Monday, June 13, 2011

वक्र-चक्र

वक्र-चक्र
----------
लचकीली जिव्हा है,लचकीली ग्रिव्हा है,
         और कमर लचकीली, ने मन  ललचाया है
देह ऐसी प्रभु दीन ,कटि तेरी बहुत क्षीण,
         ऊपर उन्नत उरोज,से तन सजाया है
नीचे  नितम्ब भार,मतवाली चलत चाल,
         जाल वक्र रेखा का तन पर बिछाया है
मुस्काते अधर वक्र,देखे तो नज़र वक्र,
            तेरी वक्र रेखाओं ने तो कमाल ढाया है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'
     

     

Sunday, June 12, 2011

रावण के दस सर

रावण के दस सर
--------------------
रावण ,वीर था,और विद्वान था
उसे शास्त्र और शास्त्र  दोनों का ज्ञान था
और उसके दस सर थे
और ये ही मुसीबत की जड़ थे
 एक सर बीच में था,
और एक तरफ चार सर थे ,
और दूसरी तरफ पांच सर थे
इससे उसके दिमाग का बेलेंस बिगड़ गया था,
और वो सीताहरण जैसी हरकत कर गया था
काश उसके नौ या ग्यारह सर होते
और दिमाग का बेलेंस बराबर हो जाता
तो आज उसकी भी तारीफ होती
और वो पूजा जाता

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

लंका दहन

लंका दहन
-------------
लंका का राजा रावण,
था महान वैज्ञानिक ,
और उसकी सोच थी,
बड़ी आधुनिक
उसके पास,आधुनिकतम,
हथियारों का भंडार था
उसका खुद का हेलिकोप्टर,पुष्पक,
बेमिसाल था
उसने जब लंका का टाउन प्लानिग किया
जल वितरण के लिए,नलों की व्यवस्था की,
लोग बोले, उसने वरुण को कैद कर लिया
 लंका के सारे घरों का डिजाइन एक जैसा करवाया
सभी भवनों के शिखरों को सोने से मंडवाया
इसीलिए लंका,सोने की लंका कहलाई
पर बाद में इसी ने मुसीबत ढाई
बाकि तो सब ठीक था
पर उसका सिविल मेंटेनन्स विभाग ,
थोडा वीक था
सीताजी की तलाश में,
हनुमानजी ने ,जब लंका का हर घर खंगाला था
तो कई छतों पर,
सोने की परत उखड़ी पड़ी थी,
नीचे कुछ काला काला था
हनुमानजी ने जब विवेचन किया
तो पाया की काली काली चपड़ी थी,
जिस पर था सोने के पतरे को मड दिया
और अंत में जब सीताजी ,
रावण के फार्महाउस 'अशोक वाटिका' में मिली
 और रावण द्वारा पकडे जाने पर,
हनुमानजी की पूँछ जली
कहते है हनुमानजी का दिमाग,
कंप्यूटर से भी तेज था,
उन्हें छतों पर,सोने की परत के नीचे,
काली काली चपड़ी की याद आई
तो उन्होंने छतों पर छलांग लगायी
और क्योंकि चपड़ी ,बहुत ज्वलनशील होती है,
उसमे आग लग गयी
और सोने की लंका जल गयी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Saturday, June 11, 2011

      चाँद
------------
झिलमिल सितारों की ओढ़े चुनरिया है,
गोल मोल चमकीला,मुखड़ा ,सुहाना है
औरत सा चंदा भी ,चमके है रातों में,
चाँद सा चेहरा ये,नारी की उपमा है
बदल से  घूंघट को,उठा,गिरा लेता है,
महीने में एक दिन की छुट्टी भी लेता है,
अंग्रेजी भाषा में,इसको 'शी' कहते है
तो फिर क्यों हिंदी में,पुर्लिंग चंदरमा है

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

,

मेरी मीता

मेरी मीता
तुम बिन, हर दिन,
एसा बीता
रीता रीता
दिन आया फिर सांझ हो गयी
रजनी काजल आंझ  सो गयी
मैंने ,हर पल ,
भोर प्रतीता
मेरी मीता
शरद,ग्रीष्म ,कुछ जान न पाया
ऋतुओं को  पहचान न पाया
हर मौसम था ,
तीता,तीता
मेरी मीता
तुममे खोयी मेरी आँखे
उडी सपन की लेकर पांखें
मिला नहीं ,
मेरा मनचीता
मेरी मीता
प्रेमपंथ में भटक भटक कर
जब पहुंचा प्रीतम पनघट पर
पाया पनघट,
रीता,रीता
मेरी मीता

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Friday, June 10, 2011

मेह सुख -देह सुख

मेह सुख -देह सुख
---------------------
सूरज के,यौवन की,
प्रखर तेज किरणों का,
पाया जो आलिंगन,
तप्त हुई धरती
अवनि की तपस देख,
घुमड़ घुमड़ घिरे मेघ,
अम्बर पर छाये,
आश्वस्त हुई धरती
मेघों ने गरज गरज,
गया जब मिलन गीत,
साजन के सपनो में,
मस्त हुई धरती
बारिश की फुहारें,
भिगा गयी सब तन मन,
सौंधी सी गंधायी,
तृप्त हुई धरती

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

तुम खरबूजे,मै खरबूजा

तुम खरबूजे,मै खरबूजा
हम दोनों में फर्क बहुत क्यों,
एक है मीठा ,फीका दूजा
एक जात के हम दोनों,
फिर भी क्यों है इतना अंतर
लोग मुझे कहते है दानव,
तुम कहलाते,देव,पैगम्बर
लोग घृणा करते है मुझसे,
तुम्हारी होती है पूजा
तुम खरबूजे,मै खरबूजा
 रूप रंग में बड़ा फर्क है,
अलग अलग हम क्यों दिखते है
इतना रंग भेद क्यों होता,
हम सस्ते,महंगे बिकते है
सब खरबूजे, फिर भी,कोई,
'सिंह''खान' है,कोई 'डिसूज़ा'
तुम खरबूजे,मै खरबूजा
है विभिन्न रंगों के गूदे,
कहीं सफ़ेद,हरा,  या पीला
अलग,अलग है रंग रक्त का,
देखो प्रभु की कैसी लीला
खरबूजे को देख बदलता ,
है क्यों रंग ,हरेक खरबूजा
तुम खरबूजे,मै खरबूजा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'