पेट्रोलपंप का उदघाटन
---------------------------
एक पेट्रोल पम्प का उदघाटन कर
नेताजी ने पूछा,
पम्प के मालिक को,एक तरफ ले जाकर
भैये,सच सच बतलाना
हमसे न छुपाना
इस जगह,जमीन से पेट्रोल निकलेगा,
ये तुमने कैसे जाना?,
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Friday, July 15, 2011
भ्रमर,तितलियाँ और मधुमख्खी
भ्रमर,तितलियाँ और मधुमख्खी
--------------------------------------
खिले पुष्प पर गुंजन करता काला भंवरा
रस पाता है ,उड़ जाता है
तितली भी तो मंडराती है
रस पीती है ,इठलाती है
लेकिन जब उन्ही पुष्पों पर,
मधुमख्खी है आती जाती
घूँट घूँट कर,रस भर लेती,
और संचय हित,
अपने छत्ते में ले जाती
भ्रमर,तितलियाँ और मधुमख्खी,
तीनो ही हैं रस के प्रेमी,
किन्तु प्रवृत्ति भिन्न भिन्न है
भ्रमर प्रेमी सा,रस का लोभी,
रस पाता है,उड़ जाता है
और तितलियाँ,आधुनिका सी,
पुष्पों पर चढ़ इठलाती है
किन्तु सुगढ़ गृहणी के जैसी है मधुमख्खी,
रस भी चखती,और बचा कर,
संगृह भी करती जाती है
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
--------------------------------------
खिले पुष्प पर गुंजन करता काला भंवरा
रस पाता है ,उड़ जाता है
तितली भी तो मंडराती है
रस पीती है ,इठलाती है
लेकिन जब उन्ही पुष्पों पर,
मधुमख्खी है आती जाती
घूँट घूँट कर,रस भर लेती,
और संचय हित,
अपने छत्ते में ले जाती
भ्रमर,तितलियाँ और मधुमख्खी,
तीनो ही हैं रस के प्रेमी,
किन्तु प्रवृत्ति भिन्न भिन्न है
भ्रमर प्रेमी सा,रस का लोभी,
रस पाता है,उड़ जाता है
और तितलियाँ,आधुनिका सी,
पुष्पों पर चढ़ इठलाती है
किन्तु सुगढ़ गृहणी के जैसी है मधुमख्खी,
रस भी चखती,और बचा कर,
संगृह भी करती जाती है
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
अबके सावन में
अबके सावन में
---------------------
इन होटों पर गीत न आये, अबके सावन में
बारिश में हम भीग न पाए,अबके सावन में
अबके बस पानी ही बरसा,थी कोरी बरसात
रिमझिम में सरगम होती थी,था जब तेरा साथ
व्रत का अमृत बरसाती थी,जो हम पर हर साल,
वो हरियाली तीज न आये,अबके सावन में
तुम्हारी प्यारी अलकों का,था मेघों सा रंग
तड़ित रेख सा,दन्त लड़ी का,मुस्काने का ढंग
घुमड़ घुमड़ कर काले बादल ,छाये कितनी बार
पर वो बादल रीत न पाये,अबके सावन में
पहली बार चुभी है तन पर,पानी की फुहार
जीवन के सावन में सूखे,है हम पहली बार
सूखा सूखा ,भीगा मौसम,सूनी सूनी शाम,
उचट उचट कर नींद न आये,अबके सावन में
मदन मोहन बहेती'घोटू'
---------------------
इन होटों पर गीत न आये, अबके सावन में
बारिश में हम भीग न पाए,अबके सावन में
अबके बस पानी ही बरसा,थी कोरी बरसात
रिमझिम में सरगम होती थी,था जब तेरा साथ
व्रत का अमृत बरसाती थी,जो हम पर हर साल,
वो हरियाली तीज न आये,अबके सावन में
तुम्हारी प्यारी अलकों का,था मेघों सा रंग
तड़ित रेख सा,दन्त लड़ी का,मुस्काने का ढंग
घुमड़ घुमड़ कर काले बादल ,छाये कितनी बार
पर वो बादल रीत न पाये,अबके सावन में
पहली बार चुभी है तन पर,पानी की फुहार
जीवन के सावन में सूखे,है हम पहली बार
सूखा सूखा ,भीगा मौसम,सूनी सूनी शाम,
उचट उचट कर नींद न आये,अबके सावन में
मदन मोहन बहेती'घोटू'
Thursday, July 14, 2011
ऊँचा सर
ऊँचा सर
----------
दो दो तकिये,
सर के नीचे रखने से,
सर ऊँचा नहीं होता
सर ऊँचा करने के लिए,
करने पड़ते है,
कुछ ऐसे काम
जिससे गर्व से ,
आप सर ऊँचा कर सको,
और ऊँचा हो आपका नाम
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
----------
दो दो तकिये,
सर के नीचे रखने से,
सर ऊँचा नहीं होता
सर ऊँचा करने के लिए,
करने पड़ते है,
कुछ ऐसे काम
जिससे गर्व से ,
आप सर ऊँचा कर सको,
और ऊँचा हो आपका नाम
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
मोडर्न एटिकेट
मोडर्न एटिकेट
-----------------
आज के इस आधुनिक समाज में
अपना जीवन अपने ढंग से जीने को भी,
हो गया हूँ मोहताज मै
बनावटीपन से भरी ,खोखली सी जीवन पद्धिति का,
आदमी इस कदर गुलाम हो गया है
कि जीने का मज़ा ही खो गया है
खिलखिला कर ठहाके मार कर हँसाना,
दुखी होने पर दहाड़े मार कर रोना
पाँव पसार कर बैठना,
पलटियां मार कर सोना
और सोकर उठने पर अंगडाइया लेना,
या फिर जोरदार जमहाईयां लेना
खुजली होने पर अंगों को खुजाना
खुश होने पर मस्ती में गाना
ये सारी क्रियायें, जिनसे मन होता आनंदित है
'मोडर्न एटिकेट' में प्रतिबंधित है
न खुल कर छींक सकते हो,
न खर्राटे भर कर सो सकते हो
न डट कर खाने के बाद डकार ले सकते हो
न कुल्ले कर के मुंह धो सकते हो
और तो और ,कोमल से आम कि फांको को
काँटों से चुभा चुभा,खाया जाता है
जब कि आम का असली मज़ा,
गिलबिलाकर चूसने में आता है
चाय के कप में बिस्कुट डुबा कर खाना,
और चाय,प्लेट में डाल कर सुडबुडाना,
सबडके लेकर,खीर कि कटोरियाँ सटकना ,
और उँगलियों से श्रीखंड चाट कर गटकना
सच,इनमे आता कितना स्वाद है
पर ये आधुनिक तौर तरीकों के खिलाफ है
उदर से वायु का निस्तारण,
करते में, यदि होता शोर है
तो इस पर किसका जोर है
यह तो एक नेसर्गिक क्रिया है
पर इसे 'बेड मैनर्स '(bad manners ) का नाम दिया है
हर एक बात में 'एक्स्कुज़ मी '(excuse me ) की फोर्मिलिटी(formility )
हर अवसर पर एक कार्ड भिजवाने की औपचारिकता,
बहुत दिनों के बाद किसी अपने के मिलने पर,
प्रेम से झप्पी नहीं लेकर,
गाल से गाल मिलाना,
खोखली सी हंसी से मुस्कराना,
क्या इसे ही कहते है आधुनिकता
मै तो हूँ वही करता हूँ
जिसमे है मुझे आनंद मिलता
तुम मुझे कितना ही असभ्य कहो,
ऐसी आधुनिकता से,आया हूँ बाज मै
आज के इस आधुनिक समाज में
मदन मोहन बहेती'घोटू'
-----------------
आज के इस आधुनिक समाज में
अपना जीवन अपने ढंग से जीने को भी,
हो गया हूँ मोहताज मै
बनावटीपन से भरी ,खोखली सी जीवन पद्धिति का,
आदमी इस कदर गुलाम हो गया है
कि जीने का मज़ा ही खो गया है
खिलखिला कर ठहाके मार कर हँसाना,
दुखी होने पर दहाड़े मार कर रोना
पाँव पसार कर बैठना,
पलटियां मार कर सोना
और सोकर उठने पर अंगडाइया लेना,
या फिर जोरदार जमहाईयां लेना
खुजली होने पर अंगों को खुजाना
खुश होने पर मस्ती में गाना
ये सारी क्रियायें, जिनसे मन होता आनंदित है
'मोडर्न एटिकेट' में प्रतिबंधित है
न खुल कर छींक सकते हो,
न खर्राटे भर कर सो सकते हो
न डट कर खाने के बाद डकार ले सकते हो
न कुल्ले कर के मुंह धो सकते हो
और तो और ,कोमल से आम कि फांको को
काँटों से चुभा चुभा,खाया जाता है
जब कि आम का असली मज़ा,
गिलबिलाकर चूसने में आता है
चाय के कप में बिस्कुट डुबा कर खाना,
और चाय,प्लेट में डाल कर सुडबुडाना,
सबडके लेकर,खीर कि कटोरियाँ सटकना ,
और उँगलियों से श्रीखंड चाट कर गटकना
सच,इनमे आता कितना स्वाद है
पर ये आधुनिक तौर तरीकों के खिलाफ है
उदर से वायु का निस्तारण,
करते में, यदि होता शोर है
तो इस पर किसका जोर है
यह तो एक नेसर्गिक क्रिया है
पर इसे 'बेड मैनर्स '(bad manners ) का नाम दिया है
हर एक बात में 'एक्स्कुज़ मी '(excuse me ) की फोर्मिलिटी(formility )
हर अवसर पर एक कार्ड भिजवाने की औपचारिकता,
बहुत दिनों के बाद किसी अपने के मिलने पर,
प्रेम से झप्पी नहीं लेकर,
गाल से गाल मिलाना,
खोखली सी हंसी से मुस्कराना,
क्या इसे ही कहते है आधुनिकता
मै तो हूँ वही करता हूँ
जिसमे है मुझे आनंद मिलता
तुम मुझे कितना ही असभ्य कहो,
ऐसी आधुनिकता से,आया हूँ बाज मै
आज के इस आधुनिक समाज में
मदन मोहन बहेती'घोटू'
Wednesday, July 13, 2011
वेदनाये
वेदनाये
------------
दुखी मन की वेदनायें,आज पीछे पड़ गयी है
ह्रदय की संवेदनायें, आज पीछे पड़ गयी है
ओढ़ यादों की रजाई,मन बसंती ठिठुरता है
शूल जैसी चुभा करती ,स्वजनों की निठुरता है
जो कभी अपने सगे थे,पराये से हो गए है
प्यार के ,अपनत्व के सब,भाव क्यूं कर,खो गए है
मिलन की संभावनाएं,आज पीछे पड़ गयी है
दुखी मन की वेदनायें,आज पीछे पड़ गयी है
नींद क्यों जाती उचट अब ,रात के पिछले प्रहर है
भावना के ज्वार में क्यों,मन भटकता,इस कदर है
है बहुत चिंतित व्यथित मन,शांति मन की लुट रही है
घाव ताज़े या पुराने,टीस मन में उठ रही है
कसकती कुछ भावनाए,आज पीछे पड़ गयी है
ह्रदय की संवेदनाये, आज पीछे पड़ गयी है
हो रहा भारी बहुत मन ,ह्रदय में कुछ बोझ सा है
एक दिन की बात ना है,सिलसिला ये रोज का है
कई बाते पुरानी आ,द्वार दिल के खटखटाती
ह्रदय में आक्रोश भरता,भावनाएं छटपटाती
,व्यथित मन की यातनाएं,आज पीछे पड़ गयी है
दुखी दिल की वेदनाये, आज पीछे पड़ गयी है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
------------
दुखी मन की वेदनायें,आज पीछे पड़ गयी है
ह्रदय की संवेदनायें, आज पीछे पड़ गयी है
ओढ़ यादों की रजाई,मन बसंती ठिठुरता है
शूल जैसी चुभा करती ,स्वजनों की निठुरता है
जो कभी अपने सगे थे,पराये से हो गए है
प्यार के ,अपनत्व के सब,भाव क्यूं कर,खो गए है
मिलन की संभावनाएं,आज पीछे पड़ गयी है
दुखी मन की वेदनायें,आज पीछे पड़ गयी है
नींद क्यों जाती उचट अब ,रात के पिछले प्रहर है
भावना के ज्वार में क्यों,मन भटकता,इस कदर है
है बहुत चिंतित व्यथित मन,शांति मन की लुट रही है
घाव ताज़े या पुराने,टीस मन में उठ रही है
कसकती कुछ भावनाए,आज पीछे पड़ गयी है
ह्रदय की संवेदनाये, आज पीछे पड़ गयी है
हो रहा भारी बहुत मन ,ह्रदय में कुछ बोझ सा है
एक दिन की बात ना है,सिलसिला ये रोज का है
कई बाते पुरानी आ,द्वार दिल के खटखटाती
ह्रदय में आक्रोश भरता,भावनाएं छटपटाती
,व्यथित मन की यातनाएं,आज पीछे पड़ गयी है
दुखी दिल की वेदनाये, आज पीछे पड़ गयी है
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
Monday, July 11, 2011
तुम्ही तो अर्धांगिनी हो
तुम्ही तो अर्धांगिनी हो
---------------------------
तुम ह्रदय की स्वामिनी हो,
और जीवन संगिनी हो
मै अधूरा बिन तुम्हारे,
तुम्ही तो अर्धांगिनी हो
,तुम महकते पुष्प की क्यारी,
भ्रमर मै गुनगुनाता
रूप की रोशन शमा तुम,
मै पतंगा छटपटाता
कभी बदली सी बरसती,
कभी छा जाती घटा सी
चांदनी सी बिखर जाती,
रूप की उज्जवल छटा सी
तुम्ही हो फुहार सावन की,
पवन का मस्त झोंका
तुम्ही बासंती बहारें,
और झरना मस्तियों का
प्यार का मै हूँ समंदर,
हर लहर संग प्यार आता
पूर्णिमा के चन्द्र सी तुम,
पास आती,ज्वार आता
मै दिया हूँ,तुम्ही बाती,
गीत मै तुम रागिनी हो
मचलते मेरे ह्रदय की,
कामना हो,कामिनी हो
कृष्ण मै तुम राधिका सी,
रास की रानी तुम्ही हो
प्यार आठों प्रहर करती,
आठ पटरानी तुम्ही हो
तुम्हे पाकर ,पूर्ण सारी,
हो गयी मन की उमंगें
तुम्हारा स्पर्श तन में,
जगाता विद्युत् तरंगें
और इन विद्युत् तरंगों,
की तुम्ही संवाहिनी हो
मै अधूरा बिन तुम्हारे,
तुम्ही तो अर्धांगिनी हो
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
---------------------------
तुम ह्रदय की स्वामिनी हो,
और जीवन संगिनी हो
मै अधूरा बिन तुम्हारे,
तुम्ही तो अर्धांगिनी हो
,तुम महकते पुष्प की क्यारी,
भ्रमर मै गुनगुनाता
रूप की रोशन शमा तुम,
मै पतंगा छटपटाता
कभी बदली सी बरसती,
कभी छा जाती घटा सी
चांदनी सी बिखर जाती,
रूप की उज्जवल छटा सी
तुम्ही हो फुहार सावन की,
पवन का मस्त झोंका
तुम्ही बासंती बहारें,
और झरना मस्तियों का
प्यार का मै हूँ समंदर,
हर लहर संग प्यार आता
पूर्णिमा के चन्द्र सी तुम,
पास आती,ज्वार आता
मै दिया हूँ,तुम्ही बाती,
गीत मै तुम रागिनी हो
मचलते मेरे ह्रदय की,
कामना हो,कामिनी हो
कृष्ण मै तुम राधिका सी,
रास की रानी तुम्ही हो
प्यार आठों प्रहर करती,
आठ पटरानी तुम्ही हो
तुम्हे पाकर ,पूर्ण सारी,
हो गयी मन की उमंगें
तुम्हारा स्पर्श तन में,
जगाता विद्युत् तरंगें
और इन विद्युत् तरंगों,
की तुम्ही संवाहिनी हो
मै अधूरा बिन तुम्हारे,
तुम्ही तो अर्धांगिनी हो
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
Subscribe to:
Posts (Atom)