तू अपनी माँ को भूल गया
जिसने नौ महीने तुझे कोख में,किया अंकुरित ,जनम दिया
छाती के रस से सींच सींच ,पला पोसा और बड़ा किया
तूने सीखा घुटनों चलना,फिर खड़ा हुआ ,मुहं खोला था
माँ हुई ख़ुशी से गदगद थी,जब तू माँ माँ माँ बोला था
तू बिस्तर गीला करता माँ ,गोदी में तुझे उठाती थी
सूखे बिस्तर से तुझे उठा ,खुद गीले में सो जाती थी
दिन दूना रात चोगुना तू, बढ जाए मन्नत करती थी
पढ़ लिख कर बने बड़ा ,सुखमय जीवन हो,चाहत करती थी
तेरे प्रति माँ का अमित स्नेह,अब भी कायम है ,सच्चा है
तू कितना भी बन जाए बड़ा ,माँ को तो लगता बच्चा है
तेरी तारीफ़ करते करते ,जिसकी जुबान ना थकती है
धुंधली धुंधली सी आँखों से,वो राह तुम्हारी तकती है
बस एक बार आ जा मिलने,माँ का मन तुझे बुलाता है
गिर गिर चलना,बढना सीखा ,वो आँगन तुझे बुलाता है
वो तुझसे नहीं मांगती कुछ,बस थोडा प्यार चाहती है
बीमार पड़ी है एक बार ,तेरा दीदार चाहती है
उसका अब तक का स्नेह त्याग,क्या सचमुच यूं ही फिजूल गया
तू अपनी माँ को भूल गया
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Tuesday, January 18, 2011
Monday, January 17, 2011
तेरी चिट्ठी के दो पन्ने
देते है सब की याद दिला
तेरी चिट्ठी के दो पन्ने
मन को छू छू कर जाते है
तेरी चिट्ठी के दो पन्ने
जब कंप्यूटर के इस युग में
ई मेल नहीं ,ख़त मिलता है
मोती से अक्षर से सज कर
पैगामे महोब्बत मिलता है
ख़त के हर अक्षर में खुशबू
आती घर ,माटी, आँगन की
तुम्हारे प्यार महोब्बत की
चाहत की और अपनेपन की
उस दिन तुम्हारी चिट्ठी में
तो स्वाद गजब का आया था
तुमने मक्का की रोटी और
सरसों का साग बनाया था
एक दिन गोबर की खुशबू थी
गाय का दूध दुहा होगा
थी महक एक दिन चुम्बन की
ख़त होटों से छुवा होगा
या खुशबू पुए पकोड़ों की
और रस की खीर महकती है
मन बेकल सा हो जाता है
सब यादें आने लगती है
कल की चिट्ठी के कुछ अक्षर
थोड़े धुंधले धुंधले से थे
ख़त लिखते लिखते आँखों से
शायद कुछ आंसू टपके थे
ख़त छोड़ अधूरा भागी तं
अम्मा ने बुला लिया होगा
या फिर शायद बाबूजी को
खांसी का दौर उठा होगा
मै हाथ फेरता चिट्ठी पर ,
आभास तुम्हारा होता है
खुशबू आती तेरे तन की
और साथ तुम्हारा होता है
सारे जज्बात उमड़ कर के
बस चिट्ठी में आ जाते है
मै बार बार चिट्ठी पढता
आँखों में आंसू आते है
देते है मेरी नींद उड़ा
तेरी चिट्ठी के दो पन्ने
मन को छू छू कर जाते है
तेरी चिट्ठी के दो पन्ने
तेरी चिट्ठी के दो पन्ने
मन को छू छू कर जाते है
तेरी चिट्ठी के दो पन्ने
जब कंप्यूटर के इस युग में
ई मेल नहीं ,ख़त मिलता है
मोती से अक्षर से सज कर
पैगामे महोब्बत मिलता है
ख़त के हर अक्षर में खुशबू
आती घर ,माटी, आँगन की
तुम्हारे प्यार महोब्बत की
चाहत की और अपनेपन की
उस दिन तुम्हारी चिट्ठी में
तो स्वाद गजब का आया था
तुमने मक्का की रोटी और
सरसों का साग बनाया था
एक दिन गोबर की खुशबू थी
गाय का दूध दुहा होगा
थी महक एक दिन चुम्बन की
ख़त होटों से छुवा होगा
या खुशबू पुए पकोड़ों की
और रस की खीर महकती है
मन बेकल सा हो जाता है
सब यादें आने लगती है
कल की चिट्ठी के कुछ अक्षर
थोड़े धुंधले धुंधले से थे
ख़त लिखते लिखते आँखों से
शायद कुछ आंसू टपके थे
ख़त छोड़ अधूरा भागी तं
अम्मा ने बुला लिया होगा
या फिर शायद बाबूजी को
खांसी का दौर उठा होगा
मै हाथ फेरता चिट्ठी पर ,
आभास तुम्हारा होता है
खुशबू आती तेरे तन की
और साथ तुम्हारा होता है
सारे जज्बात उमड़ कर के
बस चिट्ठी में आ जाते है
मै बार बार चिट्ठी पढता
आँखों में आंसू आते है
देते है मेरी नींद उड़ा
तेरी चिट्ठी के दो पन्ने
मन को छू छू कर जाते है
तेरी चिट्ठी के दो पन्ने
Sunday, January 16, 2011
हनीमून वाला पागलपन बुढ़ापे का दीवानापन बोलो इन में क्या अंतर है?
हनीमून वाला पागलपन
बुढ़ापे का दीवानापन
बोलो इन में क्या अंतर है?
एक अनजाना ,एक अनजानी
लिखने लगते नयी कहानी
कुछ उत्सुकता ,कुछ आकर्षण
ढूँढा करते है अपनापन
एक दूजे के तन में ,मन में
या अनोखे पागलपन में
थोड़े सहमे ,कुछ घबराये
आकुल व्याकुल पर शर्माए
प्रेम पुष्प करते है अर्पित
एक दूजे को पूर्ण समर्पित
हनीमून तो शुरुवात है
चालू करना नया सफ़र है
हनीमून वाला पागलपन
बुढ़ापे का दीवाना पन
देखो इनमे क्या अंतर है
और बुढ़ापे के दो साथी
एक दिया है और एक बाती
लम्बा सफ़र काट, सुस्ताते
करते याद पुरानी बातें
क्या क्या खोया ,क्या क्या पाया
किसने अपनाया, ठुकराया
एक दूजे पर पूर्ण समर्पण
वही प्रेम और दीवानापन
हैं अशक्त ,तन में थकान पर
एक दूजे की बांह थाम कर
सारा जीवन संग संग काटा
अब भी आपस में निर्भर है
हनीमून वाला पागलपन
बुढ़ापे का दीवानापन
देखो इन में क्या अंतर है
बुढ़ापे का दीवानापन
बोलो इन में क्या अंतर है?
एक अनजाना ,एक अनजानी
लिखने लगते नयी कहानी
कुछ उत्सुकता ,कुछ आकर्षण
ढूँढा करते है अपनापन
एक दूजे के तन में ,मन में
या अनोखे पागलपन में
थोड़े सहमे ,कुछ घबराये
आकुल व्याकुल पर शर्माए
प्रेम पुष्प करते है अर्पित
एक दूजे को पूर्ण समर्पित
हनीमून तो शुरुवात है
चालू करना नया सफ़र है
हनीमून वाला पागलपन
बुढ़ापे का दीवाना पन
देखो इनमे क्या अंतर है
और बुढ़ापे के दो साथी
एक दिया है और एक बाती
लम्बा सफ़र काट, सुस्ताते
करते याद पुरानी बातें
क्या क्या खोया ,क्या क्या पाया
किसने अपनाया, ठुकराया
एक दूजे पर पूर्ण समर्पण
वही प्रेम और दीवानापन
हैं अशक्त ,तन में थकान पर
एक दूजे की बांह थाम कर
सारा जीवन संग संग काटा
अब भी आपस में निर्भर है
हनीमून वाला पागलपन
बुढ़ापे का दीवानापन
देखो इन में क्या अंतर है
Saturday, January 15, 2011
इंतजार है बस उस दिन का
भारत सोने की चिड़िया था
प्रगति में सबसे अगुवा था
हरा भरा खुशहाल देश था
है इतिहास पुराने दिन का
कुछ तो धन ले गए विदेशी
भ्रष्टाचारी नेता देशी
सबने मिल कर इतना लूटा
बचा नहीं कोई भी तिनका
इसे निकले सत्ताधारी
काला धन करतूते काली
बेईमानी, घूस ,कमीशन
खाकर पेट भरा न जिनका
आओ इसे कदम उठाये
कोशिश कर के वापस लाये
स्विस बैंकों में जमा किया धन
उनका था या शायद इनका
कुछ अपनों के राज़ खुलेगे
मैले कपडे मगर धुलेगे
फिर से उजियाला फैलेगा
वो पायेगे हक़ है जिनका
महगाई की आग थमेगी
साँस चैन की जनता लेगी
जन गन मन की शान बढेगी
इंतजार है बस उस दिन का
प्रगति में सबसे अगुवा था
हरा भरा खुशहाल देश था
है इतिहास पुराने दिन का
कुछ तो धन ले गए विदेशी
भ्रष्टाचारी नेता देशी
सबने मिल कर इतना लूटा
बचा नहीं कोई भी तिनका
इसे निकले सत्ताधारी
काला धन करतूते काली
बेईमानी, घूस ,कमीशन
खाकर पेट भरा न जिनका
आओ इसे कदम उठाये
कोशिश कर के वापस लाये
स्विस बैंकों में जमा किया धन
उनका था या शायद इनका
कुछ अपनों के राज़ खुलेगे
मैले कपडे मगर धुलेगे
फिर से उजियाला फैलेगा
वो पायेगे हक़ है जिनका
महगाई की आग थमेगी
साँस चैन की जनता लेगी
जन गन मन की शान बढेगी
इंतजार है बस उस दिन का
दहक बाकी है
छलकते जाम पर इतराए तू क्यों साकी है
बुझे हुए इन शोलो में दहक बाकी है
सर पर है चाँद या की चांदनी तू इन पे न जा
तेरे संग चाँद पर जाने की हवस बाकी है
बहुत बरसें है ये बादल तो कई बरसों तक
फिर से आया है सावन की बरस बाकी है
दूर से आँख चुरा लेती है ,आँखे तो मिला
देख इन बुझते चिरागों में चमक बाकी है
हम तो थे फूल गुलाबों के बहुत ही महके
सूखने लग गए है तो भी महक बाकी है
भले ही शाम है और ढलने लगा है सूरज
छाई है दूर तक लाली कि चमक बाकी है
बुझे हुए इन शोलो में दहक बाकी है
सर पर है चाँद या की चांदनी तू इन पे न जा
तेरे संग चाँद पर जाने की हवस बाकी है
बहुत बरसें है ये बादल तो कई बरसों तक
फिर से आया है सावन की बरस बाकी है
दूर से आँख चुरा लेती है ,आँखे तो मिला
देख इन बुझते चिरागों में चमक बाकी है
हम तो थे फूल गुलाबों के बहुत ही महके
सूखने लग गए है तो भी महक बाकी है
भले ही शाम है और ढलने लगा है सूरज
छाई है दूर तक लाली कि चमक बाकी है
Friday, January 14, 2011
रेवड़ी
रेवड़ी
मेरे दिल में मिठास है
कुछ खुशबू खास है
कड़क कुरमुरी हूँ
स्वाद से भरी हूँ
मुझसे लिपटे है जितने तिल
वो है मेरे चाहने वालो के दिल
सोने की अशर्फी हूँ
मोतियों से जड़ी हूँ
मै रेवड़ी हूँ
सर्दी की उष्मा हूँ
प्यार का उपहार हूँ
दिलों से लिपटा हुआ ,
मिलन का त्यौहार हूँ
जो खाता खिलाता है
बस ये ही चाहता है
मीठा खाओ ,मीठा बोलो
सब के मन में अमृत घोलो
महाराष्ट्र का तिल गुड हूँ
यूपी की खिचड़ी हूँ
आसाम का बिहू
केरल का पोंगल और
पंजाब की लोहड़ी हूँ
मै रेवड़ी हूँ
मेरे दिल में मिठास है
कुछ खुशबू खास है
कड़क कुरमुरी हूँ
स्वाद से भरी हूँ
मुझसे लिपटे है जितने तिल
वो है मेरे चाहने वालो के दिल
सोने की अशर्फी हूँ
मोतियों से जड़ी हूँ
मै रेवड़ी हूँ
सर्दी की उष्मा हूँ
प्यार का उपहार हूँ
दिलों से लिपटा हुआ ,
मिलन का त्यौहार हूँ
जो खाता खिलाता है
बस ये ही चाहता है
मीठा खाओ ,मीठा बोलो
सब के मन में अमृत घोलो
महाराष्ट्र का तिल गुड हूँ
यूपी की खिचड़ी हूँ
आसाम का बिहू
केरल का पोंगल और
पंजाब की लोहड़ी हूँ
मै रेवड़ी हूँ
Thursday, January 13, 2011
ऐसे हम फिसले गाल पर ,कंगाल हो गए
कमसिन था लचकता बदन ,मतवाली चाल थी
वो ही कदम तुम्हारे अब भूचाल हो गए
उड़ उड़ के उड़ा देते थे जो होंश सभी के
लहराते जाल जुल्फ के ,जंजाल हो गए
थे लाल लरजते हुए लब,गाल रेशमी
ऐसे हम फिसले गाल पर ,कंगाल हो गए
हुस्नो अदा और रूप से तुम मालामाल थे
इस माल के चक्कर में हम ,हम्माल हो गए
वो ही कदम तुम्हारे अब भूचाल हो गए
उड़ उड़ के उड़ा देते थे जो होंश सभी के
लहराते जाल जुल्फ के ,जंजाल हो गए
थे लाल लरजते हुए लब,गाल रेशमी
ऐसे हम फिसले गाल पर ,कंगाल हो गए
हुस्नो अदा और रूप से तुम मालामाल थे
इस माल के चक्कर में हम ,हम्माल हो गए
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