Sunday, January 8, 2023

आती है मां याद तुम्हारी 

स्नेह उमड़ता था आंखों से,
 तुम ममता की मूरत प्यारी 
 आती है मां ,याद तुम्हारी
 
 हमने पकड़ तुम्हारी उंगली ,
 धीरे धीरे चलना सीखा 
 आत्मीयता और प्रेम भाव से,
  सब से मिलना जुलना सीखा 
  सदाचार, सन्मान बड़ों का ,
  और छोटो पर प्यार लुटाना 
  मुश्किल और परेशानी में ,
  हरदम काम किसी के आना 
  तुम्हारी शिक्षा दिक्षा से ,
  झोली भर ली संस्कार की 
  सत्पथ पर चलना सिखलाया
  मूरत थी तुम सदाचार की 
   संस्कृती का ज्ञान कराकर 
   तुमने सब की बुद्धि संवारी
   आती है मां याद तुम्हारी 
    
भाई बहन और परिवार को ,
एक सूत्र में रखा बांधकर 
अब भी अनुशासन में रहते
 हैं हम सब ही,तुम्हें याद कर 
 जीवन जिया स्वाभिमान से
  हमको भी जीना सिखलाया 
  ईश्वर के प्रति श्रद्धा भक्ति 
  धर्म ज्ञान तुमने करवाया 
  रीति रिवाज पुराने जिंदा
   तुमने रखे, पालते हैं हम 
   चल तुम्हारे चरण चिन्ह पर,
   आज जी रहे सुखमय जीवन 
   तुम्हारे ही आदर्शों ने 
   हमें बनाया है संस्कारी 
   आती है मां याद तुम्हारी 
   
माता तुम वात्सल्य मूर्ति थी 
नयनों में था नेह उमड़ता
दिखने में थी भोली-भाली ,
किंतु विचारों में थी दृढ़ता 
तुमने हमें सिखाई नेकी ,
धीरज और विवेक सिखाया 
परोपकार का पाठ पढ़ा कर
 एक भला इंसान बनाया 
सदा प्रेरणा देती रहती 
आती रहती याद हमें तुम 
अब भी दूर स्वर्ग में बैठी 
देती आशीर्वाद हमें तुम
 तुम्हारे पद चिन्हों पर चल 
 जीवन आज हुआ सुखकारी 
 आती है मैं याद तुम्हारी

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Friday, January 6, 2023

नींद

जब मैं नन्हा शिशु होता था 
लगती भूख बहुत रोता था 
दूध पिला ,मां देती थपकी 
तब मुझको आती थी झपकी
 सुख दायक मां की गोदी थी 
 वह मासूम नींद होती थी 
 
बड़ा हुआ ,कर दिनभर मस्ती
 जब थक जाता ,छाती सुस्ती 
 नाश्ते में जो भी मिल जाता 
 खा लेता, थक कर सो जाता 
 ना चिंता ना कोई फिकर थी 
 वह निश्चिंत नींद सुख कर थी
 
 शुरू हुआ फिर स्कूल जाना 
 बस्ता लाद, सुबह रोजाना 
 करो पढ़ाई स्कूल जाकर 
 होमवर्क करना घर आकर 
 जब हो जाती पलके भारी 
 आती नींद बड़ी ही प्यारी 
 
आई जवानी, उम्र बढ़ गई 
और किसी से नजर लड़ गई 
डूबा  रह उसके ख्वाबों में 
रस आता उसकी यादों में 
आती नींद ,न पर सोता था 
उसके सपनों में खोता था 

पूर्ण हुए जब सपने मेरे 
उसके साथ ले लिए फेरे 
हम पति-पत्नी प्रेमी पागल 
रहते डूब प्रेम में हर पल 
मधुर प्रेम क्रीड़ा मनभाती
हमें रात भर नींद ना आती 

बीत गए दिन मस्ती के फिर 
बोझा पड़ा गृहस्थी का सिर 
जिम्मेदारी मुझ पर आई 
करने  मैं लग गया कमाई 
धन अर्जन में मन उलझाता
नहीं ठीक से ,मैं सो पाता 

जब धन दौलत युक्त हुआ मैं
 जिम्मेदारी मुक्त हुआ मैं
 कितनी बार भले दिल टूटा 
 माया से पर मोह न छूटा 
 नहीं चैन मिल पाता दिन भर 
 सोता करवट बदल बदल कर 
 
अब जीवन अंतिम पड़ाव पर 
जीने का ना गया चाव पर 
यात्रा का आ गया छोर है 
पर जीने की चाह और है 
पास ईश्वर जब बुलायेगा 
चिर निद्रा में चैन आएगा

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Wednesday, January 4, 2023

बदलाव  

इतनी जल्दी में कितना कुछ बदल गया है 
ऐसा लगता जैसे समय हाथ से फिसल गयाहै दोपहरी की धूप करारी , कुनकुनी हो गई है 
जोश की उड़ती उमंगे अनमनी हो गई है 
दिमाग जो हमेशा जोड़-तोड़ में भटकता रहता था 
थोड़े से फायदे और नुकसान में अटकता रहता था 
वह भी आजकल थोड़ा किफायती होने लगा है 
मित्रों और परिवार का हिमायती होने लगा है भगवान में आस्था और विश्वास करने लगा है दुष्कर्म और पाप से मन अब डरने लगा है 
लंबे जीने की लालसा बलवती होने लगी है 
कुछ याद नहीं रहता, याददाश्त खोने लगी है
 भूख तो मर गई पर स्वाद पीछा नहीं छोड़ता 
 यह मन अभी भी वासनाओं की तरफ दौड़ता 
जिससे निकट भविष्य में होने वाला बिछोह है उनके प्रति दिनों दिन बढ़ रहा मोह है 
 काम-धाम कुछ भी नहीं ,न करने की क्षमता है 
 यूं ही बैठे ठाले पर वक्त भी नहीं कटता है
  हंसता हूं,मुस्कुराता हूं ,और जिए जाता हूं
यह नियम है नियती का ,खुद को समझाता हूं 
कोई जिम्मेदारी नहीं, फिर भी रहता मन बेचैन है 
  क्या यह सब परिवर्तन ,बढ़ती उम्र की देन है

मदन मोहन बाहेती घोटू 
धूप 

कुछ धूप सुबह की खिली खिली 
छत पर बिखरी,उजली उजली 
तन में सुषमा ,मन में ऊष्मा 
सुंदर लगती ,निखरी निखरी

 सच्ची सुखदायक सर्दी में 
 मन मोह रही है तपन भरी 
 हर्षित करती है मृदुल छुअन
  छत पर ,आंगन में ,गली गली
  
   
संध्या होते तक थक जाती ,
पीली पड़ जाती, मरी मरी 
सूरज उसको लेता समेट,
वह छुप जाती है डरी डरी

मदन मोहन बाहेती घोटू
स्वर्ग और नर्क 

पुण्य करो तो स्वर्ग मिलेगा ,
पाप करो तो नर्क जाओगे 
गंगा में स्नान करो तुम, 
पाप कटें ,सद्गति पाओगे 
 न तो नर्क ना स्वर्ग कहीं पर,
 ये सब तो कपोल कल्पित है 
 तरह तरह की बातें करके 
 लोग हमें कर रहे भ्रमित है
  
जन्म कुंडली में तुम्हारी ,
राहु केतु कर रहे बखेड़ा 
और गुरु की वक्र दृष्टि है,
 मंगल का मिजाज है टेढ़ा
  कभी शनि की साढ़ेसाती 
  चंद्र नीच का ,कभी कुपित है 
  तरह तरह की बातें करके ,
  लोग हमें कर रहे भ्रमित है 
  
बहुत कठिन ग्रह दशा चल रही,
 महामृत्युंजय जाप कराओ 
 शनिवार को शनि मंदिर जा ,
 शनिदेव पर तेल चढ़ाओ 
 पूजा-पाठ यज्ञ करवाओ 
 पितृदोष कर रहा व्यथित है
  तरह-तरह की बातें करके,
   लोग हमें कर रहे भ्रमित है 
   
इस जीवन में दान करो तुम
 अगले जीवन में सुख पाओ 
 तीरथ दर्शन, भजन ,कीर्तन 
 करके ढेरों पुण्य कमाओ 
 तो निश्चित ही स्वर्ग लोक में,
  सीट तुम्हारी आरक्षित है 
  तरह तरह की बातें करके
   लोग हमें कर रहे भ्रमित है

 मदन मोहन बाहेती घोटू



Tuesday, January 3, 2023

सर्दी की धूप से 

आज सुबह से नहीं दिखी तुम
सर्दी से डर कहां छुपी तुम 

रोज सुबह किरणों की डोली ,
में आती थी तुम सज धज कर 
मन में लिए प्यार की उष्मा
उजली उजली ,सुंदर, मनहर 
 तुम्हे देख ,अलसाये तन में 
 स्फूर्ति सी थी आ जाती 
 तुम्हारा स्पर्श सुहाता,
 तुम सबके ही मन को भाती 
 पर ना झलक दिखाई अभी तक,
 बहुत कर रही हमें दुखी तुम 
 आज सुबह से नहीं दिखी तुम 
  
गरम गरम, सर्दी की दुश्मन ,
धीरे-धीरे पग फैलाती 
जैसे-जैसे दिन चढ़ता था ,
छत, आंगन में तुम छा जाती 
आत्मसात तुम्हारी गर्मी ,
कर प्रसन्नता होती मन में 
तुमसे ज्यादा प्यारा कुछ भी ,
लगता नहीं सर्द मौसम में 
किंतु कोहरे की कंबल में ,
लिपटी हुई ,कहां दुबकी तुम 
आज सुबह से नहीं दिखी तुम

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Wednesday, November 9, 2022

हिसाब किताब 

आओ बैठ हिसाब करें हम 
अपने सत्कर्मों,पापों का
अब तक किए गए जीवन में
 अपने सारे उत्पातों का 
 
जो भी किया अभी तक हमने
 सोच समझकर किया होगा 
 अपनी ज्ञान और बुद्धि से 
 उचित निर्णय लिया होगा 
 लेकिन अपनी अल्प बुद्धि से ,
 लिया गया कोई भी निर्णय 
 औरों को भी उचित लगेगा 
 किंचित ही यह होगा संभव 
 सबका अपना दृष्टिकोण है
  सोच सभी की अपनी-अपनी 
  पाप पुण्य की परिभाषाएं,
  लोग बनाते अपनी-अपनी 
  बैठे, सोचे, मनन करें हम ,
  अपने सत्कर्मों, पापों का 
  
  क्या क्या खोया, क्या क्या पाया 
  कितना लाभ हुआ ,क्या हानि 
  कितने दोस्त बनाए हमने 
  और दुश्मनी कितनी ठानी 
  चित्रगुप्त जी आडिट करके 
  पाप पुण्य सारे आकेंगे
  जो जिसके हिस्से आएगा ,
  नर्क स्वर्ग हमको बाटेंगे 
  पूर्व जन्म का फल निपटाते
  यह जीवन तो निपट जाएगा
  अगली योनि के कर्मों का 
  समय कहां फिर मिल पाएगा  
  अगले जन्मों के हित करना
  पाप पुण्य फिर होगा संचित 
   जिसे देख भावी जीवन में ,
   स्वर्ग नर्क होगा आवंटित
  कैसे आलंकन होगा फिर 
  इस जीवन के अभिशापो का 
  आओ बैठ हिसाब करें हम,
   अपने सत्कर्मों, पापों का

मदन मोहन बाहेती घोटू