ऊँचा सर
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दो दो तकिये,
सर के नीचे रखने से,
सर ऊँचा नहीं होता
सर ऊँचा करने के लिए,
करने पड़ते है,
कुछ ऐसे काम
जिससे गर्व से ,
आप सर ऊँचा कर सको,
और ऊँचा हो आपका नाम
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Thursday, July 14, 2011
मोडर्न एटिकेट
मोडर्न एटिकेट
-----------------
आज के इस आधुनिक समाज में
अपना जीवन अपने ढंग से जीने को भी,
हो गया हूँ मोहताज मै
बनावटीपन से भरी ,खोखली सी जीवन पद्धिति का,
आदमी इस कदर गुलाम हो गया है
कि जीने का मज़ा ही खो गया है
खिलखिला कर ठहाके मार कर हँसाना,
दुखी होने पर दहाड़े मार कर रोना
पाँव पसार कर बैठना,
पलटियां मार कर सोना
और सोकर उठने पर अंगडाइया लेना,
या फिर जोरदार जमहाईयां लेना
खुजली होने पर अंगों को खुजाना
खुश होने पर मस्ती में गाना
ये सारी क्रियायें, जिनसे मन होता आनंदित है
'मोडर्न एटिकेट' में प्रतिबंधित है
न खुल कर छींक सकते हो,
न खर्राटे भर कर सो सकते हो
न डट कर खाने के बाद डकार ले सकते हो
न कुल्ले कर के मुंह धो सकते हो
और तो और ,कोमल से आम कि फांको को
काँटों से चुभा चुभा,खाया जाता है
जब कि आम का असली मज़ा,
गिलबिलाकर चूसने में आता है
चाय के कप में बिस्कुट डुबा कर खाना,
और चाय,प्लेट में डाल कर सुडबुडाना,
सबडके लेकर,खीर कि कटोरियाँ सटकना ,
और उँगलियों से श्रीखंड चाट कर गटकना
सच,इनमे आता कितना स्वाद है
पर ये आधुनिक तौर तरीकों के खिलाफ है
उदर से वायु का निस्तारण,
करते में, यदि होता शोर है
तो इस पर किसका जोर है
यह तो एक नेसर्गिक क्रिया है
पर इसे 'बेड मैनर्स '(bad manners ) का नाम दिया है
हर एक बात में 'एक्स्कुज़ मी '(excuse me ) की फोर्मिलिटी(formility )
हर अवसर पर एक कार्ड भिजवाने की औपचारिकता,
बहुत दिनों के बाद किसी अपने के मिलने पर,
प्रेम से झप्पी नहीं लेकर,
गाल से गाल मिलाना,
खोखली सी हंसी से मुस्कराना,
क्या इसे ही कहते है आधुनिकता
मै तो हूँ वही करता हूँ
जिसमे है मुझे आनंद मिलता
तुम मुझे कितना ही असभ्य कहो,
ऐसी आधुनिकता से,आया हूँ बाज मै
आज के इस आधुनिक समाज में
मदन मोहन बहेती'घोटू'
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आज के इस आधुनिक समाज में
अपना जीवन अपने ढंग से जीने को भी,
हो गया हूँ मोहताज मै
बनावटीपन से भरी ,खोखली सी जीवन पद्धिति का,
आदमी इस कदर गुलाम हो गया है
कि जीने का मज़ा ही खो गया है
खिलखिला कर ठहाके मार कर हँसाना,
दुखी होने पर दहाड़े मार कर रोना
पाँव पसार कर बैठना,
पलटियां मार कर सोना
और सोकर उठने पर अंगडाइया लेना,
या फिर जोरदार जमहाईयां लेना
खुजली होने पर अंगों को खुजाना
खुश होने पर मस्ती में गाना
ये सारी क्रियायें, जिनसे मन होता आनंदित है
'मोडर्न एटिकेट' में प्रतिबंधित है
न खुल कर छींक सकते हो,
न खर्राटे भर कर सो सकते हो
न डट कर खाने के बाद डकार ले सकते हो
न कुल्ले कर के मुंह धो सकते हो
और तो और ,कोमल से आम कि फांको को
काँटों से चुभा चुभा,खाया जाता है
जब कि आम का असली मज़ा,
गिलबिलाकर चूसने में आता है
चाय के कप में बिस्कुट डुबा कर खाना,
और चाय,प्लेट में डाल कर सुडबुडाना,
सबडके लेकर,खीर कि कटोरियाँ सटकना ,
और उँगलियों से श्रीखंड चाट कर गटकना
सच,इनमे आता कितना स्वाद है
पर ये आधुनिक तौर तरीकों के खिलाफ है
उदर से वायु का निस्तारण,
करते में, यदि होता शोर है
तो इस पर किसका जोर है
यह तो एक नेसर्गिक क्रिया है
पर इसे 'बेड मैनर्स '(bad manners ) का नाम दिया है
हर एक बात में 'एक्स्कुज़ मी '(excuse me ) की फोर्मिलिटी(formility )
हर अवसर पर एक कार्ड भिजवाने की औपचारिकता,
बहुत दिनों के बाद किसी अपने के मिलने पर,
प्रेम से झप्पी नहीं लेकर,
गाल से गाल मिलाना,
खोखली सी हंसी से मुस्कराना,
क्या इसे ही कहते है आधुनिकता
मै तो हूँ वही करता हूँ
जिसमे है मुझे आनंद मिलता
तुम मुझे कितना ही असभ्य कहो,
ऐसी आधुनिकता से,आया हूँ बाज मै
आज के इस आधुनिक समाज में
मदन मोहन बहेती'घोटू'
Wednesday, July 13, 2011
वेदनाये
वेदनाये
------------
दुखी मन की वेदनायें,आज पीछे पड़ गयी है
ह्रदय की संवेदनायें, आज पीछे पड़ गयी है
ओढ़ यादों की रजाई,मन बसंती ठिठुरता है
शूल जैसी चुभा करती ,स्वजनों की निठुरता है
जो कभी अपने सगे थे,पराये से हो गए है
प्यार के ,अपनत्व के सब,भाव क्यूं कर,खो गए है
मिलन की संभावनाएं,आज पीछे पड़ गयी है
दुखी मन की वेदनायें,आज पीछे पड़ गयी है
नींद क्यों जाती उचट अब ,रात के पिछले प्रहर है
भावना के ज्वार में क्यों,मन भटकता,इस कदर है
है बहुत चिंतित व्यथित मन,शांति मन की लुट रही है
घाव ताज़े या पुराने,टीस मन में उठ रही है
कसकती कुछ भावनाए,आज पीछे पड़ गयी है
ह्रदय की संवेदनाये, आज पीछे पड़ गयी है
हो रहा भारी बहुत मन ,ह्रदय में कुछ बोझ सा है
एक दिन की बात ना है,सिलसिला ये रोज का है
कई बाते पुरानी आ,द्वार दिल के खटखटाती
ह्रदय में आक्रोश भरता,भावनाएं छटपटाती
,व्यथित मन की यातनाएं,आज पीछे पड़ गयी है
दुखी दिल की वेदनाये, आज पीछे पड़ गयी है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
------------
दुखी मन की वेदनायें,आज पीछे पड़ गयी है
ह्रदय की संवेदनायें, आज पीछे पड़ गयी है
ओढ़ यादों की रजाई,मन बसंती ठिठुरता है
शूल जैसी चुभा करती ,स्वजनों की निठुरता है
जो कभी अपने सगे थे,पराये से हो गए है
प्यार के ,अपनत्व के सब,भाव क्यूं कर,खो गए है
मिलन की संभावनाएं,आज पीछे पड़ गयी है
दुखी मन की वेदनायें,आज पीछे पड़ गयी है
नींद क्यों जाती उचट अब ,रात के पिछले प्रहर है
भावना के ज्वार में क्यों,मन भटकता,इस कदर है
है बहुत चिंतित व्यथित मन,शांति मन की लुट रही है
घाव ताज़े या पुराने,टीस मन में उठ रही है
कसकती कुछ भावनाए,आज पीछे पड़ गयी है
ह्रदय की संवेदनाये, आज पीछे पड़ गयी है
हो रहा भारी बहुत मन ,ह्रदय में कुछ बोझ सा है
एक दिन की बात ना है,सिलसिला ये रोज का है
कई बाते पुरानी आ,द्वार दिल के खटखटाती
ह्रदय में आक्रोश भरता,भावनाएं छटपटाती
,व्यथित मन की यातनाएं,आज पीछे पड़ गयी है
दुखी दिल की वेदनाये, आज पीछे पड़ गयी है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
Monday, July 11, 2011
तुम्ही तो अर्धांगिनी हो
तुम्ही तो अर्धांगिनी हो
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तुम ह्रदय की स्वामिनी हो,
और जीवन संगिनी हो
मै अधूरा बिन तुम्हारे,
तुम्ही तो अर्धांगिनी हो
,तुम महकते पुष्प की क्यारी,
भ्रमर मै गुनगुनाता
रूप की रोशन शमा तुम,
मै पतंगा छटपटाता
कभी बदली सी बरसती,
कभी छा जाती घटा सी
चांदनी सी बिखर जाती,
रूप की उज्जवल छटा सी
तुम्ही हो फुहार सावन की,
पवन का मस्त झोंका
तुम्ही बासंती बहारें,
और झरना मस्तियों का
प्यार का मै हूँ समंदर,
हर लहर संग प्यार आता
पूर्णिमा के चन्द्र सी तुम,
पास आती,ज्वार आता
मै दिया हूँ,तुम्ही बाती,
गीत मै तुम रागिनी हो
मचलते मेरे ह्रदय की,
कामना हो,कामिनी हो
कृष्ण मै तुम राधिका सी,
रास की रानी तुम्ही हो
प्यार आठों प्रहर करती,
आठ पटरानी तुम्ही हो
तुम्हे पाकर ,पूर्ण सारी,
हो गयी मन की उमंगें
तुम्हारा स्पर्श तन में,
जगाता विद्युत् तरंगें
और इन विद्युत् तरंगों,
की तुम्ही संवाहिनी हो
मै अधूरा बिन तुम्हारे,
तुम्ही तो अर्धांगिनी हो
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
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तुम ह्रदय की स्वामिनी हो,
और जीवन संगिनी हो
मै अधूरा बिन तुम्हारे,
तुम्ही तो अर्धांगिनी हो
,तुम महकते पुष्प की क्यारी,
भ्रमर मै गुनगुनाता
रूप की रोशन शमा तुम,
मै पतंगा छटपटाता
कभी बदली सी बरसती,
कभी छा जाती घटा सी
चांदनी सी बिखर जाती,
रूप की उज्जवल छटा सी
तुम्ही हो फुहार सावन की,
पवन का मस्त झोंका
तुम्ही बासंती बहारें,
और झरना मस्तियों का
प्यार का मै हूँ समंदर,
हर लहर संग प्यार आता
पूर्णिमा के चन्द्र सी तुम,
पास आती,ज्वार आता
मै दिया हूँ,तुम्ही बाती,
गीत मै तुम रागिनी हो
मचलते मेरे ह्रदय की,
कामना हो,कामिनी हो
कृष्ण मै तुम राधिका सी,
रास की रानी तुम्ही हो
प्यार आठों प्रहर करती,
आठ पटरानी तुम्ही हो
तुम्हे पाकर ,पूर्ण सारी,
हो गयी मन की उमंगें
तुम्हारा स्पर्श तन में,
जगाता विद्युत् तरंगें
और इन विद्युत् तरंगों,
की तुम्ही संवाहिनी हो
मै अधूरा बिन तुम्हारे,
तुम्ही तो अर्धांगिनी हो
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
Sunday, July 10, 2011
हरा भरा जीवन
हरा भरा जीवन
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हरियाली सबको भाती है,कभी आपने गौर करा है
जीवन के हर रंग ढंग में,पाओगे तुम हरा भरा है
वर्षा में तो होती ही है,सारी धरती हरी भरी है
सर्दी में कोहरा होता है,तो गर्मी की दोपहरी है
नीलाम्बर के रस की बूँदें,पीत धरा से मिल जाती है
तो फिर हरा रंग आता है,या हरियाली छा जाती है
ग्रामीणों के खेत हरे है,शहरी के भी हरी संग है
और तिरंगा जो लहराता,उसमे भी तो हरा रंग है
सुबह उठो तो धूप सुनहरी,दिन चढ़ आया,दोपहरी है
रात हुई तो मिले मसहरी,सदा जिंदगी हरी भरी है
अगर ख़ुशी होती तो हमको,हंस हंस मन दोहरा होता है
जब दुःख होता है तो चेहरा,चिंता से गहरा होता है
अपनी तबियत हरी हो गयी,देखा उनका सुन्दर चेहरा
किसने यह मन हरा हाय रे,मतवाला था रूप सुनहरा
बदन छरहरा अच्छा लगता,क्योकि अंत में लगा हरा है
रंग सुनहरा,काली आँखे,पर उनमे काजल गहरा है
उनकी जुल्फे लहराती है,उनका आँचल फहराता है
लहराता हो या फहराता,हरा बीच में पर आता है
आज देश के नेता कहते,हमको हरी क्रांति लाना है
हरी लगा है तभी तरक्की,कर पाया यह हरियाणा है
हरिद्वार में हरियाली है,क्योकि हरी आगे बैठा है
देहरादून हरा लगता है,हरी बीच में आ लेटा है
हरी सुभद्रा कृष्णचन्द्र ने,रावण को थे राम हराये
हरे राम और हरे कृष्ण का,जाप और भी फ़ैल रहा है
सबसे अच्छे आम दशहरी,है प्यारा त्यौहार दशहरा
हरी घांस खाकर के पशु भी,देने लगते दूध दोहरा
अक्सर लोग कहा करते है,कितनी बार सुना जाता है
के सावन के हर अंधे को,सब कुछ हरा नज़र आता है
लेकिन आँखों वालों तुम भी,मेरी बात मान जाओगे
जीवन के हर रंग ढंग में,अक्सर हरा भरा पाओगे
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
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हरियाली सबको भाती है,कभी आपने गौर करा है
जीवन के हर रंग ढंग में,पाओगे तुम हरा भरा है
वर्षा में तो होती ही है,सारी धरती हरी भरी है
सर्दी में कोहरा होता है,तो गर्मी की दोपहरी है
नीलाम्बर के रस की बूँदें,पीत धरा से मिल जाती है
तो फिर हरा रंग आता है,या हरियाली छा जाती है
ग्रामीणों के खेत हरे है,शहरी के भी हरी संग है
और तिरंगा जो लहराता,उसमे भी तो हरा रंग है
सुबह उठो तो धूप सुनहरी,दिन चढ़ आया,दोपहरी है
रात हुई तो मिले मसहरी,सदा जिंदगी हरी भरी है
अगर ख़ुशी होती तो हमको,हंस हंस मन दोहरा होता है
जब दुःख होता है तो चेहरा,चिंता से गहरा होता है
अपनी तबियत हरी हो गयी,देखा उनका सुन्दर चेहरा
किसने यह मन हरा हाय रे,मतवाला था रूप सुनहरा
बदन छरहरा अच्छा लगता,क्योकि अंत में लगा हरा है
रंग सुनहरा,काली आँखे,पर उनमे काजल गहरा है
उनकी जुल्फे लहराती है,उनका आँचल फहराता है
लहराता हो या फहराता,हरा बीच में पर आता है
आज देश के नेता कहते,हमको हरी क्रांति लाना है
हरी लगा है तभी तरक्की,कर पाया यह हरियाणा है
हरिद्वार में हरियाली है,क्योकि हरी आगे बैठा है
देहरादून हरा लगता है,हरी बीच में आ लेटा है
हरी सुभद्रा कृष्णचन्द्र ने,रावण को थे राम हराये
हरे राम और हरे कृष्ण का,जाप और भी फ़ैल रहा है
सबसे अच्छे आम दशहरी,है प्यारा त्यौहार दशहरा
हरी घांस खाकर के पशु भी,देने लगते दूध दोहरा
अक्सर लोग कहा करते है,कितनी बार सुना जाता है
के सावन के हर अंधे को,सब कुछ हरा नज़र आता है
लेकिन आँखों वालों तुम भी,मेरी बात मान जाओगे
जीवन के हर रंग ढंग में,अक्सर हरा भरा पाओगे
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
Saturday, July 9, 2011
बारात
बारात
------------
बारात चढ़ रही है
मंथर गति से ,आगे बढ़ रही है
दुल्हे के मित्र और रिश्तेदार,
पसीने से तरबतर,
जोश से नाच रहे है
और मोका मिलने पर,
दुल्हन की सजीधजी,
सहेलियों को ताक रहे है
दुल्हे के कुछ रिश्तेदार,
दुल्हे पर नोट वार,
हाथ ऊँचा कर
सबको दिखाने में लग रहे है
और बैंड बाजे वाले, नोट पकड़ने को ,
चील कव्वों की तरह लपक रहे है
लड़की का बाप,थका हुआ व्यथित है ,
चेहरे पर चिंता है
और लड़के का बाप ,प्रफुल्लित है,
मन ही मन दहेज़ की रकम गिनता है
दूल्हा,सेहरे में चेहरे को छुपाये,
न कुछ देखता है न सुनता है
बस आने वाले खुशहाल दिनों के सपने बुनता है
दुल्हन,कहीं चुपके से,
कनखियों से,
घोड़ी पर चढ़े,अपने सजे धजे,
दुल्हे को निहारती है
और दुल्हन की माँ भी सज रही है,उसे ,
अपने दामाद की, उतारनी आरती है
शादी के मेहमान,
बारात आने के इन्तजार में,
लग रहे है थके थके
सोच रहे है,कब बारात आये
और कब खाना लगे
कुछ मेहमान तो,
शगुन का लिफ़ाफ़ पकड़ा कर
खिसक गए है,चाट पापड़ी खाकर
घोड़ी की लगाम पकडे,
घोड़ी वाला सोच रहा है,
क्या एसा भी दिन आएगा?
जब वो भी दूल्हा बन,
ऐसी सजी धजी घोड़ी पर बैठ पायेगा
बेन्ड वाला सोच रहा है,
कि जब होगी उसकी शादी,
तो उसके साथी
तो बन जायेगे बाराती,
तो फिर बेन्ड कौन बजाएगा
गेस का हंडा उठानेवाली महिला
सोच रही है ,
कि कब बारात ठिकाने पर पहुंचे,
और उसे मजदूरी मिल जाये
और वो अपने घर जाकर,
भूखे बैठे बच्चों को खाना खिलाये
और तो और,दुल्हे कि अम्मा,अभी से,
दादी बनने के सपने गढ़ रही है
बारात आगे बढ़ रही है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
------------
बारात चढ़ रही है
मंथर गति से ,आगे बढ़ रही है
दुल्हे के मित्र और रिश्तेदार,
पसीने से तरबतर,
जोश से नाच रहे है
और मोका मिलने पर,
दुल्हन की सजीधजी,
सहेलियों को ताक रहे है
दुल्हे के कुछ रिश्तेदार,
दुल्हे पर नोट वार,
हाथ ऊँचा कर
सबको दिखाने में लग रहे है
और बैंड बाजे वाले, नोट पकड़ने को ,
चील कव्वों की तरह लपक रहे है
लड़की का बाप,थका हुआ व्यथित है ,
चेहरे पर चिंता है
और लड़के का बाप ,प्रफुल्लित है,
मन ही मन दहेज़ की रकम गिनता है
दूल्हा,सेहरे में चेहरे को छुपाये,
न कुछ देखता है न सुनता है
बस आने वाले खुशहाल दिनों के सपने बुनता है
दुल्हन,कहीं चुपके से,
कनखियों से,
घोड़ी पर चढ़े,अपने सजे धजे,
दुल्हे को निहारती है
और दुल्हन की माँ भी सज रही है,उसे ,
अपने दामाद की, उतारनी आरती है
शादी के मेहमान,
बारात आने के इन्तजार में,
लग रहे है थके थके
सोच रहे है,कब बारात आये
और कब खाना लगे
कुछ मेहमान तो,
शगुन का लिफ़ाफ़ पकड़ा कर
खिसक गए है,चाट पापड़ी खाकर
घोड़ी की लगाम पकडे,
घोड़ी वाला सोच रहा है,
क्या एसा भी दिन आएगा?
जब वो भी दूल्हा बन,
ऐसी सजी धजी घोड़ी पर बैठ पायेगा
बेन्ड वाला सोच रहा है,
कि जब होगी उसकी शादी,
तो उसके साथी
तो बन जायेगे बाराती,
तो फिर बेन्ड कौन बजाएगा
गेस का हंडा उठानेवाली महिला
सोच रही है ,
कि कब बारात ठिकाने पर पहुंचे,
और उसे मजदूरी मिल जाये
और वो अपने घर जाकर,
भूखे बैठे बच्चों को खाना खिलाये
और तो और,दुल्हे कि अम्मा,अभी से,
दादी बनने के सपने गढ़ रही है
बारात आगे बढ़ रही है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
Friday, July 8, 2011
संस्कार
संस्कार
----------
हमने जब बच्चे पाले
तो विनम्रता और आज्ञाकारी
होने के संस्कार डाले
हमें ख़ुशी है ,हमारा बेटा,
अभी भी संस्कारी है
हमारा नहीं तो क्या,
अपनी पत्नी का तो आज्ञाकारी है
घोटू
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हमने जब बच्चे पाले
तो विनम्रता और आज्ञाकारी
होने के संस्कार डाले
हमें ख़ुशी है ,हमारा बेटा,
अभी भी संस्कारी है
हमारा नहीं तो क्या,
अपनी पत्नी का तो आज्ञाकारी है
घोटू
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