Monday, March 22, 2021

चलो एक बार फिर से

हमारी और तुम्हारी अब ,निभे ना संग रह रह कर
परेशां हो गए हम रोज के झगड़ों को सह सह कर
बन गयी जिंदगी जिल्लत है ,इससे होगा ये बेहतर
अहम की तुष्टि करने ,यूं नहीं टकराये हम दोनों
चलो एक बार फिरसे अजनबी बन जाए हम दोनों

भुलादें ये कभी बेइंतहां  हम प्यार करते थे      
दीवाने और पागल थे,एक दूजे पे मरते थे
सात जन्मो के साथी हम ,हमेशा दम ये भरते थे
पुराने कसमें और वादे ,सभी बिसरायें हम दोनों
चलो एक बार फिर से अजनबी ,बन जाएँ हम दोनों

जमाना था ,हमारी और तुम्हारी ,एक थी चाहें
नहीं रखता था कोई भी ,किसी से कुछ अपेक्षाएं
मगर लगने लगा ऐसा ,जुदा  अपनी है अब राहें
उलझ रिश्ते गए उनको , मिलें , सुलझायें हम दोनों
चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों

चलोअनजान बन कर फिर लड़ाये ,प्यार से नज़रें
सिलसिला प्यार का चालू ,नया करदें हो बेसबरे
दिवाना बन उठाऊं मैं ,तुम्हारे नाज़ और नखरे
पुराने प्यार में फिर ताज़गी भर लाएं हम दोनों
चलो एक बार फिरसे अजनबी बन जाएँ हम दोनों

प्यार की भड़के चिंगारी ,जगे दिल में ,मोहब्बत फिर
उजड़ते प्यार के गुलशन में आये प्यारी रंगत फ
महक जाए पुरानी  जिंदगी ,बन जाए जन्नत फिर
जवानी की हसीं यादें ,फिर से दोहराएं हम दोनों
चलो एक बार फिर से अजनबी ,बन जाएँ हम दोनों

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
एक लड़की सांवली सी

भोलीभाली और भली सी
एक सांचे में ढली सी
मुझे केरल में मिली थी ,
एक लड़की सांवली सी

उम्र के तूफ़ान में  थी
जवानी परवान पर थी
रूप था निशदिन निखरता
आ रही तन में सुगढ़ता
देख निज यौवन उभरता ,
हो रही कुछ बावली सी
एक लड़की सांवली सी

सोचती कुछ ,मुस्कराती
बिना मतलब खिलखिलाती
गाल पर गुलमोहर खिलते
पंखुड़ियों से होठ हिलते
मन तरंगित ,तन तरंगित ,
अधखिली कोई कली सी
एक लड़की सांवली सी

नयन सुन्दर ,चपल,चंचल
बदन पर टिकता न आँचल
अमलताशी हाथ पीले
हाव भाव  सब नशीले
प्यास तन मन की बुझाने ,
हो रही उतावली सी
एक लड़की सांवली सी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '

Tuesday, March 9, 2021

एक लड़की सांवली सी

भोली भाली और भली सी
एक लड़की सांवली सी

उम्र के तूफ़ान में  थी
जवानी परवान पर थी
रूप था निशदिन निखरता
आ रही तन में सुगढ़ता
देख निज यौवन उभरता ,
हो रही कुछ बावली सी
एक लड़की सांवली सी

सोचती कुछ ,मुस्कराती
बिना मतलब खिलखिलाती
गाल पर गुलमोहर खिलते
पंखुड़ियों से होठ हिलते
मन तरंगित ,तन तरंगित ,
अधखिली कोई कली सी
एक लड़की सांवली सी

नयन सुन्दर ,चपल,चंचल
बदन पर टिकता न आँचल
अमलताशी हाथ पीले
हाव भाव  सब नशीले
प्यास तन मन की बुझाने ,
हो रही उतावली सी
एक लड़की सांवली सी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '
मैं  बहुत पिटा हूँ

बहुत खायी है मार वक़्त की , फिर भी हंसकर जीता हूँ  
मैं घिसा पिटा हूँ ,मैं बहुत पिटा हूँ

पाठ नहीं पढता स्कूल में ,करता था  अति  शैतानी
मास्टर साहब,पीटते छड़ीसे ,पड़ती मार मुझे खानी
घर में छोटे भाई बहन संग ,छेड़छाड़ करता झगड़ा
हुई शिकायत बाबूजी का ,पड़ता था झापट  तगड़ा
यार दोस्तों संग झगड़ों में ,बहुत गया मारा पीटा हूँ
मैं घिसा पिटा हूँ ,मैं बहुत पिटा हूँ

उमर बड़ी  ,कॉलेज गया मैं ,रंग जवानी का छाया
लड़की के संग ,छेड़छाड़ की ,बहुत उन्होंने पिटवाया  
सुन्दर ,कोमल कामनियाँ ,मैं जिन्हे चाहता था दिल से
मेरा मजनू पना उतारा ,उनने चप्पल  सेंडिल से
फिर भी उन  हसीन  चेहरों पर ,मरा मिटा हूँ
मैं घिसा पिटा हूँ मैं बहुत  पिटा हूँ
,
फंसा गृहस्थी चक्कर में फिर ,मैं कोल्हू का बैल बना
पिटना और पटाते रहना ,मेरा हर दिन खेल बना
रोज रोज बच्चों की मांगे पत्नीजी की फरमाइश
तो फिर मेरे ना  पिटने की ,कैसे रहती गुंजाइश
मैं शतरंजी ,पिटा पियादा ,खाली  जेबें , रीता हूँ
मैं घिसा पिटा हूँ मैं बहुत पिटा हूँ

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '


हम तुम्हारा क्या लेते है

हम थोड़ा हंस गा लेते है
तो तुम्हारा क्या  लेते  है
बूढ़े होते ,टूटे दिल को,
बस थोड़ा समझा लेते है

शिकवे गिले भुला कर सारे
मिलते है जब बांह पसारे
हमसे विमुख हो गए थे जो ,
फिर से दोस्त बना लेते है
हम तुम्हारा क्या लेते है

घुट घुट कर कैसा जीना रे
ग़म के आंसूं क्यों पीना रे
 चार दिनों के इस जीवन में ,
कुछ खुशियां बरसा लेते है
हम तुम्हारा क्या लेते है

नींद आती है टुकड़े टुकड़े
सपने आते बिखरे ,बिखरे
अश्रु सींच ,बीती यादों को ,
कुछ हरियाली पा लेते है
हम तुम्हारा क्या लेते है

मदन मोहन बाहेती  'घोटू '
कोविड १९ का वेक्सीन लेने पर
   सुई के प्रति तीन चतुष्पदी

सुई छोटी है ,तीखी है ,अगर चुभती,दरद देती
मगर ये जिंदगी में आपको हरदम  मदद  देती
बटन टूटे को फिर से सी ,बनाती पहनने लायक ,
फटा कपड़ा रफू करती ,जो उदड़ा तो तुरुप देती  

जखम में जो फटी चमड़ी ,सुई से ही सिली जाती
कोई भी ऑपरेशन हो , काम में   सुई ही आती
ये चुभती है जो फूलों में ,बना देती है वरमाला ,
जब लगती बनके इंजेक्शन ,बिमारी दूर भग जाती

अगर काँटा चुभे पावों में ,सुई से निकलता है
जो बनके वेक्सीन लगती ,कोरोना इससे डरता है
पेन्ट हो शर्ट हो या कोट ,ब्लाउज हो या हो चोली ,
सुई से सिल के हर कपड़ा ,बना फैशन संवरता है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '