Saturday, September 24, 2011

मेरी परम प्रिया,जलेबी

मेरी परम प्रिया-जलेबी
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पीत वर्णा,
वक्र बदना
कमनीय काया धारिणी,
सुंदरी!
जैसे,अग्नि तपित स्निग्ध कुंड में,
स्नानोपरांत,
रस कुंड से रसरंजित हो,
उतर आई हो,
कोई महकती हुई परी
तुम्हे देख कर
मेरे अधर,
लालायित हो जाते हैं,
करने को तुम्हारा चुम्बन
तुम्हारे सामीप्य से,
एक तृष्णा सी जग जाती है,
और तुम्हे पाने को मचल जाता है मन
तुम्हारी मिठास
देती है एक अवर्णनीय ,
तृप्ति का आभास
स्वर्णिम आभा लिए,
तुम्हारी अष्टावक्र काया
मेरे मन को,
जितना आनंद से है भिगोती
उतना सुख तुम शायद ही दे पाती,
यदि तुम कनक छड़ी सी सीधी होती
मै मधुमेह पीड़ित,
मोहित रहता हूँ,
देख कर तुम्हारी मधुरता
सब कुछ बिसरा कर,
तुम्हारे रसपान का सुख,
भोगने से वंचित नहीं रह सकता
क्योंकि तुम मनभावन,हो ही ऐसी
मेरी परम प्रिया,जलेबी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर

जय हनुमान ज्ञान गुण सागर
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हमारी स्वतंत्र भारत माता को,
सीता की तरह,
भ्रष्ट राजनीतिज्ञ रावणों ने,
कैद कर  रखा रखा है,
हे हनुमान!
उनकी सोने की लंका को जलाओ,
और सीता को छुड़ाओ
मंहगाई सुरसा की तरह,
अपना मुंह फाड़ती ही  जा रही है,
गरीब जनता,बत्तीस रूपये प्रति दिन में,
कैसे लघु रूप धारण कर,बाहर निकले,
हे हनुमान!इतना बतलादो
आम जनता,राम की सेना सी,
समुद्र के इस पार खड़ी है,
और दूसरी ओर,
 सत्ताधारियों की सोने की लंका है ,
इस दूरी को पाटने के लिए,
एक सेतु का निर्माण जरूरी है,
पर एक दुसरे पर पत्थर फेंके जा रहे है,
हे हनुमान!राम का नाम लिखवा कर,
इन पत्थरों को तैरा दो
देश की व्यवस्थाएं
राम और लक्ष्मण जैसी,
भ्रष्टाचार के नागपाश में बंधी है,
हे बजरंगबली! अपने अन्ना जैसे,
गरुड़ मित्र को बुलवा कर,
नागपाश कटवा दो
गरीबी और भुखमरी के ,
ब्रह्मास्त्र की मार ने,
आम आदमी को,
लक्ष्मण  जैसा मूर्छित कर रखा है,
हे पवन पुत्र!
स्वीजरलेंड में जमा,संजीवनी बूंटी लाओ ,
और सबको पुनर्जीवन दिलवा  दो
सत्तारूढ़ दशानन का अहंकार,
दिन ब दिन बढ़ता  ही जा रहा है,
हे अन्जनिनंदन!
अब समय आ गया है,
रावन का दहन करा दो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, September 22, 2011

आदमी को लचीला रहना चाहिए

आदमी को लचीला रहना चाहिए
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मैंने देखा,तूफानों में,
कुछ वृक्ष जो झुक जाते है
,बने रहते है
और कुछ तने,जो तने रहते है
जड़ से उखड जाते है
आदमी को परिस्तिथियों के,
हिसाब से चलना चाहिये
सख्त नहीं,लचीला रहना चाहिये
अब भगवान् को ही देखलो
परिस्तिथियों के अनुसार ,
कितने रूपों में अवतार लिये
जब प्रलय आया,और सृष्टि को,
बीज रूप से बचाना था,
मछली बन गये
मंदराचल का भार उठाना था
कछुआ बन गये
पृथ्वी को पानी से बाहर निकलना था,
वराह बन गये
उन्होंने बड़े बड़े काम ,छोटे बन कर,
कैसे किये जा सकते है,सिखलाया है
छोटे से वामन का अवतार लेकर,
तीन कदमो में,
तीन लोकों को,नाप कर बतलाया है
और अर्जुन के सारथी बन कर,
अपना विराट स्वरूप भी दिखलाया है
राम बन कर राजा के यहाँ जन्मे
और बारह वर्षों तक भटकते रहे वन में
और कृष्ण बने तो बचपन में ग्वालों के साथ,
चराई थी गायें
और बड़े होकर ,द्वारकाधीश भी कहलाये
 जरासंध को सत्रह बार युद्ध में हराये
और परिस्तिथियों के हिसाब से ,
अठारवीं बार,युद्ध का मैदान छोड़ भागे,
और रणछोड़ कहलाये
हिरनकश्यप जैसी बुराइयों को मारने के लिये,
क्या क्या नहीं किया
आधे नर और आधे सिंह  याने,
नरसिंह रूप में अवतार लिया
ये सब कथाएं,
हमें ये ही सिखाती है
आदमी को परिस्तिथियों के अनुसार चलना चाहिये,
जरूरत के मुताबिक़ ढलना चाहिये
सफलता पानी हो,तो लचीला रहना चाहिये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

जब मोबाईल ना होता था

जब मोबाईल ना होता था
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वो दिन भी क्या दिन होते थे,जब माबाइल ना होता था
एक काला सा चोगा अक्सर,हर घर की शोभा  होता था
टिन टिन टिन घंटी के स्वर से,घर भर में आती थी रौनक
खुद का एक  फोन   होने से    ,ऊंचा होता था   स्टेटस
दस छेदों वाले डायल को,घुमा घुमा नाख़ून घिसते थे
जोर जोर से हल्लो हल्लो,चिल्ला कर भी ना थकते थे
फोन हमारा,मगर पडोसी,लाभ उठाते उसका जी भर
 अपने परिचितों को देते,फोन हमारे वाला नंबर
उनका फोन आता तो घर के ,बच्चे जाते,उन्हें बुलाते
वो आते,बातें भी करते,चायपान भी करके  जाते
हसीं पड़ोसन,मुस्काती सी,कभी फोन करने आती थी
और लिपस्टिक ,लगे होठ के,सुन्दर निशां,छोड़ जाती थी
डाकघरों में,दूरभाष को,लम्बी सी लाइन लगती थी
ओर्डीनरी,अर्जेंट,लाईटनिंग,कालों की घंटी बजती थी
तीन मिनिट का काल रेट था,बातें ना लम्बी खिंचती थी
फोन डेड होता तो घर में,ख़ामोशी सी आ बसती  थी
लाइनमेन नाम प्राणी को, देना कुछ चंदा होता था
तो जो फोन डेड होता था, जल्दी से ज़िंदा होता  था
रात ,काल के ,रेट आधे थे,इसीलिए वो कम सोता था
वो दिन भी क्या दिन होते थे, जब मोबाईल ना  होता था

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, September 21, 2011

बीबी को खुश रख्खो

बीबी को खुश रख्खो
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जीवन में सुखी रहना है,
तो बीबी को खुश रख्खो
और जीवन का अमृत चख्खो
अगर वो थोड़ी काली है,
तो भी उसके रूप की तारीफ़ करते रहो
उसे चाँद का टुकड़ा कहो
पत्नी के प्यार पाने का ये सबसे अच्छा तरीका है
उसे क्या पता कि तुम उसे चाँद के ,
उस भाग का टुकड़ा कह रहे हो,
जहां काला धब्बा है
अगर वो खाना बनाती है
और रोटियां जल जाती है
तुम उससे बोलो कि देखो,
तुम्हारा रूप देख कर के,
रोटियां भी जल भुन जाती है
और यदि वो बहुत ज्यादा बक बक करती हो
तो कहो कि तुम्हारे प्यारे प्यारे होंठ,
जब पास पास रहते है तो,
तुम कितनी प्यारी लगती हो
भले छरहरी काय वाली महिलाओं को देख,
आपका मन फिसलता है
और आपकी पत्नी थोड़ी मोटी है
तो कहो भरा भरा मांसल बदन ,
कितना प्यारा लगता है
तुम कितनी सुढोल हो,कितनी सुहाती हो
भले ही सुढोल से आपका मतलब ,
'सु'याने कि अच्छा 'ढोल'
और सुहाती से,
'सु' याने कि अच्छा 'हाथी' हो
अपने मन कि भावनाएं भी खोलो
पर कुछ एसा मीठा  मीठा बोलो
कि विवाहित जीवन में अमृत घोलो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, September 20, 2011

हम जो भी है,जैसे भी है,तुमसे कई गुना अच्छे है

हम जो भी है,जैसे भी है,तुमसे कई गुना अच्छे है
क्योंकि मन में मैल नहीं है,और हमारे दिल सच्चे है

ना नेता से झूठें वादे

ना ही कलुषित कोई इरादे
नहीं किसी से लेना देना,
हम है बन्दे,सीधे सादे
नहीं बरगलाते है कोई को,नहीं दिए कोई गच्चे है
हम जो भी है,जैसे भी है,तुमसे कई गुना अच्छे है
कितनी भले मुसीबत आये
हम ना रोये,हम मुस्काये
कितने अपनों ने दिल तोडा,
कितने अपने हुए पराये
हम ने माफ़ कर दिया,सोचा,नादां है,छोटे बच्चे है
हम जो भी है ,जैसे भी है,तुमसे कई गुना अच्छे है
जो मन कहता,वो करते है
ऊपरवाले से  डरते  है
ना जाने शतरंजी चालें,
सीधे रस्ते पर चलते है
हाँ ये सच है,कि इस युग की,दुनियादारी में कच्चे है
हम जो भी है,जैसे भी है,तुमसे कई गुना अच्छे है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Monday, September 19, 2011

आठों प्रहर तुम्ही छायी हो

आठों प्रहर तुम्ही छायी हो
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मेरे मन के नीलाम्बर में,तुम आती हो,छा जाती हो
धवल धवल से बादल जैसी,स्मृति पटल पर मंडराती हो
भोर अरुण की आभा से  जब,रूप चमकता प्यारा,स्वर्णिम
मन्त्र मुग्ध सा तुम्हे देखता,हो जाता आनंद विभोर मन
दोपहरी की प्रखर किरण से,जगमग प्रखर रूप की आभा
सांध्य रश्मियाँ तुम्हे सजाती,जैसे सोने संग सुहागा
जैसे जैसे जब दिन ढलता,तुम तारों संग  रास  रचाती
खिलता रूप चाँद सा प्यारा,रजनीगंधा सी महकाती
कभी लता सी लिपटी मन से,कभी फूल सी मुस्काई हो
मेरे मन में,इस जीवन में,आठों प्रहर  तुम्ही छायी हो

मदन मोहन बाहेती'घोटू'