Tuesday, March 29, 2022

मां मां ही होती है

 नौ महीने तक तुम्हें गर्भ में अपने ढोती है 
 मां तो मां ही होती है 
 जो तुमको गोदी में लेकर अपने आंचल में
 छुपा तुम्हे, छाती से अपना दूध पिलाती है 
 तुम कितनी ही बार गिरो, वह तुम्हे उठाती है
 पकड़ तुम्हारी उंगली चलना तुम्हें सिखाती है 
 तुम्हें पालने दुनिया भर के कष्ट झेलती है ,
 खुद भूखी रहकर भी पहले तुम्हें खिलाती है अक्षर ज्ञान कराती है ,भाषा सिखलाती है कार्यकलाप सभी जीवन के तुम्हें सिखाती है 
 तुम्हें चैन से नींद आ सके, कुछ तकलीफ न हो तुम्हें सुलाती सूखे में, खुद गीली सोती है 
 वह तुम्हारी जननी है , मां , मां ही होती है
 
 तुम्हारे पोषण को अपने सीने हल चलवा ,
 एक दाने के कई हजारों दाने उपजाती 
 तुम्हें मिल सके ठंडी ठंडी हवा इसलिए वो, कितने वन उपवन अपनी छाती पर लहराती 
 वो कुदाल की चोटें सह सह कुवा खुदवाती,
 ताकि शीतल और शुद्ध जल तुमको मिल पाए
 अपनी माटी दे, तुम्हारा घर बनवाती है,
 ताकि चैन से रहो तुम्हे कुछ मुश्किल ना आए
 कई रसीले फल तुमको खाने को मिलते हैं,
 एक बीज फल का अपनी छाती में बोती है
  वो धरती मां ,मां ही है, मां मां ही होती है 
  
जो खुद सूखा तृण खाकर भी दूध पिलाती है
 वह भी पूजनीय है हमको ,गैया माता है 
 करती है हमको प्रदान धन-धान्य और वैभव अति प्रिय सबको लगती है वो लक्ष्मी माता है 
 जो हम को शक्ति देती है और रक्षा करती है, वंदनीय हम सब की है वह दुर्गा माता है 
 वीणा वादिनी ,सुर प्रदायिनी, सरस्वती माता 
 है संगीत सुरसरी और बुद्धि की दाता है 
 देना ही जिसकी प्रवृत्ति, वो माता कहलाती, संतानों के जीवन में जो खुशी संजोती है 
 लक्ष्मी सरस्वती या दुर्गा ,मां तो मां होती है

मदन मोहन बाहेती घोटू 
 हवा हवाई 
 
हवाओं से मेरा रिश्ता बहुत ज्यादा पुराना है 
जन्म से ही शुरु मेरी सांसो का आना जाना है

जमाने की हवा ऐसी लगी थी मुझको यौवन में 
हवा में उड़ता रहता था जब तलक जोश था तनमें
 
नजर उनसे जो टकराती मिलन की बात थी आती 
गति सांसों की बढ़ जाती धड़कन तेज हो जाती

 हुई शादी, हवा निकली, गृहस्थी बोझ था सर पर 
हवा में उड़ न पाते थे, गए थे कट, हमारे पर 
 
जिंदगी में कई तूफान, आए और ठहराये
हवाओं से मेरे रिश्ते ,तभी से और गहराये

बुढ़ापे में हवा बिगड़ी, जिंदगी हो गई पंचर 
गुजारा वक्त करते हैं अब ठंडी आहें भर भर कर 

 जिंदगी भर की ये यारी, हवा से जिस दिन टूटेगी 
धड़कने जाएंगी थम, चेतनायें तन की रूठेंगी
 
हवाई थे किले जितने,हो गए ध्वंस, सबके सब
विलीन होकर हवा में ही, हमारा अंत होगा अब 

मदन मोहन बाहेती घोटू

Monday, March 28, 2022

कान्हा का बुढापा

बूढ़े कान्हा, बूढ़ी राधा, दोनों ही कमजोर हुए, ओल्ड एज में ,मजबूरी में ,ऐसे समय  बिताते है

जमुना तट पर रास रचाना,उनके बस का नहींरहा मूड हुआ तो, कभी शाम जा, पानी पूरी खाते हैं

जिनने बारिश से बचने को गोवर्धन था उठा लिया अब छाता भी अधिक देर तक नहीं उठा वह पाते है
माखन चोरी की बचपन की उनकी आदत छूट गई,
कोलोस्ट्राल बढ़ गया इतना मक्खन पचा न पाते हैं 
खाते छप्पन भोग कभी थे, अब खाते लूखी रोटी डायबिटीज है माखन मिश्री भोग लगा ना पाते हैं

गोपी के संग  छेड़छाड़ के खत्म सिलसिले हुए सभी,
 कंकरी फेंक नहीं पाते अब हंड़िया फोड़ न पाते हैं यमुना में स्नान गोपियां अब भी करती मिल जाती, 
स्विमिंग सूट पहन वह नहाती,वस्त्र चुरा ना पाते हैं 

 पॉल्यूशन का नाग कालिया जमुना करे प्रदूषित है 
 उसे नाथने जमुना में छलांग लगा ना पाते हैं 
 
अब तो नहीं बांसुरी उनसे ठीक तरह से बज पाती कोशिश करते, फूंक मारते, पर जल्दी थक जाते हैं 
अब ना सिर पर मोर मुकुट है,रहे न पीतांबर धारी बरमूडा टी-शर्ट पहन,कंफर्टेबल दिखलाते हैं 

जैसा भी हो,पर वे खुश हैं, दोनों साथ-साथ जो है ,
इतना सब कुछ होने पर भी  दोनों संग मुस्काते हैं

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Sunday, March 27, 2022


वह चले गए 

वह जिनकी अपनी गरिमा थी, गौरव था 
कठिन काम करना भी जिनको संभव था 
सूरज जैसे प्रखर, चंद्रमा से शीतल 
गंगा की लहरों से बहते थे कल कल 
वह जिनमें दृढ़ता होती थी पर्वत सी 
और विचार में गहराई की सागर सी
अपनी एक सुनामी से वो छले गए
 कल तक चलते फिरते थे ,वह चले गए
 
 जो परमार्थी,सेवाभावी ,सज्जन थे 
 पूरे उपवन को महकाते चंदन थे 
 वह जिनके मुख रहती थी मुस्कान सदा 
 छोटे बड़े सभी का रखते ध्यान सदा 
 वह जिनकी थी सोच जरा भी ना ओछी
 वह जिन्हें बुराई किसी की ना सोची
 जलन नहीं थी किंतु चिता में जले गए 
 कल तक चलते फिरते थे, वह चले गए 
 
वह जो कर्मभाव में सदा समर्पित थे 
सेवाभावी ,प्रभु सेवा में अर्पित थे 
थे भंडार दया के ,संयम वाले थे 
बुद्धि और कौशल में बड़े निराले थे
मिलजुल जिया सदा सादगी का जीवन 
सभी दोस्त थे,नहीं किसी से थीअनबन  
नियति के क्रूर हाथों में आ ,छले गए
कल तक चलते फिरते थे ,वह चले गए

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Thursday, March 24, 2022

क्या जीवन का है यही अंत

छूटी सब माया, गया मोह,
जब टूट गया सांसो का क्रम  
माटी होकर निर्जीव पड़ी,
कंचन काया का था जो भ्रम 
खाली आये, खाली ही गये,
राजे, महाराजे, श्रीमंत
 क्या जीवन का है यही अंत 
  
 ऊपर लकड़ी, नीचे लकड़ी ,
 और बीच दबी निष्प्राण देह  
 देकर मुखाग्नि , फूंकेंगे,
 जिनसे तुमको था अधिक नेह 
 तेरह दिन तक बस शोक रखा,
 फिर जीवन का क्रम यथावंत
  क्या जीवन का है यही अंत 
  
  सारा जीवन संघर्ष करो 
  पर जब आता अंतिम पड़ाव 
  चाहे राजा हो या फकीर 
  यह मौत न करती भेदभाव 
  सब होते राख, चिता में जल 
  हो दुष्ट ,कुटिल या महा संत 
  क्या जीवन का है यही अंत 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Tuesday, March 22, 2022

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Sunday, March 20, 2022

मैं स्वस्थ हूं
मौज से जी रहा हूं और मस्त हूं 
मैं स्वस्थ हूं 

ना उधो से कुछ लेन
न माधो का कुछ देना 
 खुशअपने पिंजरे में ,
 मैं और मेरी मैना 
 कोई कुछ कहता है 
 मुझको परवाह नहीं 
 कोई से मोह नहीं 
 बाकी कुछ चाह नहीं 
 हो गए आजकल 
 ऐसे हालात हैं 
 बुरी नहीं लगती अब
  कोई भी बात है 
  शांत चित्त रहता हूं, नहीं चिंता ग्रस्त हूं
   मैं स्वस्थ हूं 
   
   कोई लाख कुछ बोले 
   उनकी ना सुनता हूं 
   जो मुझे ठीक लगे
   वही राह चुनता हूं 
   चिकना मैं घड़ा हुआ
    लोग बाग कहते हैं 
    नहीं मुफ्त की सलाह 
    आजकल देते हैं 
    जीव मैं संतोषी ,
    मन में है कोमलता 
    मन स्थिर, नहीं रही 
    इसमें अब व्याकुलता 
    हर परिस्थिति में जीने का अभयस्त हूं
     मैं स्वस्थ हूं

मदन मोहन बाहेती घोटू