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Thursday, July 11, 2024
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Monday, July 1, 2024
स्वजनों से
मेरे सारे रिश्तेदारों
प्यारे संगी साथी यारों
मैं अब अस्सी पार हो रहा
व्यथित और बीमार हो रहा
गिरती ही जाती सेहत है
चलने फिरने में दिक्कत है
बीमारी तन तोड़ रही है
याददाश्त संग छोड़ रही है
मैं और मेरी पत्नी साथी
हर सुख दुख में साथ निभाती
लेकिन वह भी तो वृद्धा है
पर उसकी मुझ में श्रद्धा है
जैसे तैसे कष्ट सहन कर
मेरी सेवा करती दिनभर
बेटी बेटे दूर बसे हैं
अपने झंझट में उलझे हैं
बना रखी है सब ने दूरी
अपनी अपनी है मजबूरी
भले शिथिल हो गए अंग है
लेकिन जीने की उमंग है
भले साथ ना देती काया
पर न छूटती मोह और माया
हटता नहीं मोह का बंधन
सबसे मिलने को करता मन
आना जाना मुश्किल है अब
व्यस्त काम में रहते है सब
लेकिन मेरी यही अपेक्षा
वृद्धो की मत करो उपेक्षा
भूले भटके जब भी हो मन
दिया करो हमको निज दर्शन
तुम्हें देख मन होगा हलका
दो आंसू हम लेंगे छलका
शिकवे गिले दूर हूं सारे
सुन दो मीठे बोल तुम्हारे
तुमको छू महसूस कर सकूं
तुम्हें निहारूं और ना थकू
थोड़ा समय निकालो प्यारो
मेरे सारे रिश्तेदारों
मदन मोहन बाहेती घोटू
होली का त्यौहार
आओ आओ मनाए सब यार
प्यार से होली का त्यौहार
रंगों के संग खुशियां बरसे
उड़े अबीर गुलाल
मनाए होली का त्यौहार
यह प्यारा त्योंहार रंगीला
हर कोई है नीला पीला
धूम मच रही है बस्ती में
झूम रहे हैं सब मस्ती में
आपस में कोई भेद नहीं है
जीवन का आनंद यही है
ले पिचकारी सभी कर रहे
रंगों की बौछार
मनाएं होली का त्यौहार
रात होलिका दहन किया था
बैर भाव को फूंक दिया था
प्रभु नाम का जीता था जप
हार गया था हिरनाकश्यप
जीत गया प्रहलाद भक्त था
प्रभु भक्ति में अनुरक्त था
लिया प्रभु ने उसके खातिर
नरसिंह का अवतार
मनाएं होली का त्योंहार
मदन मोहन बाहेती घोटू
Sunday, June 30, 2024
संबोधन
बेटे को *बिटुवा* कहते तो अच्छा लगता है
बेटी को *बिटिया* कहने से प्यार उमड़ता है
यह मेरे *वो *है कहकर पत्नी शर्माती है लेकिन पति की *वो* होने से वह घबराती है
कहो पिताजी को पापा तो लगता अपनापन
माताजी को *मां* कहना है ममता का बंधन बड़े भाई को *भैया* कहना चाचा को *चाचू*
और बहन को *दीदी* कहना दादा को *दादू *
यह कुछ संबोधन है जो परिवार बनाते हैं और आपके रिश्तों में अपनापन लाते हैं सदा पिता को *आप* लगा संबोधित करते हैं
पर मां को* तू *,ईश्वर को भी* तू* ही कहते है
बूढ़े बाबा खुश होते *अंकलजी *कहने पर
हो जाती नाराज पड़ोसन *आंटी जी* कहने पर
*सुनते हो जी *का संबोधन पति का होताअक्सर
किंतु पुकारा जाता है अब नाम एक दूजे का लेकर
संबोधन में आदर देने नाम आगे *जी* *साहब *लगाते
पत्नी के भ्राता साला ना वह है *साले साहब* कहाते
नाम तुम्हारा ही लेकर हरदम जाता तुम्हें पुकारा
नाम ही है पहचान तुम्हारी नाम बिन ना अस्तित्व तुम्हारा
मदन मोहन बाहेती घोटू
बॉयफ्रेंड गर्लफ्रेंड
बॉयफ्रेंड जब बन जाता पति
गर्लफ्रेंड बन जाती श्रीमती
फंस कर चक्कर में गृहस्थी के
सब रोमांस फुर्र हो जाता
इश्क मोहब्बत इलू वाला
सपना चूर-चूर हो जाता
ना तो होता पहले जैसा
मिलना जुलना गिफ्टें लाना
घर में रोज पकाओ खाना
बंद हुआ होटल में जाना
रोज-रोज की तू तू मैं मैं
से अक्सर ही बात बिगड़ती
बाय फ्रेंड जब बन जाता पति
गर्लफ्रेंड जब बनती पत्नी
एक पराई बनती अपनी
सजा धजा सा मेकअप वाला
रूप नज़र अब ना आता है
ना रहते हो नाज़ और नखरे
असली चेहरा दिख जाता है
मिलन औपचारिक ना रहता है
उसमे अपनापन आ जाता
व्यस्त काम में रहती दिनभर
फूलों सा चेहरा मुरझाता
पर आहार प्यार का पाकर
बदन छरहरा बनता हथनी
गर्लफ्रेंड जब बनती पत्नी
मदन मोहन बाहेती घोटू
नींव के पत्थर
एक विशाल इमारत बनकर
गौरव से तुम उठा रहे सर
टिके हुए तुम जिसके ऊपर
हम हैं उसी नींव के पत्थर
हम घुट घुट कर सांस ले रहें
नाम तुम्हारा दीवारॉ पर
इतना सारा बोझ तुम्हारा
उठा रहे अपने कंधों पर
है इसमें ही हर्ष हमारा
सदा रहे उत्कर्ष तुम्हारा
फहराए तुम्हारा परचम
आते वर्षों वर्ष तुम्हारा
है कोशिश हमारी हरदम
भूकंपों से बचे रहो तुम
देखे तुमको लोग सराहें
ऐसे सुन्दर सजे रहो तुम
दिन-दिन करते रहो तरक्की
हम तो यही चाहते हैं बस
हैं इतनी सी पर आकांक्षा
दे दो हमको भी थोड़ा यश
मदन मोहन बाहेती घोटू
बुढापा कैसे काटें
बुढ़ापा सबको ही आता, किसी का जोर ना चलता
उम्र का यह दौर ऐसा सभी के मन को है खलता
बुढ़ापे की जटिलता में किस तरह लाएं सरलता
जिंदगी के जंग में कैसे मिले तुमको सफलता
चंद बातें बताता हूं ,याद तुम रखना हमेशा
पहली यह के किसी से भी रखो ना कोई अपेक्षा
क्योंकि अक्सर अपेक्षाएं पूर्ण होती कदाचित है
और इस कारण तुम्हारा हृदय हो जाता व्यथित है
दूसरा यह की स्वयं की बचत खुद के नाम रखना
किसी पर आश्रित न होना, सदा स्वाभिमान रखना
अपनी सारी जमा पूंजी खर्च खुद पर करो जी भर
हाथ देने को उठे ,ना मांगने का आए अवसर
जिंदगी भर बहुत मेहनत करी तुमने धन कमाया
वह भला किस काम का जो काम तुम्हारे ही न आया
तीसरा, चुप रहो ,घर के काम हर में मत दखल दो
राय दो जब कोई पूछे ,बिना मांगे मत अकल दो
क्योंकि यह पीढ़ी नई है सोचने का ढंग नया है
वक्त पहले सा रहा ना, बदलअब सब कुछ गया है
स्वास्थ्य अच्छा रहेगा यदि खाओ कम और खाओ गम तुम
हो कोई झगड़ा कलह तो हमेशा ही जाओ नम तुम
इस तरह जो रहोगे तो तुम्हारा सम्मान होगा
बुढ़ापे में जिंदगी जीना बड़ा आसान होगा
खाओ पियो मन मुताबिक और जियो मन मुताबिक
मज़ा वृद्धावस्था का , जी भर उठाओ, मन मुताबिक
पत्नी को दो मान,जीवन की वही है सच्ची साथी
जीवन के अंतिम समय तक साथ तुम्हारा निभाती
अपने सब सुख दुख हमेशा संग उसके मिलकर बांटो
जिओ चिंता मुक्त जीवन ,बुढ़ापा इस तरह काटो
मदन मोहन बाहेती घोटू