Tuesday, June 28, 2011

समुद्र मंथन

    समुद्र मंथन
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प्यार तुम्हारा
है अथाह सागर सा गहरा,
और मेरु पर्वत के जैसा ये मेरा मन
जब समुद्र  का  होता मंथन
चौदह रत्न  प्रकट दिखलाते
रूप तुम्हारा 'रम्भा' जैसा,
और चमकीली 'मणि' जैसी तुम्हारी आँखें
'इंद्र धनुष' सी छटा,
'चन्द्र' सा सुन्दर आनन,
'शंख' बजाते सांसों के स्वर
रूप 'हलाहल'
'वारुणी' जैसे अधर मुझे कर देते पागल
'कामधेनु'और 'कल्पवृक्ष' सी
मेरी सभी कामनाएं तुम पूरी करती
'धन्वन्तरी' सी,
दग्ध ह्रदय की पीड़ा हरती
प्रेम 'लक्ष्मी',जब मै साथ तुम्हारा पाता,
'एरावत' सा मत्त गयंद हुआ करता मन,
और 'उच्च्श्रेवा' घोड़े सी दोड़ लगाता
रूप मोहिनी सा धर आती
मुझे देवता समझ प्रेम से,
'अमृत'घट से ,घूँट सुधा की मुझे पिलाती
तो अमरत्व मुझे मिल जाता
तृप्त तृप्त सा हो जाता मन
चौदह रत्न मुझे मिल जाते
जब होता है समुद्र मंथन

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'


Monday, June 27, 2011

बच्चा रो रहा था

बच्चा रो रहा था
पिता ने कहा, देख शेर आया
बच्चा चुप हो गया
बच्चा फिर रोया,
पिता ने कहा,देख हव्वा आया
बच्चा चुप हो गया
बच्चा फिर रोया
पिता ने कहा,देख माँ आई,
बच्चा चुप हो गया
बताओ,बच्चा डर से चुप हुआ प्यार से ?

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

वर्षा गीत

वर्षा गीत
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बदल घुमड़े,घिर घिर ,घुम घुम
पानी बरसा,रिमझिम, रिमझिम
मस्तीवाला,प्यारा मौसम
बचपन नाचा,छमछम,छमछम
उछल उछल कर,छपछप,छपछप
गीली माटी,थप थप,थप थप
हाथ उठा कर,नाचें,कूदें
पकड़ रहे पानी की बूँदें
नन्हे होंठ,पुष्प से खिल खिल
किलकारी भरते,किल किल किल
राग द्वेष ना,चिंता,उलझन
कितना निश्छल,प्यारा बचपन
भोले भाले,चंचल,चंचल
हँसते गाते,हरपल,पल पल
ठुम ठुम ठुमके,कदम सुहाने
अपनी ही धुन में मस्ताने
माँ बुलाएगी,जबतक,तबतक
नाच रहें हैं,छप छप,छप छप
माँ डाटेंगी,तो रो देंगे
प्यार करेंगी,फिर हंस देंगे
सो जायेंगे,थक,थक,थक थक
माँ के आँचल,से लग लग लग

मदन मोहन बाहेती 'घोटू

Tuesday, June 21, 2011

कवितायेँ-किसम किसम की ----------------------------------

    कवितायेँ-किसम किसम की
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बिना किसी लाग लपेट,
बेईमानी,भ्रष्टाचार,
दुर्दशा दर्शाती,
        नंगी सी  कविता
दो चार पंक्तियाँ
क्षणिकाएं या दोहे,
छिपी हुई पर सार्थक,
          चड्डी सी कविता
दिल के बहुत करीब,
भावनाओं के उभार,
दर्शाती है निखार,
          चोली सी कविता
ऊपर से दिखे एक,
पर नीचे मतलब दो,
द्विअर्थी या श्लेष,
          पायजामा कविता
द्रोपदी के चीर सी,
जितना भी पढ़ते जाओ,
उतनी ही बढती जाये,
        साडी सी कविता
अलंकर आभूषित,
मन को लुभानेवाली,
शब्दों से सजी धजी,
      श्रंगार सी कविता

मदन मोहन  बाहेती 'घोटू'

Monday, June 20, 2011

सोने की चिड़िया

      सोने की चिड़िया
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एक नामी संत के शयन कक्ष से,
अड़तीस करोड़ की ,संपत्ति मिलने के बाद
आपको ,लग गया होगा अंदाज
की हमारे संतो,मंदिर और मठों के पास,
कितनी अकूत दौलत का खजाना होगा
शायद  स्विस बेंक में जमा,
काले धन से भी ज्यादा होगा
अगर कोई ईमानदार राजनेता (?)
सत्ता में आजाये
और कुछ ऐसा क़ानून बनाए जिससे
 इन मंदिर ,मठों की अपार सम्पति,
और स्विस बेंक में जमा धन,
देश के काम आजायेगा
तो भारत फिर से,
सोने की चिड़िया बन जाएगा

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

नोयडा
 

अपनो की मार

    अपनो की मार
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            १
आँखों का काजल,
वो ही चुरा सकता है
जो आँखों में बसता है
               २
अकेली लोहे की कुल्हाड़ी
बिलकुल बेबस है बेचारी
लेकिन हत्ते की लकड़ी जब लगती है
तो लकड़ी का पूरा जंगल,
काट वो सकती है
                ३
दही ,दूध का जाया है
मगर ,उसी के एक कतरे ने
दूध को भी जमाया है

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
 






Sunday, June 19, 2011

गर्दभ कहे गदही से,

बैशाखनंदन ने,क्रंदन कर ,मन खोला,
                 रेंक गदही से बोला,प्यार मेरा सच्चा है
तू इतनी है प्यारी,चल चले मतवाली,
                 रूप तेरा अच्छा और गान तेरा अच्छा है
मुझे रोज करती तंग,धोबी के बेटे संग,
                 घाट चली  जाती है,दे जाती गच्चा है
गर्दभ कहे गदही से,आँख मूँद,कर जोड़,
                   सच सच बतला दे ना, तेरे मन में क्या है  

मदन मोहन बहेती'घोटू'