Friday, March 2, 2012

ससुराल-मिठाई की दूकान

ससुराल-मिठाई की दूकान
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सालियाँ,नमकीन सुन्दर,और साला  चरपरा
टेड़ी सलहज जलेबी सी,मगर उसमे  रसभरा
सास रसगुल्ला रसीली,कभी चमचम रसभरी
काजू कतली उनकी बेटी,मेरी बीबी  छरहरी
और लड्डू से लुढ़कते, ससुर  मोतीचूर  हैं
हर एक बूंदी रसभरी है,प्यार से भरपूर  है
गुंझिया सा गुथा यह परिवार रस की खान है
ये मेरा ससुराल  या मिठाई  की दूकान  है
(होली की शुभकामनाये)
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, March 1, 2012

चिंतन

    चिंतन
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                1
मैल जब मन का धुलेगा,तभी मन का मेल होगा
खुलेंगे संकोच बंधन, तभी खुल कर  खेल होगा
जिंदगी की परीक्षा है, सभी को देनी पड़ेगी,
कभी कोई पास होगा,कभी कोई  फ़ैल होगा
                   २
कदम कितने ही रखोगे, देख कर या भाल कर
नाचना सबको पडेगा ,वक़्त की हर ताल पर
छूट पल में जाएगा जग,आएगा  जब बुलावा,
व्यर्थ क्यों होते परेशां, यूं ही चिंता  पाल कर
                      ३
जरा सी चिंदी मिली,चूहा नशे में चूर  है
खोल कर दूकान कपडे की बड़ा मगरूर है
जरा सी उपलब्धियों पर,इसे इठलाओ नहीं,
बहुत बढ़ना है तुम्हे और अभी दिल्ली दूर है

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

चुनाव के बाद

चुनाव   के बाद
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         १
मिनिस्टर थे,हार कर के इलेक्शन  ऐसा  लगा
गये वो दिन ,जब कि मियां मारते थे  फ़ाकता
अब समझ में आ रहा है,जिंदगी का फलसफा,
सेज फूलों की गयी और चुभे कांटे ,खामखाँ
            २
गोपियाँ थी,मस्तियाँ थी,और थे संग ग्वाल बाल
खूब मचता था बिराज में,कृष्ण का  होली धमाल
द्वारका के धीश जब से बन गये है  कृष्ण जी,
औपचारिता निभाने को लगा  लेते बस  गुलाल

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, February 29, 2012

अबीर गुलाल
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तेरा अबीर ,तेरी गुलाल,
सब लाल लाल, सब लाल लाल
उस मदमाती सी होली में
जब ले गुलाल की झोली मै
       आया तुम्हारा मुंह रंगने
तुम सकुचाई सी बैठी थी
कुछ शरमाई  सी बैठी थी
      मन में भीगे भीगे सपने
मैंने बस हाथ बढाया था
तुमको छू भी ना पाया था
      लज्जा के रंग  में डूब गये,
      हो गये लाल,रस भरे गाल
तेरा अबीर ,तेरी गुलाल
सब लाल लाल,सब लाल लाल
मेंहदी का रंग हरा लेकिन,
जब छूती है तुम्हारा  तन,
       तो लाल रंग आ जाता है
इन काली काली आँखों में,
प्यारी कजरारी आँखों में,
      रंगीन जाल छा जाता  है
चूनर में लाली लहक रही,
होठों पर लाली दहक  रही
     हैं खिले कमल से कोमल ये,
      रखना  संभाल,पग  देख भाल
तेरा अबीर,  तेरी गुलाल
सब लाल लाल,सब लाल

मदन मोहन बाहेती'घोटू'




Tuesday, February 28, 2012

सपन तू मत देख रे मन

सपन तू मत देख रे  मन
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सपन तू मत देख रे मन, अगर टूटे ,पीर होगी
तुझे बस वो ही मिलेगा, जो तेरी तकदीर  होगी
नींद में कर बंद आँखें,ख्वाब कितने ही सजा  ले
कल्पनाओं के महल में,हो ख़ुशी,जी भर ,मज़ा ले
पर खुलेगी आँख,होगा ,हकीकत से सामना  जब
आस के विपरीत ही ,अक्सर मिलेगा,हर जना तब
चुभेगी तेरे ह्रदय को,बात हर शमशीर  होगी
सपन तू मत  देख रे मन,अगर टूटे ,पीर   होगी
ना किसी से मोह रख  तू,ना किसी की चाह रखनी
आस तू मत कर किसी से,आस तो है  महा ठगिनी
अपेक्षा जब टूटती है,  तोड़ देती  है ह्रदय को
चक्र ये सब भाग्य का  है,कौन रोकेगा समय को
यूं न मिलने आये कोई,मरोगे तो भीड़  होगी
सपन तू मत देख रे मन,अगर टूटे,पीर होगी
सर्दियों की धूप मनहर,ग्रीष्म  में बदले  तपन में
नहीं दुःख में,ख़ुशी में भी,अश्रु बहते है नयन में
नहीं चिर सुख,नहीं चिर दुःख,जिंदगी के इस सफ़र में
फूल है तो कई कांटे ,भी भरे है ,इस डगर में
रात है ,तो कल सुबह भी,अँधेरे  को चीर होगी
सपन तू मत देख रे मन,अगर टूटे,पीर होगी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, February 25, 2012

ऋतू परिवर्तन

ऋतू परिवर्तन
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अब गया है बदल मौसम
तपन आई,गयी ठिठुरन
हुआ सत्ता परिवर्तन
कहीं खुशिया तो कहीं गम
जो नरम और गुदगुदी थी
प्यार ,उष्मा से लदी थी
कई रातें ,तन चड़ी जो
उपेक्षित सी ,अब पड़ी वो
हुई तनहा सी रजाई
ग्रीष्म की अब ऋतू आई
गर्म शालें और स्वेटर
गर्व से थे सजे तन पर
अब दुबक,सिमटे पड़े है
दुखी से लगते  बड़े है
देख कर के बदन सुन्दर
गर्म थे जो कभी गीजर
अब न विद्युत् तरंगे  है
स्नान घर में बस टंगे है
तेल नरियल का सुगन्धित
हुआ एसा शीत शापित
श्वेत हिम सा था गया जम
पर गया जब बदल मौसम
अब पिघलने लग गया है
पा पुनर्जीवन  गया है
और छत पर मौन लटके
हुए थे निर्जीव पंखे
पंख फैले,उड़ न  पाते
मगर अब है फरफराते
नाचते है संग हवा के
नया जीवन,पुनः पाके
रूपसियों का सुहाना
रूप का सुन्दर खजाना
हो कहीं गायब गया था
वसन से सब ढक गया था
ग्रीष्म ऋतु ने मगर आकर
कर दिया है सब उजागर
जल बहुत था दुखी ,बेकल
ठिठुरते थे,हाथ छूकर
आजकल इठला रहा है
सभी के मन भा रहा है
स्वेद बन गौरी बदन पर
बह रहा है,बड़ा  चंचल
कहीं खुशियाँ है कही गम
अब गया है बदल मौसम

मदन मोहन बहेती'घोटू'

संतरा

            संतरा
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धरा सा आकार सुन्दर,अरुण सी आभा सुशोभित
वेद का,उपनिषद का सब,ज्ञान फांकों सा सुसज्जित
और फांकों में समाये, वेद सब ,सारी ऋचायें
ज्ञान कण कण में,वचन से ,प्यास जीवन की बुझाये
फांक का हर एक दाना, मधुर जीवन रस भरा  है
संत के सब गुण  समाहित,इसलिए ये संतरा  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'