Sunday, January 3, 2021

युग परिवर्तन

हमने वो युग भी देखा था ,हमने ये युग भी देखा है

काली स्लेट ,खड़िया लेकर बच्चे अ आ ई पढ़ते थे  
स्याही और होल्डर से लिख कर आगे पढाई में बढ़ते थे
फिर फाउंटेन पेन आया ,और बाल पेन ने किया राज
अब पेपर लेस पढाई से ,चलता है सारा काम काज
कम्यूटर पर और ऑन लाइन ,बच्चे पढाई अब करते है
सारी दुनिया का वृहद ज्ञान ,निज लैपटॉप में  भरते है
छोटे बच्चों को बड़े बड़ों ,के कान काटते देखा है
हमने वो युग भी देखा था ,हमने ये युग भी देखा है
 
उन दिनों सास का शासन था ,बहुएं सासों से डर रहती
करती थी दिन भर काम और उनके ताने भी थी सहती
बच्चे उन्मुक्त खेलते थे ,बस्तों का बोझा भी कम था
चाचा ,ताऊ सब संग रहते ,और मस्तीवाला आलम था
माहौल इस तरह अब बदला ,बहुओं से डरती थी सासें
और मात पिता भी बच्चों से ,डर  कर रहते,अच्छे खासे
परिवार नहीं संयुक्त रहे ,अब खिंची बीच में  रेखा है
हमने वो युग भी देखा था ,हमने ये युग भी देखा है

तब गावों के कुछ घर में ही ,रखते थे रेडियो लोगबाग
फिर ट्रांजिस्टर ले बड़ी शान से घूमा करते उसे टांग
काले सफ़ेद टेलीविज़न ने नयी क्रांति का बोध दिया
रंगीन हुआ टेलीविजन ,लोगो ने हाथों हाथ लिया
सबको पछाड़ जब मोबाईल ,आया तो सबके मन भाया
रेडियो ,कैमरा और टीवी ,अब सबकी मुट्ठी में आया
यह छोटा उपकरण काम का है और बड़े मजे का है
हमने वो युग भी देखा था ,हमने ये युग भी देखा है

तब सिगरेट पांचसोपचपन का , डिब्बा निज हाथों में लेकर
कुछ लोग शान से धूम्रपान ,करते रहते है रह रह कर
फिर पान मसाले ने  आकर ,ऐसा लोगों का रुख बदला
सबके हाथों की शान बना,डिब्बा एक पानपराग  भरा
वो युग बीता ,कोरोना ने ,फिर फैलाया ऐसा डर है
कि उससे बचने ,लोगों के ,हाथों में सेनेटाइजर है
बदले हालातों के आगे ,हमने घुटनो को टेका है
हमने वो युग भी देखा था ,हमने ये युग भी देखा है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
 

Friday, January 1, 2021

दो दो लाइना

पहली सुबह धुंध वाली है ,सूरज भी है बुझा बुझा
जैसे हो नाराज बहू से ,मुंह सास का सुझा सुझा

ख़ामोशी जैसी छाई है ,लगते है हालत वही
पतिदेव नाराज हो गए ,मिली सुबह की चाय नहीं

बिगड़ा वातावरण ठंड में ,आयी है आफत गहरी
घर गंदा ,बर्तन जूंठे है ,छुट्टी चली गयी मेहरी

कोहरे की चादर ओढ़े है ,ये पृथ्वी चुपचाप पड़ी
मुझे रजाई छोड़,जगाने की जिद पर तुम मगर अड़ी

ओस पेड़ पत्तों से टपके ,तनिक हवा जो चल जाए
जैसे याद पिया की आये ,विरहन आंसूं टपकाये

मुड़े तुड़े घर के कोने में ,बिखरे है कल के अखबार
ज्यों किसान आंदोलन करते ,हो दिल्ली की सीमा पार

घोटू 
बीस की बिदाई

जाओ बीस तुम,लेकर जाओ ,कोरोना को साथ में
ताकि फिर से सुख और शांति आ जाए हालात में

आया कोरोना ,एक बहेलिया ,फंसा जाल में हमे लिया
हम उन्मुक्त गगन में उड़ने वालों को था कैद किया
रहे फड़फड़ा पंख ,बंद हम ,पिंजरे में ही सारे थे
भूल चहकना गये ,मौन सब ,परेशानियों मारे थे
दहशत छोड़ ,मिले आजादी ,उड़े खुले आकाश में
जाओ बीस तुम ,लेकर जाओ ,कोरोना को साथ में

हटे बंदिशें ,बाजारों में ,पहले जैसी रौनक हो
हंसी ख़ुशी मिल ,सभी मनाये ,त्योंहारों में रंगत हो
खुलें सिनेमाहाल ,रेस्त्रां,मस्ती हो और चहल पहल
फिर से वही पुराने ढर्रे ,आये जिंदगी की हलचल
ऐसा इक्कीस आये ,भिगो दे ,खुशियों की बरसात में
जाओ बीस तुम ,लेकर जाओ ,कोरोना को साथ में

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Thursday, December 31, 2020

स्वर्ग में न्यू ईयर पार्टी

कोरोना की बंदिश मारे ,हम सारे 'इन डोर 'हैं
मगर स्वर्ग में नये वर्ष  की दावत का अब दौर है
जब से महाशय धर्मपाल जी ,हुए स्वर्ग के वासी है
एम डी एच मसालों की वहां रौनक अच्छी खासी है
सभी सब्जियों में खुशबू और स्वाद नया अब आता है
चाट मसाला ,रम्भा और उर्वशी मन ललचाता है

घोटू 

Wednesday, December 30, 2020

वो रविवार

जवानी में ,
जब मन में एक ही धुन थी सवार
इतना बढ़ाऊं अपना कारोबार ,
कि अपने परिवार को दूँ संवार
इसलिये सोमवार से शनिवार ,
सिर्फ व्यापार ही व्यापार
पर हफ्ते में सिर्फ एक बार
जब आता था रविवार
तो मेरे संग होता था पूरा परिवार
जिनके साथ वक़्त बिताकर ,
नहीं रहता था ख़ुशी का पारावार
किन्तु अब बढ़ती हुई उमर में ,
जब मैं हूँ  बेकार
बच्चे संभालते है कारोबार
हर दिन छुट्टी है ,हर वार है रविवार
पर बिखर गया है परिवार
बच्चों ने बसा लिया है अपना अपना घर
अब मैं और मेरी पत्नी है केवल
तब याद आते है बार बार
वो रविवार
जब मस्ती में साथ रहता था सारा परिवार

घोटू 
आया सन इक्कीस रे

मन तड़फाकर ,हमे सताकर ,गया बीत सन बीस रे
अब है मन में चाह ,नया उत्साह ,लाये इक्कीस  रे

कोरोना ने कहर मचाया ,कितनो के ही प्राण हरे
नौ महिने से अधिक बिताये ,घर में घुस कर ,डरे डरे
दशहत मारे ,हम बेचारे ,सब इतने मजबूर रहे
बना दूरियां ,अपनों से ही ,उनसे दो गज ,दूर रहे
मुंह पर पट्टी बंधी ,कभी ना हटी ,रही मन खीस रे
अब है मन में चाह ,नया उत्साह ,लाये इक्कीस रे

हुआ प्रकृती का कोप ,बढ़ गए रोग आपदायें आई
आये कहीं भूकंप ,कहीं तूफ़ान ,बाढ़ भी दुखदायी
सीमाओं पर सभी पडोसी देश ,मचा आतंक रहे
बंद रहे बाज़ार ,लोग कुछ ,बेकारी से तंग रहे
खस्ता हुई व्यवस्था ,मन में ,सबके उठती टीस रे
सबके मन में चाह,नया उत्साह, लाये इक्कीस रे  

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
२०२० का साल

कितनो की बज गयी ढपलियाँ,नहीं रहा सुरताल
कितने ही बीमार हो गए ,कई हुए बदहाल
दुनिया को आतंकित करने ,चली चीन ने चाल
सबके मन में टीस दे गया ,बीस बीस का साल

कोरोना ने कहर मचाया ,पड़े कई बीमार
शहर शहर तालाबंदी थी ,बन्द हुआ व्यापार
लोगों ने दूरियां बनाली ,मुंह पर पट्टी डाल
सबके मन में टीस दे गया ,बीस बीस का साल

बंद फैक्टरी ,कामकाज सब ,लोग हुए बेकार
किया गाँव की ओर पलायन ,होकर के लाचार
मीलों पैदल चले बिचारे ,परेशान ,बदहाल
सबके मन में टीस  दे गया ,बीस बीस का साल

बंद होगये मंदिर ,मस्जिद ,सभी धर्म स्थान  
कोरोना डर ,गर्भगृहों में, छुप बैठे भगवान
अस्तव्यस्त सब ,चली वक़्त ने ऐसी उलटीचाल
सबके मन में टीस दे गया ,बीसबीस का साल

अब आया इक्कीस करेगा,हम सबका उपचार
आशा है सबको 'किस 'देकर ,फैलाएगा प्यार
यही प्रार्थना है ईश्वर से ,सभी रहे खुशहाल
सबके मन में टीस दे गया ,बीसबीस का साल

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '