नव वर्ष
नए वर्ष का जशन मनाओ
आज ख़ुशी आनंद उठाओ
गत की गति से आज आया है
लेकिन तुम यह भूल न जाओ
कल कल था तो आज आया है
कल के कारन कल आएगा
आने वाले कल की सोचो
यही आज कल बन जायेगा
कल भंडार अनुभव का है
कल से सीखो, कलसे जानो
कल ने ही कांटे छाटे थे
किया सुगम पथ ,इतना मनो
आज तुम्हे कुछ करना होगा
तो ही कल के काम आओगे
कल की बात करेगी बेकल
जब तुम खुद कल बन जाओगे
यह तो जीवन की सतिता है
कल कल कर बहते जाओ
आने वाले कल की सोचो
बीते कल को मत बिसराओ
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Sunday, December 19, 2010
Saturday, December 18, 2010
बुढ़ापा
बुढ़ापा
बिना बुलाये ही आ जाता ,दबे पाँव चुपचाप बुढ़ापा
कभी ख़ुशी से झोली भरता ,या देता संताप बुढ़ापा
संचित पुण्यो का प्रतिफल या पूर्व जन्म का पाप बुढ़ापा
व्यथित ह्रदय और थका हुआ तन ,जीवन का अभिशाप बुढ़ापा
जीवन की मधुरिम संध्या या ढलने का आभास बुढ़ापा
टिम टिम करती जीवन लो का बुझता हुआ उजास बुढ़ापा
मृत्यु द्वार नजदीक आ गया ,आकर देता थाप बुढ़ापा
यादों के सागर में तैरो,हंस कर काटो आप बुढ़ापा
Wednesday, December 15, 2010
संस्कार
संस्कार
वो संस्कारी थे
संस्कृति के पुजारी थे
आजकल बुढ़ापा कैसे बिताते है
संस्कार चेनल देखते है
son s कर में घूमते है
और son s कृति को खिलाते है
वो संस्कारी थे
संस्कृति के पुजारी थे
आजकल बुढ़ापा कैसे बिताते है
संस्कार चेनल देखते है
son s कर में घूमते है
और son s कृति को खिलाते है
नया जमाना
नया जमाना
घंटो तक बच्चे करे ,अनजानों से चेट
संस्कृति को खाने लगे,टी.वी. इन्टरनेट
ना तो पढ़ने में रूचि,ना वो खेले खेल
लेपटोप ले गोद में ,भेज रहे ई मेल
ऐसी हम सब पर पड़ी,मोबाइल की मार
मोबाइल होने लगे,संस्कार,आचार
बढे बुधो की आजकल,बात सुनेगा कौन
कानो से हटता नहीं,जब मोबाइल फोन
देखे टी.वी.सीरियल ,ऐसा पाए ज्ञान
बचपन में ही आजकल,बच्चे बने जवान
ये साधन विज्ञानं के ,देने को सहयोग
एडिक्शन यदि हो गया, बन जायेगे रोग
घंटो तक बच्चे करे ,अनजानों से चेट
संस्कृति को खाने लगे,टी.वी. इन्टरनेट
ना तो पढ़ने में रूचि,ना वो खेले खेल
लेपटोप ले गोद में ,भेज रहे ई मेल
ऐसी हम सब पर पड़ी,मोबाइल की मार
मोबाइल होने लगे,संस्कार,आचार
बढे बुधो की आजकल,बात सुनेगा कौन
कानो से हटता नहीं,जब मोबाइल फोन
देखे टी.वी.सीरियल ,ऐसा पाए ज्ञान
बचपन में ही आजकल,बच्चे बने जवान
ये साधन विज्ञानं के ,देने को सहयोग
एडिक्शन यदि हो गया, बन जायेगे रोग
Wednesday, December 8, 2010
काई जमानो आयो है
काई जमानो आयो है
अबे लुगाया घरवाला को नाम लई ने बात करे
शादी ब्याव बाद में होवे पहला मुलाकात करे
बिना ब्याव के छोरा छोरी साथ साथ में रेवे है
बेशर्मी का एसा किस्सा टी वी वाला कहवे है
गोदी में कम्पुटर रख के ,कई कई बात बतावे है
तुम जिन से भी बात करो हो,उनको फोटू आवे है
धनी लुगाई, करे नोकरी,खानों होटल से आवे
घी से भरी चूरमा बाटी, नी खावे,मुह बिचकावे
लूखी सूखी रोटी खावे,मीठा से घबरावे है
हाथा मेंमोबाईल लई ने घटो तक बतियावे है
घूमे फिरे उगाडा माथे,पेंट जीन में इतराए
चूल्हों चोको और रसोई,में जावा से घबरावे
तीज त्यौहार याद नी रेवे,तीर्थ बरत की खबर नहीं
रीत रिवाज बड़ा बूढा की,इनके बिलकुल फिकर नहीं
राम राम अब कई बतावा ,कैसो कलजुग छायो है
कई जमानो आयो है
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अबे लुगाया घरवाला को नाम लई ने बात करे
शादी ब्याव बाद में होवे पहला मुलाकात करे
बिना ब्याव के छोरा छोरी साथ साथ में रेवे है
बेशर्मी का एसा किस्सा टी वी वाला कहवे है
गोदी में कम्पुटर रख के ,कई कई बात बतावे है
तुम जिन से भी बात करो हो,उनको फोटू आवे है
धनी लुगाई, करे नोकरी,खानों होटल से आवे
घी से भरी चूरमा बाटी, नी खावे,मुह बिचकावे
लूखी सूखी रोटी खावे,मीठा से घबरावे है
हाथा मेंमोबाईल लई ने घटो तक बतियावे है
घूमे फिरे उगाडा माथे,पेंट जीन में इतराए
चूल्हों चोको और रसोई,में जावा से घबरावे
तीज त्यौहार याद नी रेवे,तीर्थ बरत की खबर नहीं
रीत रिवाज बड़ा बूढा की,इनके बिलकुल फिकर नहीं
राम राम अब कई बतावा ,कैसो कलजुग छायो है
कई जमानो आयो है
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Monday, December 6, 2010
स्केम
स्केम
राजा जब स्केम करेगा
भला प्रजा का फिर क्या होगा
हे करूणानिधि! साथ न छोडो
इन्द्रप्रस्थ का फिर क्या होगा
जी जी या टू जी का चक्कर
अपनी रहे तिजोरी सब भर
कोटि कोटि जनता की कोटिश
धन राशी का फिर क्या होगा
सोसायटी आदर्श बन गयी
आदर्शो की बाट लग गयी
अंधे बाँट रेवड़ी खाए
आदर्शो का फिर क्या होगा
kis par koi kare bharosa
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राजा जब स्केम करेगा
भला प्रजा का फिर क्या होगा
हे करूणानिधि! साथ न छोडो
इन्द्रप्रस्थ का फिर क्या होगा
जी जी या टू जी का चक्कर
अपनी रहे तिजोरी सब भर
कोटि कोटि जनता की कोटिश
धन राशी का फिर क्या होगा
सोसायटी आदर्श बन गयी
आदर्शो की बाट लग गयी
अंधे बाँट रेवड़ी खाए
आदर्शो का फिर क्या होगा
kis par koi kare bharosa
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Sunday, December 5, 2010
अब भी
अब भी
अब भी तेरा रूप महकता जेसे चन्दन
अब भी तुझको छूकर तन में होती सिहरन
अब भी चाँद सरीखा लगता तेरा आनन्
अब भी तुझको देख मचल जाता मेरा मन
अब भी तेरे नयना उतने मतवाले है
अब भी तेरे होंठ भरे रस के प्याले है
अब भी तेरी बाते मोह लेती है मन को
अब भी तेरा साथ बड़ा देता धड़कन को
मुझे अप्सरा लगती अब भी, तू ही हूर है
वही रूप है,वही जवानी, वही नूर है
अब भी तेरी रूप अदाए ,उतनी मादक
वो ही नशा है,वो ही मज़ा है,तुझमे अब तक
तुझ पर अब तक हुआ उम्र का असर नहीं है
मेरी उम्र बाद गयी तो क्या ,नज़र वही है
अब भी मुझको रात रात भर तू तद्फाती
तेरे खर्राटो से मुझको नीद न आती
अब भी तेरा रूप महकता जेसे चन्दन
अब भी तुझको छूकर तन में होती सिहरन
अब भी चाँद सरीखा लगता तेरा आनन्
अब भी तुझको देख मचल जाता मेरा मन
अब भी तेरे नयना उतने मतवाले है
अब भी तेरे होंठ भरे रस के प्याले है
अब भी तेरी बाते मोह लेती है मन को
अब भी तेरा साथ बड़ा देता धड़कन को
मुझे अप्सरा लगती अब भी, तू ही हूर है
वही रूप है,वही जवानी, वही नूर है
अब भी तेरी रूप अदाए ,उतनी मादक
वो ही नशा है,वो ही मज़ा है,तुझमे अब तक
तुझ पर अब तक हुआ उम्र का असर नहीं है
मेरी उम्र बाद गयी तो क्या ,नज़र वही है
अब भी मुझको रात रात भर तू तद्फाती
तेरे खर्राटो से मुझको नीद न आती
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