Saturday, March 8, 2025

बुढ़ापे का प्यार 

जवानी का प्यार 
बहार ही बहार 
सौंदर्य का आकर्षण 
प्रेमी हृदयों की तड़पन 
यौवन की आकुलता 
मिलन की आतुरता 
उबलता हुआ जोश 
भोग का संयोग 
गर्म रक्त का प्रवाह 
चाह और उत्साह 
पर बढ़ती हुई उम्र के साथ
 बदल जाते हैं हालात 
जवानी का आकर्षण 
बन जाता है समर्पण 
तन का क्षरण हो जाता 
रिश्तो मेंअपनापन आता 
फिर आगे बढ़ता सिलसिला 
बच्चे छोड़ देते हैं घोसला
 बनते एक दूसरे की जरूरत 
प्रकट होती है असली मोहब्बत
बुढ़ापे का दर्द जब सहा नहीं जाता
 एक दूसरे के बिन रहा नहीं जाता 
पैरों में दर्द है पत्नी चल नहीं पाती 
फिर भी पति के लिए चाय बनाती 
पति पत्नी के सर बाम मलता है 
हमेशा उसके इशारों पर चलता है 
अपना सुख-दुख आपस बांटते हैं 
एक दूसरों के पैर के नाखून काटते हैं
बुढ़ापे की मजबूरी में होता है यह हाल 
दोनों रखते हैं एक दूसरे का ख्याल 
जब परिवार वाले कर लेते हैं किनारा 
दोनों बन जाते हैं एक दूसरे का सहारा 
अगर कभी हो भी जाती है खटपट 
तो झगड़ा झट से जाता हैं निपट 
क्योंकि दोनों ही सो नहीं पाते 
बिना सुने एक दूसरे के खर्राटे 
सच की उम्र का बड़ा हसीं दौर है 
बुढ़ापे के प्यार मजा ही कुछ और है 

मदन मोहन बाहेती घोटू 

क्या आपने बासीपन इंजॉय किया है?

 रात भर निद्रा ले और करके आराम
सुबह उठने सुबह उठने पर प्यारी सी थकान 
सुबह सुबह आती हुई आलस भरी उबासी 
जब तन वदन सब कुछ हो बासी 
बदन तोड़ती हुई मीठी सी अंगड़ाई 
ओंठो को फैला कर आती हुई जमहाई 
बिस्तर को नहीं छोड़ने का मोह 
दफ्तर और काम पर जाने की उहापोह 
बोझिल सी आंखें को सहलाना,मलना
धीरे-धीरे उठकर के अलसा कर चलना गरम-गरम चाय की चुस्ती की तलब 
रोज-रोज सवेरे होता है यह सब 
क्या आपने कभी बासीपन एंजॉय किया है?
बासी ओंठो से बासी ओंठो का चुंबन लिया है?

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Friday, March 7, 2025

एक भला आदमी चला गया
वो कितनो को ही रुला गया 

बुरा नहीं था,अच्छा था वो 
कर्म वचन से,सच्चा था वो 
करता सद् व्यवहार सभी से
मन में रखता प्यार सभी से
नहीं किसी से राग द्वेष था
कर्मवीर था,वो विशेष था
स्वाभिमान से भरा हुआ था 
पाप कर्म से डरा हुआ था
आस्तिक,धार्मिक ईश भक्त था
 सिद्धांतों में जरा सख्त था 
 शुभ संस्कार में पला गया
 एक भला आदमी चला गया 

पढ़ा लिखा था और था ज्ञानी 
रहती सदा संतुलित वाणी 
मधुर शांत उसका स्वभाव था
सबके ही प्रति प्रेम भाव था 
की न किसी की कभी बुराई
ढूंढा करता था अच्छाई 
ना पड़ता कोई विवाद में 
मिलजुल रहता, सभी साथ में
उसने सबको साध रखा था 
परिवार को बांध रखा था 
पर कुछ हाथों छला गया 
एक भला आदमी चला गया 

मधु भाषी था ,व्यावहारिक था 
सबसे मिलता ,सामाजिक था 
धार्मिक और सदाचारी था 
यारों से रखता यारी था 
जिया सदा सात्विक जीवन 
बहुत साफ और निश्छल था मन 
लोगों के ह्रदयों में बस कर 
जीवन जीया ,उसने हंसकर 
लेख नीयति का पूरा करने 
उसको बुला लिया ईश्वर ने 
चलता फिरता भला गया 
एक भला आदमी चला गया

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Thursday, February 27, 2025

बुढ़ापे की रात


देखो बूढ़े बुढ़िया कैसे रात बिताते हैं 


नींद नहीं आती है तो रह रह बतियाते हैं 


यह मत पूछो कैसे उनकी रात गुजरती है,

कोशिश करते सोने की पर सो ना पाते हैं 


एक दूजे की सभी शिकायत शिकवे जो भी है,

सभी रात को आपस में निपटाए जाते हैं 


कभी झगड़ना,गुस्साहोना और मनाना फिर ,

सोने की कोशिश करते,भरते खर्राटे है


कभी पुराने किस्से की फाइल जब खुलती है, भूली बिसरी यादों का आनंद उठाते हैं 


मन प्रपंच से हटा, भूल सब बीती बातों को, 

बीत गई सो बीत गई ,खुद को समझाते हैं


सुबह आयेगी, खुशी लायेगी, ये उम्मीद लिए,

कुछ पल को सपनों की दुनिया में खो जाते है


 देखो बूढ़े बुढ़िया कैसे रात बिताते हैं


मदन मोहन बाहेती घोटू 

आएगा एक दिन सबका अंत 

थम जाएगा यूं ही अचानक सांसों का यह तंत्र

कोई भाग्यवान जो जन्मा,बन कर के श्रीमंत

कोई दुखी गरीब बिचारा ,पीड़ा पाई अनंत 

सबने सारे मौसम देखे ,गर्मी ,शीत, बसंत 

तेरे अपने साथ तभी तक,जब तक तू जीवंत 

मरने पर ना पास रखेंगे, देंगे फूंक तुरंत 

अंतिम सबकी यही गति है, राजा हो या संत

 साथ जाएंगे कर्म ,किए हैं जो जीवन पर्यंत

 सबसे करके प्रेम लूट ले जीवन का आनंद

 आएगा एक दिन सबका अंत

मदन मोहन बाहेती घोटू 

Wednesday, February 26, 2025

क्या करना है बुढ़ापे में 


 तब, जब मैं अपनी जवानी के चरम में था 

मोह माया के भरम में था 

चाहता था कमाना खूब पैसा 

कमाई की धुन में रहता था हमेशा 

व्यस्तताएं इतनी थी दिनभर 

फुर्सत नहीं मिल पाती थी पल भर 

परिवार और गृहस्थी की जिम्मेदारी 

नौकरी और दफ्तर की मारामारी 

सुबह से शाम 

बस काम ही काम 

बस एक ही धुन थी बहुत सारा पैसा कमा कर एश करूंगा बुढ़ापे में जाकर 

तब मैं सोचा करता था भगवान ऐसे दिन कब देख पाऊंगा 

जब पूरे दिन भर अपनी मर्जी से आराम से सो पाऊंगा 

अपनी मर्जी से जिऊंगा 

 खाऊंगा ,पिऊंगा 

आखिर भगवान ने मेरी सुन ली मेरा सपना सच हो गया 

और एक दिन में रिटायर हो गया 


अब दिन भर निठल्ले बैठा रहता हूं 

बेमतलब इकल्ले बैठा रहता हूं 

नहीं करना कोई काम धाम 

दिन भर बस आराम नहीं आराम 

टीवी पर देखते रहो मनचाही पिक्चर 

या फिर बिस्तर पर पड़े रहो दिन भर 

न नौकरी की भागा दौड़ी न बॉस की चमचागिरी दिनभर एकदम फ्री 

वैसे तो पूरा हो गया मेरा जवानी का स्वपन 

पर अब मुझे कचोटता है  एकाकीपन 

आज मुझे इस बात आ गया है ज्ञान 

कि बिना काम किये जीना नहीं आसान 

बुढ़ापे में आकर बात यह मैंने जानी 

निठल्ला जीवन काटने में होती है बड़ी परेशानी

आज मेरे पास पैसा है बहुत सारा 

पर मैं इंजॉय नहीं कर पा रहा हूं मैं बेचारा 

ठीक से रहती सेहत नहीं है 

बदन में बची हिम्मत नहीं है 

बिमारियों ने घेर रखा है 

अपनो ने मुंह फेर रखा है 

आप जाकर की यह बात मेरी समझ में आई एंजॉय करते रहो अपनी कमाई 

बचत उतनी ही अच्छी के हो सके आराम से बुढ़ापा गुजारना 

किसी के आगे हाथ ना पड़े पसारना 

तो मेरे मित्रों मेरा अनुभव यह बताता है 

बचत का पैसा ज्यादा भी हो तो बुढ़ापे में सताता है 

छुपा कर रखो तो डूब जाएगा 

वरना मरने के बाद बच्चों में झगड़े करवाएगा 

ऐसी नौबत को जीते जी काट दो

जिसको जो देना है पहले ही बांट दो

बुढ़ापे में माया से ज्यादा मोहब्बत मत करो 

थोड़ी दीन दुखियों की सेवा कर  पुण्य की गठरी भरो

प्रभु नाम का स्मरण दिन रात करो 

चैन से जियो और चैन से मरो 


मदन मोहन बाहेती घोटू

Monday, February 24, 2025

आओ हम तुम चले प्रयाग 
एक डुबकी संगम में ले ले, धन्य हमारे भाग 

एक सौ चुम्मालिस वर्षों में आया यह संजोग 
महाकुंभ का लाभ उठाने पहुंचे कितने लोग

 कितने सारे साधु बाबा योगी और महंत 
कई अखाड़े मंडलेश्वर के, एकत्रित सब संत

 बड़े-बड़े भंडारे चलते, कथा ,यज्ञ ,उपदेश 
इस अवसर का लाभ उठाने पहुंचा पूरा देश 

उमड़ रही है भीड़ कर रहे हैं सब गंगा स्नान 
उठा रहे हैं परेशानियां, नहीं रहे पर मान

एक डुबकी में पुण्य कमाते और धो रहे पाप 
इस मौके से फिर क्यों वंचित रहते मै और आप

दिखा रहे हैं धर्म सनातन के प्रति निजअनुराग 
हर हिंदू में ,धर्म आस्था ,आज गई है जाग

 आओ हम तुम चले प्रयाग 

मदन मोहन बाहेती घोटू