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Mike
support@str8creative.co
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Tuesday, December 8, 2020
Saturday, December 5, 2020
हरिद्वार -एक प्रतिक्रिया
गंगा के तीर बसा ,इसीलिये तीरथ है ,
तीरथ में आकर के पैसे तर जाते है
भगत लोग आते है ,भाव लिए भक्ति का ,
इसीलिये चीजों के भाव बढे जाते है
आओ तो दान करो ,जाओ तो दान करो ,
पंडे पुजारी सब ,दान गीत गाते है
नाम बड़ा सच्चा है ,हरद्वार आने पर ,
खर्चे के सभी द्वार ,खुद ही खुल जाते है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
गंगा के तीर बसा ,इसीलिये तीरथ है ,
तीरथ में आकर के पैसे तर जाते है
भगत लोग आते है ,भाव लिए भक्ति का ,
इसीलिये चीजों के भाव बढे जाते है
आओ तो दान करो ,जाओ तो दान करो ,
पंडे पुजारी सब ,दान गीत गाते है
नाम बड़ा सच्चा है ,हरद्वार आने पर ,
खर्चे के सभी द्वार ,खुद ही खुल जाते है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
बुढ़ापे की आशिक़ी
एक दिन मैं छत पर धूप खा रहा था
जवानी का बीता जमाना याद आरहा था
'अभी तो मैं जवान हूँ ' ये ख्याल आने लगा
बासी कढ़ी में उबाल आने लगा
जागृत होने लगी मन में तम्मनायें
सोचा चलो ,बुढ़ापे में इश्क़ लड़ाया जाये
बस निकालने मन की ये ही भड़ास
करने लगा किसी हमउम्र नाजनी की तलाश
घूमने जाने लगा पार्क में
मॉर्निग वाक में
रहता था इस ताक में
कि कोई साठ पारी
सुन्दर ,सुमुखी अकेली नारी
मिल जाये तो भाग्य जग जाए
अंधे के हाथ बटेर लग जाए
किस्मत से एक हसीना का हुआ दीदार
आँखें हुई चार
उमर उसकी भी साठ के आसपास थी
शायद उसे भी कोई मुझ जैसे की तलाश थी
नज़रें लड़ी
बात आगे बड़ी
हमारी आपस में लगी पटने
पार्क में ,गपशप में समय लगा कटने
ये बुढ़ापे का रोमांस
भी होता है बाय चांस
हम दोनों बासी उमर के लोग ,
ताज़ी मोहब्बत का मज़ा लूटने लगे
मन में मिलन के लड्डू फूटने लगे
वो भी पुरानी खायी खेली थी
पर उसकी बातें बड़ी अलबेली थी
कभी कभी फरमाइशें करती थी ऊलजलूल
एक दिन बोली जैसे कली बनती है फूल
वैसी ही कोई चीज खिलाओ तो जाने
हम भी खिलाड़ी थे पुराने
हमने उसके आगे पॉपकॉर्न का पैकेट
कर दिया पेश
देख कर हमारी बुद्धि और ज्ञान
वो हम पर हो गयी कुरबान
अब आपको क्यों बताएं हमें क्या मिला इनाम
एक दिन उसका मन चंचल
खाने को हुआ विकल
कोई ऐसी चीज जो फूल भी हो और फल
हमने अपना दिमाग भिड़ाया
और उसको गुलाब जामुन खिलाया
और उसका ढेर सा प्यार पाया
उसकी फरमाइशें बड़ी निराली होती थी
पहेली सी उलझी ,पर प्यारी होती थी
जैसे एक दिन बोली ,ऐसा कुछ खाया जाये
जो मन को भाये पर शुगर ना बढ़ाये
इतनी लिज्जत हो की तबियत हो जाए तर
और पेट भी जाए भर
उसकी इस फरमाइश पर
शुरू में तो हम हुए भौंचक्के
फिर उसे चाट के ठेले पर ले गए ,
खिलाने गोलगप्पे
वो एक एक गोलगप्पा मुंह में धरती थी
सी सी करती थी
चटखारे भरती थी
तबियत हो गयी तर
पेट भी गया भर
और बढ़ी भी नहीं शुगर
जब हम पूर्ण करते थे उसकी फरमाइशें
पूर्ण होती थी हमारी भी ख्वाइशें
पर उसकी पिछले हफ्ते वाली ,
फरमाइश थी अजब
उसे जलेबी खाने की लगी थी तलब
जलेबी ,उसे लगती बड़ी लजीज़ थी
पर उसे डाइबिटीज थी
जलेबी और वो भी शुगर फ्री
हमारे आगे मुश्किल थी बड़ी
पर हमारी अनुभवी आशिक़ी ने जोर मारा
जरा सोचा और विचारा
और छोटी छोटी जलेबी लेकर आये
आधी जलेबी को अपने होटों पर लगाए
और उसकी चाशनी चूस डाली
और रसहीन पोर्शन वाली जलेबी उसके मुंह में डाली
और उसका आधा रसीला भाग हम चूसने लगे
ऐसा स्वाद आया की हम रह गए ठगे के ठगे
एक तो जलेबी का रस और उसपर
उनके गुलाबी होठों के चुंबन का स्वाद
जिंदगी भर रहेगा याद
और वो भी मुस्करा रही थी
बिना शुगर की जलेबी का मज़ा उठा रही थी
हमारी नजदीकियां बढ़ती ही जारही थी
तो दोस्तों,हम आजकल इसतरह ,
बुढ़ापे के इश्क़ का मज़ा उठा रहे है
जब भी मौका मिलता है ,जलेबियाँ खा रहे है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
एक दिन मैं छत पर धूप खा रहा था
जवानी का बीता जमाना याद आरहा था
'अभी तो मैं जवान हूँ ' ये ख्याल आने लगा
बासी कढ़ी में उबाल आने लगा
जागृत होने लगी मन में तम्मनायें
सोचा चलो ,बुढ़ापे में इश्क़ लड़ाया जाये
बस निकालने मन की ये ही भड़ास
करने लगा किसी हमउम्र नाजनी की तलाश
घूमने जाने लगा पार्क में
मॉर्निग वाक में
रहता था इस ताक में
कि कोई साठ पारी
सुन्दर ,सुमुखी अकेली नारी
मिल जाये तो भाग्य जग जाए
अंधे के हाथ बटेर लग जाए
किस्मत से एक हसीना का हुआ दीदार
आँखें हुई चार
उमर उसकी भी साठ के आसपास थी
शायद उसे भी कोई मुझ जैसे की तलाश थी
नज़रें लड़ी
बात आगे बड़ी
हमारी आपस में लगी पटने
पार्क में ,गपशप में समय लगा कटने
ये बुढ़ापे का रोमांस
भी होता है बाय चांस
हम दोनों बासी उमर के लोग ,
ताज़ी मोहब्बत का मज़ा लूटने लगे
मन में मिलन के लड्डू फूटने लगे
वो भी पुरानी खायी खेली थी
पर उसकी बातें बड़ी अलबेली थी
कभी कभी फरमाइशें करती थी ऊलजलूल
एक दिन बोली जैसे कली बनती है फूल
वैसी ही कोई चीज खिलाओ तो जाने
हम भी खिलाड़ी थे पुराने
हमने उसके आगे पॉपकॉर्न का पैकेट
कर दिया पेश
देख कर हमारी बुद्धि और ज्ञान
वो हम पर हो गयी कुरबान
अब आपको क्यों बताएं हमें क्या मिला इनाम
एक दिन उसका मन चंचल
खाने को हुआ विकल
कोई ऐसी चीज जो फूल भी हो और फल
हमने अपना दिमाग भिड़ाया
और उसको गुलाब जामुन खिलाया
और उसका ढेर सा प्यार पाया
उसकी फरमाइशें बड़ी निराली होती थी
पहेली सी उलझी ,पर प्यारी होती थी
जैसे एक दिन बोली ,ऐसा कुछ खाया जाये
जो मन को भाये पर शुगर ना बढ़ाये
इतनी लिज्जत हो की तबियत हो जाए तर
और पेट भी जाए भर
उसकी इस फरमाइश पर
शुरू में तो हम हुए भौंचक्के
फिर उसे चाट के ठेले पर ले गए ,
खिलाने गोलगप्पे
वो एक एक गोलगप्पा मुंह में धरती थी
सी सी करती थी
चटखारे भरती थी
तबियत हो गयी तर
पेट भी गया भर
और बढ़ी भी नहीं शुगर
जब हम पूर्ण करते थे उसकी फरमाइशें
पूर्ण होती थी हमारी भी ख्वाइशें
पर उसकी पिछले हफ्ते वाली ,
फरमाइश थी अजब
उसे जलेबी खाने की लगी थी तलब
जलेबी ,उसे लगती बड़ी लजीज़ थी
पर उसे डाइबिटीज थी
जलेबी और वो भी शुगर फ्री
हमारे आगे मुश्किल थी बड़ी
पर हमारी अनुभवी आशिक़ी ने जोर मारा
जरा सोचा और विचारा
और छोटी छोटी जलेबी लेकर आये
आधी जलेबी को अपने होटों पर लगाए
और उसकी चाशनी चूस डाली
और रसहीन पोर्शन वाली जलेबी उसके मुंह में डाली
और उसका आधा रसीला भाग हम चूसने लगे
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मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
Wednesday, December 2, 2020
Guaranteed Domain Authority 50/100
hi there
Here is how we can do it
https://www.str8creative.co/product/moz-da-seo-plan/
Regards
Mike
Str8 Creative
support@str8creative.co
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Mike
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Saturday, November 28, 2020
re: I need to make a website`s ranks go down
hi
Yes, it is possible, with our service here
https://negativerseo.co/
for further information please email us here
support@negativerseo.co
thanks
Peter
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Peter
Thursday, November 26, 2020
सूखे स्विमिंग पूल के आंसू
कोई मेरा दरद न जाने ,मैं 'कोविड 'का मारा
अबकी बरस ,मैं रहा तरस ,पाया ना दरस तुम्हारा
मेरा दिल जो कभी लबालब ,भरा प्रीत से रहता
एक बरस से सूना है ये ,पीर विरह की सहता
सूखा सूखा पड़ा हृदय है ,प्रेम नीर का प्यासा
दुःख केआंसू, खुद पी लेता ,रहता सदा उदासा
ना उठती अब मन में लहरें ,ना कोई हलचल है
ना ही शोर मचाते बच्चों की कुछ चहलपहल है
ना ही कपोत ,गुटरगूँ करते ,पिये चोंच भर पानी
ना किलोल करती जलपरियों की वह छटा सुहानी
याद आते वो सुबह शाम,वो रौनक,वो जलक्रीड़ा
सूने तट ,सूना अन्तरघट अब घट घट में पीड़ा
मैं तुम्हारा ,तरणताल हूँ ,दीन ,हीन ,बेचारा
अबके बरस मैं रहा तरस ,पाया ना दरस तुम्हारा
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
कोई मेरा दरद न जाने ,मैं 'कोविड 'का मारा
अबकी बरस ,मैं रहा तरस ,पाया ना दरस तुम्हारा
मेरा दिल जो कभी लबालब ,भरा प्रीत से रहता
एक बरस से सूना है ये ,पीर विरह की सहता
सूखा सूखा पड़ा हृदय है ,प्रेम नीर का प्यासा
दुःख केआंसू, खुद पी लेता ,रहता सदा उदासा
ना उठती अब मन में लहरें ,ना कोई हलचल है
ना ही शोर मचाते बच्चों की कुछ चहलपहल है
ना ही कपोत ,गुटरगूँ करते ,पिये चोंच भर पानी
ना किलोल करती जलपरियों की वह छटा सुहानी
याद आते वो सुबह शाम,वो रौनक,वो जलक्रीड़ा
सूने तट ,सूना अन्तरघट अब घट घट में पीड़ा
मैं तुम्हारा ,तरणताल हूँ ,दीन ,हीन ,बेचारा
अबके बरस मैं रहा तरस ,पाया ना दरस तुम्हारा
मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
Tuesday, November 24, 2020
अतिथि ,तुम कब जाओगे
मैंने कोरोना से पूछा ,सुनो अतिथी तुम कब जाओगे
अब तक सबको बहुत सताया ,कितना और सताओगे
जब भी आते मेहमान है ,घर में रौनक छाती है
खुश हो जाते है घरवाले ,चहल पहल हो जाती है
लेकिन जब से मेहमान बन ,हुआ आगमन तुम्हारा
घर भर में छाई ख़ामोशी ,हर कोई दहशत मारा
लोग सभी घर में घुस बैठे ,सन्नाटा सा फेल रहा
तरह तरह की कई मुसीबत ,हर कोई है झेल रहा
मिलनसारिता दूर हुई ,लोगों ने दूरी बना रखी
अपने मुंह पर पट्टी बांधे ,लोग हो रहे बहुत दुखी
अपना डेरा कितने दिन तक ,अब तुम और जमाओगे
मैंने कोरोना से पूछा ,सुनो अतिथि तुम अब जाओगे
बहुत दुष्ट प्रकृति तुम्हारी ,हरकत बहुत कमीनी है
कितनो के घरबार उजाड़े ,कितनी रोजी छीनी है
तुम छोटे पर कितने खोटे,सबको ये अहसास हुआ
बने गले की फांस इस तरह ,मुश्किल लेना सांस हुआ
होली से ले दीवाली तक छटा गयी त्योंहारों की
शादी ,उत्सव भूल गए सब ,रौनक गयी बाजारों की
लेकिन अब 'वेक्सीन 'आगया ,निश्चित अंत तुम्हारा है
तुम्हे भगा कर ही छोड़ेंगे ,यह संकल्प हमारा है
सुनो समेटो अपना बोरी बिस्तर ,बच ना पाओगे
मैंने कोरोना से पूछा सुनो अतिथि तुम कब जाओगे
मदन मोहन बाहेती'घोटू '
मैंने कोरोना से पूछा ,सुनो अतिथी तुम कब जाओगे
अब तक सबको बहुत सताया ,कितना और सताओगे
जब भी आते मेहमान है ,घर में रौनक छाती है
खुश हो जाते है घरवाले ,चहल पहल हो जाती है
लेकिन जब से मेहमान बन ,हुआ आगमन तुम्हारा
घर भर में छाई ख़ामोशी ,हर कोई दहशत मारा
लोग सभी घर में घुस बैठे ,सन्नाटा सा फेल रहा
तरह तरह की कई मुसीबत ,हर कोई है झेल रहा
मिलनसारिता दूर हुई ,लोगों ने दूरी बना रखी
अपने मुंह पर पट्टी बांधे ,लोग हो रहे बहुत दुखी
अपना डेरा कितने दिन तक ,अब तुम और जमाओगे
मैंने कोरोना से पूछा ,सुनो अतिथि तुम अब जाओगे
बहुत दुष्ट प्रकृति तुम्हारी ,हरकत बहुत कमीनी है
कितनो के घरबार उजाड़े ,कितनी रोजी छीनी है
तुम छोटे पर कितने खोटे,सबको ये अहसास हुआ
बने गले की फांस इस तरह ,मुश्किल लेना सांस हुआ
होली से ले दीवाली तक छटा गयी त्योंहारों की
शादी ,उत्सव भूल गए सब ,रौनक गयी बाजारों की
लेकिन अब 'वेक्सीन 'आगया ,निश्चित अंत तुम्हारा है
तुम्हे भगा कर ही छोड़ेंगे ,यह संकल्प हमारा है
सुनो समेटो अपना बोरी बिस्तर ,बच ना पाओगे
मैंने कोरोना से पूछा सुनो अतिथि तुम कब जाओगे
मदन मोहन बाहेती'घोटू '
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