Wednesday, December 15, 2010

संस्कार

        संस्कार
वो संस्कारी थे
संस्कृति के पुजारी थे
आजकल बुढ़ापा कैसे बिताते है
संस्कार चेनल देखते है
son s  कर में घूमते है
और son s कृति को  खिलाते है

नया जमाना

     नया जमाना
घंटो तक बच्चे करे ,अनजानों से चेट
संस्कृति को खाने लगे,टी.वी. इन्टरनेट
ना तो पढ़ने में रूचि,ना वो खेले खेल
लेपटोप ले गोद में ,भेज रहे ई मेल
ऐसी हम सब पर पड़ी,मोबाइल की मार
मोबाइल होने लगे,संस्कार,आचार
बढे बुधो की आजकल,बात सुनेगा कौन
कानो से हटता नहीं,जब मोबाइल फोन
देखे टी.वी.सीरियल ,ऐसा पाए ज्ञान
बचपन में ही आजकल,बच्चे बने जवान
ये साधन विज्ञानं के ,देने को सहयोग
एडिक्शन यदि हो गया, बन जायेगे रोग

Wednesday, December 8, 2010

काई जमानो आयो है

काई  जमानो आयो है
अबे लुगाया घरवाला को नाम लई ने बात करे
शादी ब्याव बाद में होवे पहला मुलाकात  करे
बिना ब्याव के छोरा छोरी साथ साथ में रेवे है
बेशर्मी का एसा किस्सा टी वी वाला कहवे है
गोदी में कम्पुटर रख के ,कई कई बात बतावे है
तुम जिन से भी बात करो हो,उनको फोटू आवे है
धनी लुगाई, करे नोकरी,खानों होटल से आवे
घी से भरी चूरमा बाटी, नी खावे,मुह बिचकावे
लूखी सूखी रोटी खावे,मीठा से घबरावे है
हाथा मेंमोबाईल लई ने घटो तक बतियावे है
घूमे फिरे उगाडा माथे,पेंट जीन में इतराए
चूल्हों चोको और रसोई,में जावा से घबरावे
तीज त्यौहार याद नी रेवे,तीर्थ बरत की खबर नहीं
रीत रिवाज बड़ा बूढा की,इनके बिलकुल फिकर नहीं
राम राम अब कई बतावा ,कैसो कलजुग छायो है
               कई जमानो आयो है
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Monday, December 6, 2010

स्केम

        स्केम
राजा जब स्केम करेगा
भला प्रजा का फिर क्या होगा
हे करूणानिधि! साथ न छोडो
इन्द्रप्रस्थ का फिर क्या होगा
जी जी या टू जी का चक्कर
अपनी रहे तिजोरी सब भर
कोटि कोटि जनता की कोटिश
धन राशी का फिर क्या होगा
सोसायटी आदर्श बन गयी
आदर्शो की बाट लग गयी
अंधे बाँट रेवड़ी खाए
आदर्शो का फिर क्या होगा
kis par koi kare bharosa
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Sunday, December 5, 2010

अब भी

          अब भी
अब भी तेरा रूप महकता जेसे चन्दन
अब भी तुझको  छूकर तन में होती सिहरन
अब भी चाँद सरीखा लगता तेरा आनन्
अब भी तुझको देख मचल जाता मेरा  मन
अब भी तेरे नयना उतने मतवाले है
अब भी तेरे होंठ भरे रस के प्याले है
अब भी तेरी बाते मोह लेती है मन को
अब भी तेरा साथ बड़ा देता धड़कन को
मुझे अप्सरा लगती अब भी, तू ही हूर है
वही रूप है,वही जवानी, वही नूर है
अब भी तेरी रूप अदाए ,उतनी मादक
वो ही नशा है,वो ही मज़ा है,तुझमे अब तक
तुझ पर अब तक हुआ उम्र का असर नहीं है
मेरी उम्र बाद गयी तो क्या ,नज़र  वही है
अब भी मुझको रात रात भर तू तद्फाती
तेरे खर्राटो से मुझको नीद न    आती

           

आओ सुख दुःख मिल कर बाटे

आओ सुख दुःख मिल कर बाटे
 खाते  गाते जीवन  काटे
गरम जलेबी  गाजर हलवा
रबड़ी के लच्छो का जलवा
दही बड़े ,आलू की टिक्की
दोने में भर ,दोनों चाटे
आओ सुख दुःख मिल कर बाटे
जाए सिनेमा, देखे पिक्चर
काफी पिए,बरिस्ता जाकर
घर आकर तुम हमें खिलाओ
आलू वाले गरम परांठे
आओ सुख दुःख मिल कर बाटे
गाये मुन्नी की बदनामी
या शीला की मस्त जवानी
कजरारे कजरारे नयना
गाकर दूर करे सन्नाटे
आओ सुख दुःख मिल कर बाटे

Thursday, December 2, 2010

गृह प्रवेश हे हनीमून सा

 गृह प्रवेश हे हनीमून सा
मन की चार दिवारी में जब कोई बसता
नयन निहारे पलक बिछा कर जिसका रस्ता
जिसकी मीठी वाणी में हे प्यार बरसता
वो प्यारा मदमस्त चेहरा हँसता हँसता
दिल के हर एक कोने में जिसकी खुशबू हे
नवल वृक्ष की नवल कली या नव प्रसून सा
   गृह प्रवेश हे हनीमून सा
जिसमे बस कर मन को मिल जाती हो राहत
रहने वालो में होती आपस में चाहत
कोने कोने में बिखरी हो प्यार मोहब्बत
जहा लक्ष्मी वास करे ,खुल जाये किस्मत
थके हुए हरे प्राणी को जिस चोखट में
आते ही मिल जाता हो मन में सुकून सा
    गृह प्रवेश हे हनीमून सा