Wednesday, December 8, 2010

काई जमानो आयो है

काई  जमानो आयो है
अबे लुगाया घरवाला को नाम लई ने बात करे
शादी ब्याव बाद में होवे पहला मुलाकात  करे
बिना ब्याव के छोरा छोरी साथ साथ में रेवे है
बेशर्मी का एसा किस्सा टी वी वाला कहवे है
गोदी में कम्पुटर रख के ,कई कई बात बतावे है
तुम जिन से भी बात करो हो,उनको फोटू आवे है
धनी लुगाई, करे नोकरी,खानों होटल से आवे
घी से भरी चूरमा बाटी, नी खावे,मुह बिचकावे
लूखी सूखी रोटी खावे,मीठा से घबरावे है
हाथा मेंमोबाईल लई ने घटो तक बतियावे है
घूमे फिरे उगाडा माथे,पेंट जीन में इतराए
चूल्हों चोको और रसोई,में जावा से घबरावे
तीज त्यौहार याद नी रेवे,तीर्थ बरत की खबर नहीं
रीत रिवाज बड़ा बूढा की,इनके बिलकुल फिकर नहीं
राम राम अब कई बतावा ,कैसो कलजुग छायो है
               कई जमानो आयो है
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Monday, December 6, 2010

स्केम

        स्केम
राजा जब स्केम करेगा
भला प्रजा का फिर क्या होगा
हे करूणानिधि! साथ न छोडो
इन्द्रप्रस्थ का फिर क्या होगा
जी जी या टू जी का चक्कर
अपनी रहे तिजोरी सब भर
कोटि कोटि जनता की कोटिश
धन राशी का फिर क्या होगा
सोसायटी आदर्श बन गयी
आदर्शो की बाट लग गयी
अंधे बाँट रेवड़ी खाए
आदर्शो का फिर क्या होगा
kis par koi kare bharosa
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Sunday, December 5, 2010

अब भी

          अब भी
अब भी तेरा रूप महकता जेसे चन्दन
अब भी तुझको  छूकर तन में होती सिहरन
अब भी चाँद सरीखा लगता तेरा आनन्
अब भी तुझको देख मचल जाता मेरा  मन
अब भी तेरे नयना उतने मतवाले है
अब भी तेरे होंठ भरे रस के प्याले है
अब भी तेरी बाते मोह लेती है मन को
अब भी तेरा साथ बड़ा देता धड़कन को
मुझे अप्सरा लगती अब भी, तू ही हूर है
वही रूप है,वही जवानी, वही नूर है
अब भी तेरी रूप अदाए ,उतनी मादक
वो ही नशा है,वो ही मज़ा है,तुझमे अब तक
तुझ पर अब तक हुआ उम्र का असर नहीं है
मेरी उम्र बाद गयी तो क्या ,नज़र  वही है
अब भी मुझको रात रात भर तू तद्फाती
तेरे खर्राटो से मुझको नीद न    आती

           

आओ सुख दुःख मिल कर बाटे

आओ सुख दुःख मिल कर बाटे
 खाते  गाते जीवन  काटे
गरम जलेबी  गाजर हलवा
रबड़ी के लच्छो का जलवा
दही बड़े ,आलू की टिक्की
दोने में भर ,दोनों चाटे
आओ सुख दुःख मिल कर बाटे
जाए सिनेमा, देखे पिक्चर
काफी पिए,बरिस्ता जाकर
घर आकर तुम हमें खिलाओ
आलू वाले गरम परांठे
आओ सुख दुःख मिल कर बाटे
गाये मुन्नी की बदनामी
या शीला की मस्त जवानी
कजरारे कजरारे नयना
गाकर दूर करे सन्नाटे
आओ सुख दुःख मिल कर बाटे

Thursday, December 2, 2010

गृह प्रवेश हे हनीमून सा

 गृह प्रवेश हे हनीमून सा
मन की चार दिवारी में जब कोई बसता
नयन निहारे पलक बिछा कर जिसका रस्ता
जिसकी मीठी वाणी में हे प्यार बरसता
वो प्यारा मदमस्त चेहरा हँसता हँसता
दिल के हर एक कोने में जिसकी खुशबू हे
नवल वृक्ष की नवल कली या नव प्रसून सा
   गृह प्रवेश हे हनीमून सा
जिसमे बस कर मन को मिल जाती हो राहत
रहने वालो में होती आपस में चाहत
कोने कोने में बिखरी हो प्यार मोहब्बत
जहा लक्ष्मी वास करे ,खुल जाये किस्मत
थके हुए हरे प्राणी को जिस चोखट में
आते ही मिल जाता हो मन में सुकून सा
    गृह प्रवेश हे हनीमून सा

Tuesday, November 30, 2010

senior citizenसीनियर सिटी जन

सीनियर सिटी जन
साठ साल की उम्र के होने पर
रिटायर मेंट के बाद की पेंशन हू
या रेलवे में मिलने वाला कन्सेशन हू
या फिर पेंसठ साल के बाद का
इनकम टैक्स एक्सेम्प्शन हू
कितनी ही विसंगतियों से भरा
एक साधारण जन हू
जी हाँ में एक सीनियर सिटिजन हू
जब में परिपक्व और
अनुभवों से भरपूरहोता हू
रिटायर कर दिया जाता हू
क्योकि नयी पीड़ी के लिए
मै ही जगह बनाता हू
सिर्फ राजनीती में ही मेरी कद्र होती हे
क्योकि नेता के रिटायर मेंट की कोई उम्र नहीं होती हे
जो पेरो से खुद नहीं चल पाता हे
वो पूरे देश को चलता हे
और आने वाली पुश्तो का भी
इंतजाम कर जाता हे
जिसका ब्याज कई गुना बढ गया हे
एसा मूलधन हू
जी हां में एक सीनियर सिटिजन हू
मेरे लिए बस में,ट्रेन में
और घर के एक कोने में
एक सीट रिजर्व होती हे
एक सीट ऊपर भी रिजेर्व होती हे
स्वर्ग हो या नरक
कही भी जाऊ, क्या पड़ेगा फर्क
क्योकि इन दोनों लोको का अनुभव
मेने इसी जीवन में ले लिया हे
कभी हंसी ख़ुशी, कभी घुट घुट के
जीवन जिया हे
थका हुआ तन हू
टूटा हुआ मन हू
जी हां में एक सीनियर सिटिजन हू
प्रकृति के नियम भी अजीब हे
वृक्षो से जब पुराने पत्ते गिर जाते हे
तब नए पत्ते आते हे
पर इंसानों में
पुराने पत्ते पहले नए पत्तो को उगाते हे
और नए पत्ते थोड़े बड़े होने पर
पुराने पत्तो को गिराते हे
में भी एसा ही पका हुआ पुराना पत्ता हू
जो कभी भी गिराया जा सकता हू
मेरी वानप्रस्थ की उम्र हे
इसलिए रोज बगीचे में घूमने जाता हू
चिंता और जिम्मेदारियों से मुक्त
सन्यासी सा जीवन बिताता हू
लाफिंग क्लब में हँसता हू
और साँस लेने के लिए करता प्राणायाम योगासन हू
जी हां में एक सीनियर सिटिजन हूa

Sunday, November 21, 2010

दिनचर्या -बुदापे की

दिनचर्या -बुदापे की
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुढ़ापे में
          १
खोल एल्बम हर फोटो पर आँख  गाढ़ते है
कुरते की बाहों से सबकी धूल झाड़ते है
भूल्भुलेया में यादो की खोया करते है
कभी कभी हँसते है या फिर रोया करते है
धुंधली आँखों से ये दुनिया लगती मैली है
लगता है ये जीवन एक अनभूझ पहेली है
सिसक सिसक बौरा जाते ना रहते आपे में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में
              २
खोल रेडियो बहुत पुराने गाने सुनते है
फीके खाने के संग तीखे ताने सुनते है
सास बहू के सभी सीरियल देखा करते है
'बागवान' सी फिलम देख कर आहे भरते है
बार बार अख़बार  चाट कर वक्त बिताते है
डूबा चाय में यादो के कुछ बिस्किट खाते है
एकाकीपन खो जाता है हँसते गाते में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे  में
             ३
बी.पी.हार्ट, शुगर की गोली, यही नाश्ता है
जितने है भगवान सभी में बड़ी आस्था है
आर्थे राइ टिस हे घुटनों में,चलना भारी है
कथा भागवत टी वी पर ही सुनना जारी है
छड़ी उठा कर सुबह पार्क में टहला करते है
खिलती कलिया फूल देख कर ,बहला करते है
वक्त गुजरता हमदर्दों के संग बतियाते में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में
                ४
याददास्त भी साथ निभाने में कतराती है
ताज़ी नहीं पुरानी बाते मन में छाती है
होता मन उद्विग्न आँख से आंसू बहते है
फिर भी मन की पीर छुपा कर हँसते रहते है
जीवन की आपाधापी में ये सब चलता है
पर अपनों का बेगानापन ज्यादा खलता है
कब तक यादे रखे दबा कर, बंद लिफाफे में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में
                      ५
मोह माया में अब भी ये मन उलझा रहता है
कहता है मष्तिष्क औरये दिल कुछ कहता है
haatho में जब लिए सुमरनी प्रभु को जपते है
भटके मन में जाने क्या क्या ख्याल उभरते है
नाती,पोते,पोती,बच्चे,याद सताती है
किसको क्या दे, करे वसीयत चिंता खाती है
कितनी देर लगा करती मृत्यु को आते में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में
                               ६
कभी रात को सोते में जब नीद उचटती है
डनलप की गद्दी भी हमको चुभने लगती है
करवट बदल बदल मुश्किल से ही सो पाते है
जाने कैसे गंदे गंदे सपने आते है
अपने जन की यादे  आकर जब तड फाती  है
 मन की पीड़ा आंसू बन कर बह बह जाती है
कितना वक्त लगेगा इस दिल को समझाते में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में
                            ७
अच्छे बुरे सभी कर्मो कियादे आती है
सच्चा झूठा,भला बुरा, सब बाते आती है
किसने धोका दिया और किसने अपनाया है
कौन पराया अपना, अपना कौन पराया है
लेखे जोखे का हिसाब जब जाता आँका है
जीवन की बलेंस शीट का बनता  खाका है
क्या खोया क्या पाया, कितने रहे मुनाफे में
जाने क्या क्या करते है हम लोग बुदापे में