Wednesday, August 10, 2011

जीवन दर्शन

जीवन दर्शन
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मै का मय है बड़ा नशीला,
             सर पर चढ़ बोला करता है
अहंकार का मूल यही है,
               सबको बढबोला करता है
होता जब कोई मदांध है,
                 तो आने लगती सड़ांध है
पूर्ण विकस कर जब इतराता,
                  होने लगता क्षीण चाँद है
जब तक पानी बंधा बाँध से,
                  बिजली और उर्जा देता है
बाँध तोड़ बहता गरूर से,
                  तहस नहस सब कर देता है
,कितने ही बन जाओ बड़े तुम,
                   मर्यादा में रहना सीखो
अहंकार को मत छूने दो,
                    मंथर गति से बहना सीखो

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

घर का खाना

घर का खाना
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पकवानों को देख बहुत मन ललचाता है
थाली में पर घर का खाना ही आता है
अच्छा लगने लगता जो खाते रोजाना
सबको अच्छा लगता अपने घर का खाना
लेकिन कभी कभी मन हो जाता है बेकाबू
जब पड़ोस के चौके से आती है खुशबू
कभी कभी होटल जाने को भी जी करता
पेट मगर घर की रोटी से ही है भरता
वैसे ही, सूखी लकड़ी हो या हो हथिनी
सबको अच्छी लगती अपनी अपनी पत्नी

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

बनो हजारे

बनो हजारे
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तुमने ये संसार रचा है,सच बतलाना मुझको भगवन
एक अनार में इतने दाने, कैसे सजा सजा भरते तुम
कितने मीठे और रसीले,एक एक मोती से सुन्दर
मिल कर गले एक दूजे से,पास पास रहते है अन्दर
कैसे गेदे के पुष्पों में ,कई पंखुडियां खुशबू वाली
एक दूजे से बंध कर रहती,और महकती है मतवाली
क्यों गुलाब की कई पंखुडियां,एक साथ मिल कर खिलती है
कितनी सुन्दर शोभित होती,और कितनी खुशबू मिलती है
ये सब रचनाएँ तुम्हारी,रूप संगठित जिनका निखरा
मानव भी तुम्हारी रचना,फिर क्यों रहता बिखरा,बिखरा?
क्यों ना वो अनार दानो सा,एक दूजे के संग रह पाता
बाँध हजारों पंखुड़ी संग में,खिला हजारे सा बन जाता

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

Monday, August 8, 2011

विरहन की रात

विरहन की रात
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व्योम से आई उतर कर चांदनी,
दिया मुझको गुदगुदी करके जगा
नींद उचटी इस तरह आई नहीं,
करवटें लेती रही मै, सकपका
और उसपर बादलों से झांक कर,
चाँद भी शैतान सा तकता रहा
इधर मै थी शरम से पानी हुई,
उधर वह निर्लज्ज सा हँसता रहा
और उस पर निगोड़ी पागल हवा,
उड़ा आँचल को, सताती ही रही 
इन सभी की छेड़खानी रात भर,
याद तुम्हारी दिलाती ही रही
छटपटाती ,कसमसाती ही रही,
सोच करके कई बातें अटपटी
क्या बताऊँ तुम्हे प्रियतम तुम बिना,
रात मेरी विरह की कैसी कटी

मदन मोहन बहेती 'घोटू'

Sunday, August 7, 2011

दास्ताने लालू

दास्ताने लालू
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उनकी बकवास भी लोगों को भली लगती थी
उनकी  भैंसें भी  हरे नोट चरा  करती  थी
भीड़ रहती थी लगी,घर पर सदा भक्तों की
ये  तो है बात रंगीले,   सुनहरे वक्तों  की
बोलती रहती थी तूती बिहार में जिनकी
बड़ी बिगाड़ दी हालत है हार ने इनकी
नाव जो डूबी,संग छोड़ा साथ वालों ने
आया जो वक्त बुरा, छोड़ दिया सालों ने
अब तो तन्हाई में बस वक्त गुजारा करते
गए वो दिन जब मियां,फाख्ता मारा करते
खाते है बैठके बीबी के संग लिट्टी,आलू
सबकी होती है यही नियति,है हम सब लालू




मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

पूरण पूरी

पूरण पूरी
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पूरी होती तो पूरी है,फिर भी मगर अधूरी है
क्योंकि दिल होता है खाली,दो परतों में दूरी है
पर जब भर जाता मिठास का,पूरण इस खाली दिल में,
तब होती सम्पूर्ण और कहलाती पूरण पूरी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मै तो नीर भरी बदली हूँ

मै तो नीर भरी बदली हूँ
सचमुच मै कितनी पगली हूँ
मदद ताप की ले सूरज से
नीर चुराती मै सागर से
और छुपा अपने आँचल में
भटका करती इधर उधर मै
क्योंकि सिपाही नीलाम्बर के
मुझे  देखते चोरी  करते
और हवायें पीछे पड़ती
बिजली की तलवार कड़कती
और हवाओं के दबाब में
सभी चुराया हुआ माल मै
धरती पर बरसा देती हूँ
पाक साफ़ दामन करती हूँ
नीर चुराया मेरा सब पर
जब गिरता सूखी धरती पर
लोगों के चेहरे हर्षाते
नाले ,नदियाँ सब भर जाते
हरी भरी धरती  मुस्काती
खेतों में फसलें लहराती
मेरा मन हो जाता विव्हल
यदि यह है चोरी का प्रतिफल
चोरी करना  भी स्वीकार्य है
सचमुच ये तो पुण्य कार्य है
इसीलिये मै ना डरती हूँ
बार बार चोरी करती हूँ
ना बदलूंगी,ना बदली हूँ
मै तो नीर भरी  बदली हूँ

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'