Saturday, August 10, 2024

हम हैं भक्त शिव शंकर के 


तेजोमय शिव प्रचंड 

मस्तक पर है त्रिपुंड 

और पुत्र वक्रतुंड जानिए 


पहने हैं वाघांबर 

चंद्र सुशोभित है सर 

ऐसे हैं गंगाधर मानिए 


गले पड़ी सर्पमाल 

और भाल है विशाल 

नंदी पर हैं सवार पहचानिए 


डमरू स्वर डम डम डम 

संग त्रिशूल है हरदम 

भोले को बम बम पुकारिए 


प्रकटी है गंगा जिनके सर से 

हम तो भगत है शिव शंकर के 

हर कोई बोले ,बम बम भोले 

प्रेम से बोले,बम बम भोले 


शिव शंकर  अविनाशी 

काशी के भी वासी 

भव्य तेज राशि ,पर भोले हैं 


उनसे हर कोई डरे 

यह तांडव नृत्य करें 

नेत्र तीसरा जब भी खोले हैं 


हिल जाते भू अंबर 

बन जाते प्रलयंकर 

आंखों से बरसाते शोले हैं 


जब हो जाते प्रचंड 

कर देते खंड-खंड 

शांत हो के फिर बनते भोले है


जिसे सब रहते हैं डर-डर के 

हम है भगत शिव शंकर के

 हर कोई बोले , बम बम भोले 

 प्रेम से हर बोले,बम बम भोले 


मदन मोहन बाहेती घोटू

Wednesday, August 7, 2024

व्यथा कथा


आओ तुम्हे सुनाएं यारों,

अपनी व्यथा कथा 

अब ये कथा व्यथा या सुख की,

 देना मुझे बता 


जिस लड़की पर भी दिल आया ,उसने हमको घास न डाली 

मुश्किल से मिल पाई बीवी, 

थोड़ी ठिगनी ,थोड़ी काली 

कामकाज में बड़ी निपुण थी ,

लेकिन थी तो काली कोयल 

उसे साथ में लेकर जाकर ,

कभी न हम हो पाए सोशल 


दोस्त पत्नियां सब थी सुंदर

मिलती जुलती रहती सज कर 

और पत्नी थी होशियार पर 

रहे किचन में घुसी सदा 

आओ तुम्हें सुनाए यारों 

अपनी व्यथा कथा 


पाक कला में वो प्रवीण थी

स्वाद भरे पकवान खिलाती  

सास ससुर की करती सेवा,

हम पर ढ़ेरों प्यार लुटाती 

साफ और सुथरा रखती घर को 

हरदम सुंदर और सजा कर 

मेहमानों का स्वागत करती 

हरदम खुश हो और मुस्काकर 


गुण उसमें कितने ही भरे थे 

सब उसकी तारीफ करे थे 

मैं मूरख काले रंग को ले ,

व्यंग मारता रहा सदा 

आओ तुम्हें सुनाए यारों 

अपनी व्यथा कथा 


गोरी पत्नी सदा सताती 

होती है फैशन की मारी 

उसके साज श्रृंगार को लेकर

खर्चे होते भारी-भारी 

सास ससुर आंखों में चुभते 

नहीं कोई  मेहमान सुहाते

नहीं पकाना आता अक्सर 

होटल से खाना मंगवाते 


उसके नखरे से सहते सहते 

पतिदेव टेंशन में रहते 

काली बीवी पाकर जीवन,

 सदा खुशी से  रहे लदा 

आओ तुम्हें सुनाये यारों 

अपनी व्यथा कथा


मदन मोहन बाहेती घोटू

ओ भैया मेरे लाडले 


तू जिए हजारों साल, ओ भैया मेरे लाडले तेरा जीवन हो खुशहाल , ओ भैया मेरे लाडले 


एक मां की संताने हैं हम 

संग गुजारा,हमने बचपन 

एक मिट्टी में हम तुम खेले 

वो दिन भी थे,क्या अलबेले 

कभी दोस्ती, कभी लड़ाई 

मिलजुल हमने करी पढ़ाई


तुम चले गए कालेज और हम ससुराल चले 

तू जिये हजारों साल ,ओ भैया मेरे लाडले


भाई बहन के प्यार का रिश्ता 

सारी उमर तलक हैं निभता 

हर एक बरस जब आता सावन 

बंधता है रक्षा का बंधन 

भाई की कलाई पर बहना 

बांधती है राखी का गहना 

और बरसती है प्यार, ओ भैया मेरे लाडले तू जिये हजारों साल , ओ भैया मेरे लाडले


मदन मोहन बाहेती घोटू

मौत से निवेदन 


ऐ मौत तू आएगी ही, निश्चित तेरा आना

बस इतनी गुजारिश है जरा देर से आना


जबतक था जवां,उलझा गृहस्थी के जाल में 

हर दम ही रहा व्यस्त, कमाने को माल मैं 


यूं वक्त खिसकता गया और आया बुढ़ापा

अपने में भी मैंने दिया तब ध्यान जरा सा


 भगवान ने इतनी हसीं दुनिया यह बनाई 

कुछ भी मजा लिया न ,यूं ही उम्र गमाई


जितनी बची है जिंदगी, कुछ ऐश मैं कर लूं

भगता उम्र का भूत ,लंगोटी ही पकड़ लूं


 आनंद से है उम्र बची मुझको बिताना  

ऐ मौत गुजारिश है ,जरा देर से आना


कितनी ही मेरी ख्वाइशें अब तक है अधूरी

मैं चाहता हूं जीते जी कर लूं उन्हें पूरी


कितनों के ही एहसान है,मैं उनको चुका दूं

सतकर्म में, मैं,अपनी उमर बाकी लगा दूं 


काटू बुढ़ापा ऐश और आराम करूं मैं

गगरी को अपने कर्म की पुण्यों से भरूं मैं


 सब पाप धो दूं गंगा में ,जीवन सुधार लूं

कुछ दान धर्म कर लूं ,प्रभु को पुकार लूं


 अगले जन्म के वास्ते हैं पुण्य कमाना  

ऐ मौत गुजारिश है कि ज़रा देर से आना


मदन मोहन बाहेती घोटू

Thursday, August 1, 2024

आलस का मजा 


आपने सोने का मजा तो लिया होगा 

आपने बिछोने का मजा भी लिया होगा 

लेकिन कितनी ही बार ऐसा भी होता है

आदमी सुबह तलक गहरी नींद सोता है

जल्दी से उठने का मन नहीं होता है 

पर हालतों से करना पड़ता समझौता है

एक मन कहता है ,पड़े रहो मत जागो

एक मन कहता है अब निद्रा को त्यागो

कभी आंख खुलती है कभी बंद हो जाती

बदन कसमसाता है और अंगड़ाई आती

कभी फिर करवट ले सोने को मन करता

सोने और जगने में यूं ही द्वंद है चलता 

तन कहता जग जाओ, मन कहता सो जाओ 

फिर से तुम सपनों की दुनिया में खो जाओ 

इसी कशमकश को तो कहते हैं आलस हम

 जगने की मजबूरी ,नींद टूटने का गम

बदन टूटने लगता आती है जम्हाई 

कभी इधर कभी उधर लेते हैं हम अंगड़ाई

नींद का खुमार मुश्किल से छूट पाता है

सच में ऐसे आलस में बड़ा मजा आता है


मदन मोहन बाहेती घोटू

Wednesday, July 31, 2024

मैं तुमसे क्या मांगा था 


मैंने तुमको देखा, तुमसे क्या मांगा था 

केवल तुमसे बस इतना सा ही तो मांगा था

अपनी प्यारी चंचल हिरणी सी आंखों से

प्यार भरी एक दृष्टि मुझ पर भी बरसा दो

 मेरे जीवन को हरशा दो 

पर तुमने इनकार कर दिया 


तुमने नज़र उठाई , मैने क्या मांगा था

केवल तुमसे बस इतना सा ही तो मांगा था

अपने कोमल से कपोल पर,

 एक चुम्बन अंकित करने दो 

मुझको रोमांचित करने दो 

पर तुमने इनकार कर दिया 


तुम पास आई तो दिल धड़का

 मैंने तुमसे बस इतना सा ही तो मांगा था

अपने रक्तिम और रसीले इन अधरों का,

मुझको भी  रसपान करा दो,

मेरे जीवन को सरसा दो

पर तुमने इनकार कर दिया 


तुम सकुचाई और शरमाई 

मैंने तुमसे बस इतना सा ही तो मांगा था

अपनी कसी और कमनीय देह को

अपने बाहुपाश में मुझे बांध लेने दो 

मुझे स्वर्ग का सुख लेने दो,

पर तुमने इनकार कर लिया 


मैं निराश हो लौट रहा था तुमने टोका 

झोंका आया एक तुम्हारे मधुर स्वरों का

बोली टुकड़ों टुकड़ों की ये मांग अधूरी 

मैं राजी हूं तुम्हे समर्पित होने  पूरी 

प्यार भरे तुम्हारे प्यारे आमंत्रण ने 

मेरे जीवन का सपना साकार कर दिया

तुमने मुझपर बहुत बड़ा उपकार करदिया


मदन मोहन बाहेती घोटू

Tuesday, July 30, 2024

ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी 


ये मिट्टी नहीं है हमारी ये मां है 

मिट्टी से अपना बदन ये बना है 

जीवन के पल-पल में छाई है मिट्टी 

हमेशा बहुत काम आई है मिट्टी 

ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी 


गांव की मिट्टी में बीता था बचपन

मिट्टी का घर था और मिट्टी का आंगन मिट्टी के चूल्हे की रोटी सुहानी 

मिट्टी के मटके से पीते थे पानी 


मिट्टी के होते खिलौने थे सुंदर 

वो गाड़ी वो गुड़िया वो भालू वो बंदर 

मिट्टी की पाटी में खड़िया लगाकर 

सीखे थे हमने गिनती और अक्षर 

मिट्टी में खेले ,हुए कपड़े मैले 

बचपन में छुप छुप कर खाई है मिट्टी 

ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी 


मिट्टी की सिगड़ी में सर्दी में दादी 

हमें सेक मक्की के भुट्टे खिलाती 

मिट्टी सुराही का ठंडा वो पानी

 मिट्टी के  कुल्हड़ की चाय सुहानी


 बारिश में मिट्टी में चलना वो थप थप बचाने को पैसे थी मिट्टी की गुल्लक 

हमेशा बहुत काम आई है मिट्टी 

जीवन के हर रंग छाई है मिट्टी 

ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी 


त्यौहार जब भी दिवाली का आता

 मिट्टी के गणपति और लक्ष्मी माता 

सभी लोग मिलकर के करते थे पूजन मिट्टी के दीपक से घर होता रोशन 


अब तो शहर में है कंक्रीट के घर 

मिट्टी की खुशबू नहीं है कहीं पर 

एक कंचन काया बदन यह हमारा 

इसकी भीअंतिम विदाई है मिट्टी 

जीवन के पल-पल मे छाई है मिट्टी 

  ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी ये मिट्टी 


मदन मोहन बाहेती घोटू