Sunday, May 15, 2011

ब्रेक के बाद --आपका भविष्य

     ब्रेक के बाद --आपका भविष्य
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टी.वी. वाले भी गजब ढाते है
पहले तो ये ख़बरें दिखाते है
पेट्रोल के दाम पांच रूपये बढे
 ढूध के दाम  दो रूपये  चढ़े
रिज़र्व बैंक ने ब्याज की दरें बढाई
इस हफ्ते फिर बढ़ी महंगाई
इस बार महंगा आम होगा
बंद के कारण सड़कों पर जाम होगा
फलों को केमिकल से ,बढ़ाते ,पकाते है
मिठाइयों में सिंथेटिक खोवा मिलाते है
इस बार गरमी का ,रिकार्ड टूट जायेगा
बिजली में कटौती होगी,पानी कम आएगा
झपट्टेमार खींच लेते गले से चेन है
बेकाबू कानून व्यवस्था ,कर रही बेचैन है
और इसके बाद,हमें  ये सुनायेंगे
ब्रेक के बाद,
आपका आपका आज का दिन कैसा रहेगा,
पंडित जी बतलायेगे

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Saturday, May 14, 2011

ट्राफिक जाम

ट्राफिक जाम
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सारे रस्ते जाम पड़े है,तेरे दिल तक आने के,
ट्राफिक सिग्नल फ़ैल हुए या हवालदार छुट्टी पर है
ह्रदय रोड पर इतना ट्राफिक ,मैंने देखा कभी नहीं,
कैसे तुझ तक पहुचूँगा मै,बहुत दूर तेरा घर है
ढूंढ रहा हूँ कोई शोर्ट कट,जिससे जल्दी आ पाऊ,
नयन द्वार तू खोले रखना,इन्तजार करना मेरा,
तू मेरे दिल में है,मै भी तेरे दिल में बस जाऊ,
जीवन की साड़ी आशाएं टिकी हुई अब तुझ पर है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Thursday, May 12, 2011

कलयुग

   कलयुग
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आज कल के  गीत गाते ,बुरा बतला कर पुराना
कौन कहता है बदलता ,जा रहा है ये ज़माना
वही मिटटी ,वही कंकर,और वैसी ही धरा है
वही नीला नभ चमकता,और उदधि भी भरा है
है वही मौसम,हवाएं भी वही,दिन रात वो ही
है चमकता वो ही सूरज,और तारे ,चाँद वो ही
तो बदल फिर क्या गया है ,कोई तो हमको बताये
क्या पुराने जमाने में,था नहीं ,अब आ गया है
राम के युग में नहीं क्या,बाँध बांधे जा रहे थे
उन दिनों क्या नहीं पुष्पक ,व्योम में मंडरा रहे थे
और रावण जा रहा था ,स्वर्ग तक सीढ़ी लगाने
अमरिका और रूस जैसे ,लग गयें है ,चाँद जाने
उन दिनों भी कैद रावण ने वरुण को कर लिया था
जिस तरह हम पी रहे हैं ,नलों का पानी पिया था
उन दिनों हनुमान जैसे , उड्डयक थे,यान भी थे
सूर्य तक को ढक लिया,ऐसे किये अभियान भी थे
वारिधि पर शोध करना ,देव दानव ने किया था
मेरु सा जलपोत लेकर,समुन्दर को मथ दिया था
उन दिनों ब्रम्हास्त्र ,एटम बम से कुछ कम नहीं था
चल गया तो रोक ले ,कोई ,किसी में दम नहीं था
चिकित्सा विज्ञानं भी इतना समुन्नत कर लिया था
ह्रदय में रावण ने अपने, कुंड अमृत धर लिया था
उन दिनों अवतार शायद अविष्कारों को बताया
कृष्ण थे या क्रेन,गोवर्धन कभी जिसने  उठाया
और मच्छ  अवतार क्या था ,कुछ नहीं ,जलयान थे वो
बनी पनडुब्बी ,न कछुवा रूप  में भगवान थे वो
बराह का अवतार जिसने,धरा को बाहर निकाला
आज के बुलडोज़रों की तरह ही था यंत्र न्यारा
सेटेलाइट उन दिनों,अवतार वामन का कहाये
जो कि तीनो लोक को थे तीन पग में नाप आये
और हलधारी हुआ,अवतार था बलराम का जो
आजकल के ट्रेक्टरों कि तरह ही कुछ काम था जो
 उन दिनों भी रेडियो कि तरह थी आकाशवाणी
दिव्यदृष्टी ,टेलीविजन से कई वर्षो पुरानी 
उन दिनों भी पत्रकारों कि तरह नारद कई थे
और गोकुल के कन्हैया,डांस में कुछ कम नहीं थे
औरतों का राज तब भी था,अभी भी छा रहा है
बताओ ना,जमाने में, क्या बदलता जा रहा है
मदन मोहन बहेती 'घोटू'


मजबूरी

       मजबूरी
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             १
पत्नी से कहने लगे, भोलू पति कर जोड़
आप हमीं को डाटती,हैं क्यों सबको छोड़
हैं क्यों सबको छोड़,पलट कर पत्नी बोली
मै क्या करूँ ,तेज  तीखी  है  मेरी   बोली
बड़े नाज़ और नखरे से मै पली हुई हूँ
नौकर चाकर वाले घर में बड़ी   हुई      हूँ
                  २
पत्नीजी कहने लगी,जाकर पति के पास
बतलाओ फिर निकालूँ,मन की कहाँ भड़ास
मन की कहाँ भड़ास,अगर डाटूं नौकर को
दो घंटे में छोड़ ,भाग जाएगा  घर को
सुनु एक की चार ,ननद से  जो कुछ बोलूँ
तुम्ही बताओ,बैठे ठाले  झगडा क्यों  लूं
                        ३
सास ,ससुर है सयाने,करते मुझसे प्यार
उनसे मै तीखा नहीं,कर सकती व्यवहार
कर सकती व्यवहार,मम्मी बच्चों की होकर
अपने नन्हे मासूमों को डाटूं क्यों कर
एक तुम्ही तो बचते हो जो सहते सबको
तुम्ही बताओ,तुम्हे छोड़ कर डाटूं  किसको?

मदन मोहन बहेती 'घोटू'


हो गयी क्या गड़बड़ी है-जो फसल सूखी पड़ी है

हो गयी क्या गड़बड़ी है-जो फसल सूखी पड़ी है
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बीज तो मैंने उगा कर,खेत से अपने दिए थे,
फिर न जाने हो गयी क्यों,इस फसल में गड़बड़ी है
आ रहे है बालियों में,कुछ पके अनपके  दाने ,
और कितनी बालियाँ है ,जो अभी खली पड़ी है
 थी बड़ी उपजाऊ माटी,खाद भी मैंने दिया था
खेत को मैंने बड़े ही ,जतन से सिंचित किया था
हल चलाया था समय पर,करी थी अच्छी जुताई
और अच्छे बीज लेकर ,सही मुहुरत में बुवाई
उगे खा पतवार सारे ,छांट कर मैंने निकाले,
बहुत थे अरमान लेकिन ,गाज मुझ पर गिर पड़ी है
हो गयी क्या गड़बड़ी है ,जो फसल सूखी पड़ी है
न तो ओले ही गिरे थे,और ना ही पड़ा  पाला
सही मौसम ,सही बारिश ,सभी कुछ  देखा संभाला
मगर पश्चिम की  हवाएं ,कीट ऐसे साथ लायी
कर दिया बर्बाद ,फसलें,पनपने भी नहीं पायी
कर रहा हूँ जतन भरसक,लाऊ ऐसा कीटनाशक,
जो की फिर से लहलहा दे,फसल जो सूखी पड़ी है
हो गयी क्या गड़बड़ी है,फसल जो सूखी  पड़ी  है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Wednesday, May 11, 2011

मैके में बाकी सब कुछ था, साजन तेरा प्यार नहीं था

मैके में बाकी सब कुछ था,
                   साजन तेरा प्यार नहीं था
मेरे स्वप्न  सुनहरे तो थे,
                        पर पाया आकार नहीं था
मेरे प्यारे पापाजी थे,
                         स्नेहिल ,व्यस्त, मगर रोबीले
स्नेहिल ,व्यस्त ससुरजी भी हैं,
                            मगर सास के आगे ढीले
मम्मी थी ममता की मूरत,
                           मेरी शिक्षक और सखी थी
था कठोर अनुशासन उनका,
                            लेकिन दिल से मोम  रखी थी
ये कर ,वो कर,ऐसे मत कर,
                              जाने क्या क्या था समझाया
वर्ना तेरी सास कहेगी,
                                 तेरी माँ ने कुछ न सिखाया
बहुत प्यार करती सासू माँ,
                                  लेकिन थोडा सास पना है
सासू शक्कर,पर टक्कर की,
                                 यह मुहावरा, कहा सुना है
कभी डाट ती,ताने देती,
                                    किन्तु बाद में समझाती है
घर घर रहन सहन का अंतर,
                                     तौर तरीके बतलाती है
उनके प्यारे से बेटे पर ,
                                 मैंने कर अधिकार लिया है
यही गिला है उनके मन में,
                                  आखिर माँ तो होती माँ है
और ननद प्यारी बहना सी,
                                   है मासूम बड़ी चंचल सी
बहुत प्यार करती भाभी से,
                                   बातें सभी बताती दिल  की
मइके में सबको लगता था,
                                     बेटी नहीं , पराया धन है
पर अपना सा लगता ये घर,
                                        यहीं बिताना अब जीवन है
जब मै बड़ी हुई साजन के ,
                                      लगे जागने  सपने मन में
तुमसा जीवन साथी पाकर,
                                        खुशियाँ सभी मिली जीवन में
छेड़ा छाडी, मान मनोव्वल ,
                                            दिन रंगीन ,महकती राते
एक दूसरे में खो जाना,
                                   ख़तम न हो , वो मीठी  बातें
 मेरे जीवन  का ये उपवन,
                                       तब इतना गुलजार नहीं था
मइके में बाकि सब कुछ था,
                                        साजन तेरा प्यार  नहीं था

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

                                     
 

Tuesday, May 10, 2011

ससुराल संहिता

         ससुराल संहिता
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                 १
कुछ साथी कोलेज के,मिले दिनों के बाद
निज पत्नी ,ससुराल पर,चली बात में बात
चली बात में बात,एक बोला मुस्काकर
यारों अपना तो दिल उलझा दिल्ली  जाकर
'घोटू' कहा दूसरे ने सर पर कर धरके
'अस्सी तो फस गए जाल  में 'जालंधर' के'
                    2
कहा तीसरे मित्र ने,बड़े गर्व के साथ
मिली 'मुरादाबाद' में,मन की मुझे मुराद
मन की मुझे मुराद,तभी चोथा मुस्काया
मै तो अपनी 'अली' 'अलीगढ' से हूँ लाया
'घोटू' कहा पांचवें ने भर आहें ठंडी
मेरे घर में आई 'चंडीगढ़' से 'चंडी'
                         3
छटवें के दिल की कली,कोलकत्ता की नार
बाँहों का घेराव जो,करती बारम्बार
करती बारम्बार,सातवें की थी बारी
बोला 'हाथ' हमारे आई ,'हाथरस' वाली
कह घोटू कविराय,आठवां हंस कर बोला
गिरा हमारे घर में,बम्बई का बम गोला


मदन मोहन बहेती 'घोटू'