Friday, February 11, 2011

ऋतू संहार

                ऋतू संहार
कहा धरा ने ये सूरज से ,प्रिय सूरज जी
बहुत सताते हो हमको ,तुम्हारी मरजी
जब तुम होते दूर मुझे कुछ नहीं सुहाता
साथ तुम्हारा पाने तरस तरस मन जाता
ग्रीष्म ऋतू में आकुल व्याकुल दिल होता है
तुम्हारी उष्मा सहना  मुश्किल  होता है
जब करीब आते हो ,तन जल जल जाता है
मगर दूर रहना भी मन को खल जाता है
प्यास बुझाने आते ,बर्षा के मौसम में
पर बादल बाधा बन जाते मधुर मिलन में
आते हो कुछ देर के लिए ,छुप जाते हो
आँख मिचोली कर के मन को अकुलाते हो
और शिशिर में आस मिलन की जब जगती है
शीत लहर की चुभन, दग्ध तन को करती है
किन्तु तरसता रहता है मन तुम्हारे बिन
नहीं समय मिलता तुमको ,होता छोटा दिन
फिर आता है जब बसंत का मौसम प्यारा
मादकता से पुलकित होता तन मन सारा
होली का मदनोत्सव या  वेलेंटा इन डे
तुम्हारा सानिध्य तार छूता है तन के
प्यार लुटाते हो मुझ पर तुम जी भर भर जी
कहा धरा ने ये सूरज से ,प्रिय सूरज जी


Tuesday, February 8, 2011

एक कहानी -एक कविता - पारस पत्थर


     (बाल कविता)
श्रम से डरता एक किसान
करता संतों का सन्मान
धरम करम में था विश्वास
गया एक साधू के पास
साधू  बाबा का ध्यान
सेवा करने लगा किसान
साधू बोले आँखे खोल
क्या है इच्छा बच्चा बोल
बोला कृषक ,धन्य जय साधो
एक पारस पत्थर दिलवादो
खेत खोद जा बच्चा अपना
पूरा होगा तेरा सपना
साधू बाबा का वरदान
लगा खोदने खेत किसान
उसने हांके हल और बख्खर
मिला नहीं पर पारस पत्थर
उसने बोया उपजा नाज
आ बोले साधू महाराज
श्रम का पारस पत्थर होना
मिटटी भी बन जाती सोना

शारदे माँ शारदे

शारदे माँ शारदे
मुझे ह्रदय का प्यार दे
वर दे की बनू प्रग्य मै
तू जिंदगी  संवार दे
वीणा वादिनी ,सुर की दाता
हंस वाहिनी बुद्धि प्रदाता
मुझको वर दे स्वर दे माता
नव बसंत बहार दे
शारदे माँ शारदे
कर दे माँ इच्छा सब पूरी
पिला ज्ञान की जीवन मूढ़ी
रहे न मेरी बुद्धि अधूरी
मिटा तू अन्धकार दे
शारदे माँ शारदे
भटक रहे अंधियारे में हम
नव प्रकाश दे ,हर ले सब तम
माँ तेरी वीणा के स्वर हम
नूतन हमें विचार दे
शारदे माँ शारदे
मधुरिमा दे हमें प्यार दे
हम भूखे है ,प्रीत धार दे
आशीर्वादों से दुलार दे
जीवन तू निखार दे
शारदे माँ शारदे

Sunday, February 6, 2011

तुम बोराये हो आम्र वृक्ष

फूली सरसों ,फूले पलाश
विकसे पुष्पों की मधु सुवास
सब देख देख कर आस पास
फागुन की मदमाती ऋतु में
  तुम बोराये हो आम्र वृक्ष
गेहूं की बाली थी खाली
अब हुई भरे दानो वाली
मदमस्त थिरकती मतवाली
बाली की बाली उम्र देख ,
     तुम बोराये हो आम्र वृक्ष
सुन गीत मद भरे कोकिल के
तुम हुए मंजरित चंचल से
यह सोच लदोगे कल फल से
सपनो में बेसुध मतवाले
     तुम बोराये हो आम्र वृक्ष
कुछ बौर झडेगे आंधी में
कुछ बन अचार या चटनी में
पक पायेगे कुछ रस भीने
नियति नीयत से अनजाने
   तुम बोराये हो आम्र वृक्ष
हर फल की नियति भिन्न भिन्न
हर फल का जीवन प्रश्न चिन्ह
कोई प्रमुदित है,कोई खिन्न
हर फल बिछ्डेगा फिर भी तुम
क्यों बोराए हो आम्र वृक्ष



 

Saturday, February 5, 2011

एक कहानी -एक कविता

एक  कहानी -एक  कविता
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चला यात्री सूखा पत्ता एक अकेला
मिला राह में उसे एक मिटटी का ढेला
भले एक से दो कह निकले तीरथ करने
ये दो साथी अपना पूर्ण मनोरथ करने
न थी उन दिनों रेल न तांगा,मोटर गाडी
धीरे धीरे पग धरते दोनों बढे अगाडी
आंधी चली और तूफ़ान जोर का आया
पत्ते पर चढ़ ढेले ने था उसे बचाया
आगे आंधी रुकी जोर का बरसा पानी
पत्ते ने चढ़ ढेले पर थी छतरी तानी
उठते गिरते ,इसी तरह काटा सब रास्ता
गला न ढेला,और नहीं उड़ पाया पत्ता
एक दूसरे की रक्षा जब करते साथी
होते पूरे कार्य ,मुश्किलें सब हट जाती

एसा बसंत आये

कली में महक हो ,
तरु पर चहक हो
पवन की पलक पर
सुमन की लहक हो
सभी मुस्कराए
सभी दिल मिलाएं
हर डाल बिकसे
नए पुष्प आये
झडे पान पीले,तरुण हर तरु हो
इस शीत का भी ,कभी अंत आये
जन जन हँसे और जीवन हँसे
सब रहें खुश कि एसा बसंत आये


नुस्खा

 ऊन और  स्वेटर की सलाईयाँ
कुछ उलटे फंदे
कुछ सीधे फंदे
बस ,बन गया स्वेटर
मै,और प्यार भरी नजरें
कुछ नखरे ,झटके
अदा और लटके
बस ,बन गए मिस्टर