सोच ये काँपे हृदय उदास
कोई भी नहीं रहेगा पास
डसेगा तन्हाई का त्रास
ख़ुशी पर ग्रहण लगे खग्रास

इसलिए  मन कहता ,हँसबोल
हृदय की सभी ग्रंथियां खोल
बचा जो समय ,बहुत अनमोल
 मस्तियाँ  कर ले ,हंसी ,किलोल  

बात तू अपने दिल की मान
पूर्ण कर ले सारे अरमान
बचे है जब तक तन में प्राण
लूट ले ,जग की ख़ुशी तमाम

हरेक क्षण ,बचा जो तेरे पास
बिता संग हर्ष और उल्लास
मिटा ले मन की सभी भड़ास
बुढ़ापा समझ सुखद वनवास

खिले पुष्पों की मधुर सुवास
पंछियों का कलरव है पास
कभी है रिमझिम तो मधुमास
बुढ़ापा तुझे आएगा रास  

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Wednesday, October 7, 2020

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Thursday, October 1, 2020

कोरोना का उधम

 कोरोना वाइरस ,करे उधम
कर रखा नाक में सबकी दम  

ये कई रंग दिखलाये हमे
ये तरह तरह से सताये हमें
कभी खांसी कभी जुकाम करे
ये सबकी नींद हराम करे
ये सांस सांस में तंग करे
कभी खुशबू आना बंद करे
कभी ये बुखार में तड़फाये
कभी ऑक्सीजन को तरसाये
ये तरह तरह के ढाये सितम
कर रखा नाक में सबकी दम

इससे बचने की मजबूरी
तुम रखो बना सबसे दूरी
मुंह और नाक पर मास्क रखो
सेनेटाइजर ,सब पर छिड़को
मत 'हैंड शेक 'का करो 'ट्राय '
दूरी से नमस्ते ,बाय  बाय
जहाँ भीड़भाड़ हो जाना नहीं
बाहर का खाना ,खाना नहीं
घर में घुस ,बैठे रहो हरदम
कर रखा नाक में सबकी दम

बंद मनना अब सब त्योंहार
ना शादी ब्याह में भीड़भाड़
बंद है बाजार ,दुकाने सब
होटल सारे ,मयख़ाने सब
अब झाड़ू पोंछा ,सब घर का
खुद करना ,काम न नौकर का
ऑफिस का काम करो घर से
ना  निकलो ,कोरोना  डर  से
ये अब जल्दी न सकेगा थम
कर रखा नाक में सबकी दम

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
बढ़ती हुई उमर के संग संग

बढ़ती हुई उमर के संग संग ,दिल के दर्द बदल जाते है
धुंधली नज़रों संग नजरिया और सन्दर्भ बदल जाते है

बाहर सख्त नारियल ,अंदर ,कोमल गरी नज़र आती है
बुढ़िया होती सी बीबी भी ,मुझको परी नज़र आती है
उसकी खोटी खोटी बातें मुझको खरी नज़र आती है
हरेक विषय में ,वो अनुभव की ,गठरी भरी नज़र आती है
कहती औरत नहीं बदलती ,लेकिन मर्द बदल जाते है
बढ़ती हुई उमर के संग संग ,दिल के दर्द बदल जाते है

उसके प्रति ,मेरे मन में अब ,उमड़े प्यार और भी ज्यादा
मैं हूँ रखने लगा आजकल ,उसका ख्याल ,और भी ज्यादा
एक दूजे संग ,वक़्त हमारा ,कटता  यार ,और भी  ज्यादा
उसे देख ,झंकृत होते है ,दिल के तार ,और भी ज्यादा
जहाँ प्यार की उष्मा होती ,मौसम  सर्द  बदल जाते है
बढ़ती हुई उमर के संग संग ,दिल के दर्द बदल जाते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू '
कंबल मुझको नहीं छोड़ता

लाख छुड़ाना चाहूँ कंबल ,कंबल मुझको नहीं छोड़ता
बहुत पुराना ,मुझ संग रिश्ता ,बंधा हुआ है ,नहीं तोड़ता

जब जब भी मौसम बदला है ,सिहराती शीतल ऋतू आई
जिसने मुझको प्रबल शीत से ,रखा बचा और दी गरमाई
जिसने मुझको ,अपने आँचल में ढक ,माँ का प्यार दिया है
नरम मुलायम तन से सहला ,पत्नी सा व्यवहार किया है
मैं जिसके आगोश में बंध कर ,कितनी ही रातें सोया हूँ
परेशनियां ,चिताओं में ,जिससे मुंह  ढक  कर रोया हूँ
मैं भी बूढा ,वो भी बूढा ,वो मुझसे मुख नहीं मोड़ता
चाहूँ लाख छोड़ना कंबल ,कंबल मुझको नहीं छोड़ता

जिसके संग अच्छे दिन काटे,उससे अब क्यों हाथ खींच लूं
वफ़ादार ,वो दुखी बिचारा ,मै क्यों उससे आँख मींच लूं
मीत ,सखा ,घरवाले कहते ,वृद्ध हुए ,मोह माया छोडो
खुली हवा में ,साँसे लो अब ,यह कंबल का बंधन छोडो
मैं भी दिल से यही चाहता ,अब मुझको आराम चाहिए
जीर्ण हो रही ,काया मेरी ,अब उसको विश्राम चाहिए
माया स्वयं ,पड़ी पीछे, मैं ,माया पीछे ,नहीं दौड़ता
चाहूँ लाख छोड़ना कंबल ,कंबल मुझको नहीं छोड़ता

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'