डुगडुगी
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सुनो डुगडुगी राजा
काहे रोज बजाते बाजा
करते नित्य ताज़ा ताज़ा,
बकवास हो
तुम सत्ता में कभी थे
चुक चुके हो तुम कभी के
मन में सपने गद्दी के
करते आस हो
करते बातें ऊलजुलूल
अपनी मर्यादा को भूल
बजते रहना यूं ही फिजूल
कुछ भी बात हो
तुम जो बकते हो दिनरात
लोग बतलाते है बात
सर पर प्रिंस का है हाथ
उसके खास हो
घोटू
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Tuesday, July 19, 2011
Monday, July 18, 2011
बारिश का मज़ा
बारिश का मज़ा
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बरस रहा हो पानी रिमझिम
और साथ में हो मै और तुम
छोटी सी छत्री के नीचे
दोनों संग संग भीजे भीजे
एक दूजे के तन से सट के
हो जाते है ,कुछ पागल से
तू भी व्याकुल,आँखे मूंदे
मोती सी पानी की बूँदें
बह कर के तेरे बालों से
चमक रही तेरे गालों पर
और गरजते है जब बादल
सहमा करती तू डर डर कर
तड़ित चमकती,तू डर जाती
मुझसे लिपट लिपट सी जाती
तेरे भीगे तन को छूकर
मुझ में गर्मी सी जाती भर
गीले तन से चिपका आँचल
कर देता है मुझको पागल
मन कहता घन रहे बरसते
पानी में हम रहे तरसते
मज़ा प्यास का मगर अजब है
बारिश का रोमांस गजब है
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
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बरस रहा हो पानी रिमझिम
और साथ में हो मै और तुम
छोटी सी छत्री के नीचे
दोनों संग संग भीजे भीजे
एक दूजे के तन से सट के
हो जाते है ,कुछ पागल से
तू भी व्याकुल,आँखे मूंदे
मोती सी पानी की बूँदें
बह कर के तेरे बालों से
चमक रही तेरे गालों पर
और गरजते है जब बादल
सहमा करती तू डर डर कर
तड़ित चमकती,तू डर जाती
मुझसे लिपट लिपट सी जाती
तेरे भीगे तन को छूकर
मुझ में गर्मी सी जाती भर
गीले तन से चिपका आँचल
कर देता है मुझको पागल
मन कहता घन रहे बरसते
पानी में हम रहे तरसते
मज़ा प्यास का मगर अजब है
बारिश का रोमांस गजब है
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
तेरे हाथ में
तेरे हाथ में
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तेरे हाथों की बनायी
दाल ,सब्जी,मिठाई,
मैंने चाट चाट खायी
डूब स्वाद में
पैसे पर्स के मेरे
हाथ लगने पे तेरे
जाने कहाँ उड़ गए रे
बात बात में
अपनी उंगली पे नचा के,
मुझे बहलाती सहला के
रख्खे दीवाना बना के,
दिन रात में
मन करती है बेकाबू
सच सच बतला तू
जाने कैसा है रे जादू
तेरे हाथ में
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
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तेरे हाथों की बनायी
दाल ,सब्जी,मिठाई,
मैंने चाट चाट खायी
डूब स्वाद में
पैसे पर्स के मेरे
हाथ लगने पे तेरे
जाने कहाँ उड़ गए रे
बात बात में
अपनी उंगली पे नचा के,
मुझे बहलाती सहला के
रख्खे दीवाना बना के,
दिन रात में
मन करती है बेकाबू
सच सच बतला तू
जाने कैसा है रे जादू
तेरे हाथ में
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
Sunday, July 17, 2011
आजन्म कुंवारों के प्रति
आजन्म कुंवारों के प्रति
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चाहते थे जिंदगी की रह में,
हमसफ़र एक चाँद का टुकड़ा मिले
महक जाए जिंदगी का ये चमन,
फूल कुछ एसा गमकता सा खिले
चाहते थे रूपसी यूं मदभरी,
जिधर से निकले नशीला हो समां
थाम ले दिल देखने वाले सभी,
इस तरह की हो अनूठी दिलरुबां
पर समय का समीरण सब ले उड़ा,
स्वप्न यौवन के सुनहरे ,खो गये
रूपसी इसी नहीं कोई मिली,
प्रतीक्षा में केश रूपा हो गये
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
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चाहते थे जिंदगी की रह में,
हमसफ़र एक चाँद का टुकड़ा मिले
महक जाए जिंदगी का ये चमन,
फूल कुछ एसा गमकता सा खिले
चाहते थे रूपसी यूं मदभरी,
जिधर से निकले नशीला हो समां
थाम ले दिल देखने वाले सभी,
इस तरह की हो अनूठी दिलरुबां
पर समय का समीरण सब ले उड़ा,
स्वप्न यौवन के सुनहरे ,खो गये
रूपसी इसी नहीं कोई मिली,
प्रतीक्षा में केश रूपा हो गये
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
Friday, July 15, 2011
पेट्रोलपंप का उदघाटन
पेट्रोलपंप का उदघाटन
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एक पेट्रोल पम्प का उदघाटन कर
नेताजी ने पूछा,
पम्प के मालिक को,एक तरफ ले जाकर
भैये,सच सच बतलाना
हमसे न छुपाना
इस जगह,जमीन से पेट्रोल निकलेगा,
ये तुमने कैसे जाना?,
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
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एक पेट्रोल पम्प का उदघाटन कर
नेताजी ने पूछा,
पम्प के मालिक को,एक तरफ ले जाकर
भैये,सच सच बतलाना
हमसे न छुपाना
इस जगह,जमीन से पेट्रोल निकलेगा,
ये तुमने कैसे जाना?,
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
भ्रमर,तितलियाँ और मधुमख्खी
भ्रमर,तितलियाँ और मधुमख्खी
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खिले पुष्प पर गुंजन करता काला भंवरा
रस पाता है ,उड़ जाता है
तितली भी तो मंडराती है
रस पीती है ,इठलाती है
लेकिन जब उन्ही पुष्पों पर,
मधुमख्खी है आती जाती
घूँट घूँट कर,रस भर लेती,
और संचय हित,
अपने छत्ते में ले जाती
भ्रमर,तितलियाँ और मधुमख्खी,
तीनो ही हैं रस के प्रेमी,
किन्तु प्रवृत्ति भिन्न भिन्न है
भ्रमर प्रेमी सा,रस का लोभी,
रस पाता है,उड़ जाता है
और तितलियाँ,आधुनिका सी,
पुष्पों पर चढ़ इठलाती है
किन्तु सुगढ़ गृहणी के जैसी है मधुमख्खी,
रस भी चखती,और बचा कर,
संगृह भी करती जाती है
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
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खिले पुष्प पर गुंजन करता काला भंवरा
रस पाता है ,उड़ जाता है
तितली भी तो मंडराती है
रस पीती है ,इठलाती है
लेकिन जब उन्ही पुष्पों पर,
मधुमख्खी है आती जाती
घूँट घूँट कर,रस भर लेती,
और संचय हित,
अपने छत्ते में ले जाती
भ्रमर,तितलियाँ और मधुमख्खी,
तीनो ही हैं रस के प्रेमी,
किन्तु प्रवृत्ति भिन्न भिन्न है
भ्रमर प्रेमी सा,रस का लोभी,
रस पाता है,उड़ जाता है
और तितलियाँ,आधुनिका सी,
पुष्पों पर चढ़ इठलाती है
किन्तु सुगढ़ गृहणी के जैसी है मधुमख्खी,
रस भी चखती,और बचा कर,
संगृह भी करती जाती है
मदन मोहन बहेती 'घोटू'
अबके सावन में
अबके सावन में
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इन होटों पर गीत न आये, अबके सावन में
बारिश में हम भीग न पाए,अबके सावन में
अबके बस पानी ही बरसा,थी कोरी बरसात
रिमझिम में सरगम होती थी,था जब तेरा साथ
व्रत का अमृत बरसाती थी,जो हम पर हर साल,
वो हरियाली तीज न आये,अबके सावन में
तुम्हारी प्यारी अलकों का,था मेघों सा रंग
तड़ित रेख सा,दन्त लड़ी का,मुस्काने का ढंग
घुमड़ घुमड़ कर काले बादल ,छाये कितनी बार
पर वो बादल रीत न पाये,अबके सावन में
पहली बार चुभी है तन पर,पानी की फुहार
जीवन के सावन में सूखे,है हम पहली बार
सूखा सूखा ,भीगा मौसम,सूनी सूनी शाम,
उचट उचट कर नींद न आये,अबके सावन में
मदन मोहन बहेती'घोटू'
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इन होटों पर गीत न आये, अबके सावन में
बारिश में हम भीग न पाए,अबके सावन में
अबके बस पानी ही बरसा,थी कोरी बरसात
रिमझिम में सरगम होती थी,था जब तेरा साथ
व्रत का अमृत बरसाती थी,जो हम पर हर साल,
वो हरियाली तीज न आये,अबके सावन में
तुम्हारी प्यारी अलकों का,था मेघों सा रंग
तड़ित रेख सा,दन्त लड़ी का,मुस्काने का ढंग
घुमड़ घुमड़ कर काले बादल ,छाये कितनी बार
पर वो बादल रीत न पाये,अबके सावन में
पहली बार चुभी है तन पर,पानी की फुहार
जीवन के सावन में सूखे,है हम पहली बार
सूखा सूखा ,भीगा मौसम,सूनी सूनी शाम,
उचट उचट कर नींद न आये,अबके सावन में
मदन मोहन बहेती'घोटू'
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