नारी दिवस और होली
आज नारी दिवस भी है,
होलिका त्योंहार भी है
पर्व कल था जो दहन का
आस्थाओं के दमन का
कुटिलता के नाश का दिन
भक्ति के विश्वास का दिन
शक्ति के उस परिक्षण में
जीत भी है ,हार भी है
आज नारी दिवस भी है,
होलिका त्योंहार भी है
आग भी है, फाग भी है
जलन है अनुराग भी है
दाह भी है, डाह भी है
चाह भी है, आह भी है
अजब है संयोग देखो,
प्यार है,प्रतिकार भी है
आज नारी दिवस भी है,
होलिका त्योंहार भी है
आज उत्सव है मदन का
पर्व है ये मधु मिलन का
प्रीत का,मनमीत का दिन
मचलते संगीत का दिन
आज रंगों में बरसता,
प्यार है,मनुहार भी है
आज नारी दिवस भी है,
होलिका त्योंहार भी है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Wednesday, March 7, 2012
चुनाव का चक्कर-जनता का उत्तर
चुनाव का चक्कर-जनता का उत्तर
१
पांच साल से हो रहा,था 'हाथी' मदमस्त
दो पहियों की 'सायकिल',उसे कर गयी पस्त
उसे कर गयी पस्त,'कमल' भी है कुम्हलाया
गाँव गाँव में हिला 'हाथ',पर काम न आया
कह घोटू कवि,अब सत्ता हो गयी 'मुलायम'
ख़तम हो गया,'माया' की माया का सब भ्रम
२
बहुजन हो या सर्वजन,कुछ भी दे दो नाम
चाल समझती है सभी,मूरख नहीं अवाम
मूरख नहीं अवाम,परख है बुरे भले की
सारा भ्रष्टाचार, बन गया फांस गले की
सत्ता के मद में माया इतनी पगलायी
खुद के पुतले बना,बन गयी पुतली बाई
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Tuesday, March 6, 2012
राज-पत्नी के 'ना'ना'कहने का
राज-पत्नी के 'ना'ना'कहने का
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मैंने पत्नीजी से पूछा,एक बात मुझको बतलाना
मै तुमसे जब भी कुछ कहता,तुम बस कहती हो 'ना'ना'ना
और फिर 'ना'ना' कहते कहते,बातें सभी मान लेती हो
मेरी हर एक चाह,मांग में,तुम सहयोग पूर्ण देती हो
अक्सर लोग कहा करते है,सबके संग एसा होता है
औरत जब भी' ना 'करती है,उसका मतलब'हाँ'होता है
पत्नीजी बोली यूं हंस कर,तुम कितने भोले हो सजना
मुझको भी अच्छा लगता है,तुम्हे रिझाना,और संवरना
तुम्हे सताना,तुम्हे मनाना,और तुम्हारे खातिर सजना
मुझे सुहाता,मन को भाता,संग तुम्हारे,सोना,जगना
अच्छा खाना,पका खिलाना,लटके,झटके ,सब दिखलाना
मीठी मीठी बात बनाना,और दीवाना,तुम्हे बनाना
मेरी चाहत की सब चीजे,अच्छा खाना और पहनना
गाना और बतियाना,या फिर सोने का सुन्दर सा गहना
इन सब में भी तो होती 'ना',इसीलिए मै कहती 'ना'ना'
समझदार को सिर्फ इशारा ही काफी है,समझ गये ना
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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मैंने पत्नीजी से पूछा,एक बात मुझको बतलाना
मै तुमसे जब भी कुछ कहता,तुम बस कहती हो 'ना'ना'ना
और फिर 'ना'ना' कहते कहते,बातें सभी मान लेती हो
मेरी हर एक चाह,मांग में,तुम सहयोग पूर्ण देती हो
अक्सर लोग कहा करते है,सबके संग एसा होता है
औरत जब भी' ना 'करती है,उसका मतलब'हाँ'होता है
पत्नीजी बोली यूं हंस कर,तुम कितने भोले हो सजना
मुझको भी अच्छा लगता है,तुम्हे रिझाना,और संवरना
तुम्हे सताना,तुम्हे मनाना,और तुम्हारे खातिर सजना
मुझे सुहाता,मन को भाता,संग तुम्हारे,सोना,जगना
अच्छा खाना,पका खिलाना,लटके,झटके ,सब दिखलाना
मीठी मीठी बात बनाना,और दीवाना,तुम्हे बनाना
मेरी चाहत की सब चीजे,अच्छा खाना और पहनना
गाना और बतियाना,या फिर सोने का सुन्दर सा गहना
इन सब में भी तो होती 'ना',इसीलिए मै कहती 'ना'ना'
समझदार को सिर्फ इशारा ही काफी है,समझ गये ना
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Monday, March 5, 2012
परिवर्तन
जब जब मौसम बदला करता,सब में परिवर्तन आता है
लोग वही है,वो ही रिश्ते ,पर व्यवहार बदल जाता है
हवा वही है,सर्दी में जो,ठिठुराती थी सारे तन को
वो ही गर्मी में लू बन कर,जला रही सम्पूर्ण बदन को
वो ही धूप,भली लगती थी,जो सर्दी में बहुत सुहाती
गर्मी में वो ही चुभती है,जब अंग लगती,बदन जलाती
पानी वही जिसे छूने से,सर्दी में होती थी ठिठुरन
अब गर्मी में,उस पानी में,भीग तैरने को करता मन
अधिक ताप में भाप,बरफ बन जमता,होती अधिक शीत है
सूरत,सीरत,नाम बदलती,इस मौसम की यही रीत है
लोग वही पर पैसा पाकर,उनका नाम बदल जाता है
पहले था 'परस्या'फिर 'परसु','परसराम' फिर कहलाता है
होते है माँ बाप वही जो,बचपन में थे सबसे अच्छे
उन्हें बुढ़ापा जब आ जाता,तो ठुकरा देते है बच्चे
ऑंखें वही,अगर दुःख होता,जार जार आंसू ढलकाती
मगर ख़ुशी जब अतिशय होती,तो भी पानी से भर जाती
इसमें दोष नहीं कोई का,परिवर्तन नियम जीवन का
है ऋतू चक्र ,बदलता रहता,है अक्सर मिजाज़ मौसम का
चेहरा वही,कभी मुस्काता,तो अवसाद कभी छाता है
जब जब मौसम बदला करता ,सब में परिवर्तन आता है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
मूली के परांठे
मूली के परांठे
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फ़रवरी का ये महिना,फाग का मदमस्त मौसम
करवटें मौसम बदलता,सर्दियाँ ना हो रही कम
रात जागे देर तक थे,मुश्किलों से नींद आई
दुबक हम तुम सो रहे है,ओढ़ कर दुहरी रजाई
रात मूली के परांठे, खा लिए थे चार तुमने
बहुत हलचल मचाएगी,वायु तुम्हारे उदर में
यूं ही खर्राटे बहुत है,और मुश्किल लादना मत
मुंह ढके हम सो रहे है, रजाई में पादना मत
(बुरा ना मानो होली है)
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
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फ़रवरी का ये महिना,फाग का मदमस्त मौसम
करवटें मौसम बदलता,सर्दियाँ ना हो रही कम
रात जागे देर तक थे,मुश्किलों से नींद आई
दुबक हम तुम सो रहे है,ओढ़ कर दुहरी रजाई
रात मूली के परांठे, खा लिए थे चार तुमने
बहुत हलचल मचाएगी,वायु तुम्हारे उदर में
यूं ही खर्राटे बहुत है,और मुश्किल लादना मत
मुंह ढके हम सो रहे है, रजाई में पादना मत
(बुरा ना मानो होली है)
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
Sunday, March 4, 2012
होली,तपभंग और पाउडर
होली,तपभंग और पाउडर
१
तप से विश्वामित्र से,हुए इंद्र जब तंग
उनने भेजी मेनका,करने को तप भंग
करने को तपभंग,रूप का जाल बिछाया
था ऋतुराज बसंत,पर्व होली का आया
कह घोटू कवि चली मेनका भर पिचकारी
विश्वामित्र मुनिजी की सूरत रंग डाली
२
ज्ञानी विश्वामित्र पर,बरसी रंग फुहार
उनको गुस्सा आ गया,देखा जब निज हाल
देखा जब निज हाल,उठे वो जल्दी जल्दी
ले धूनी से राख,मेनका मुख पर मल दी
पा नारी स्पर्श गये तप भूल मुनिवर
खेली होली खूब मेनका के संग जी भर
३
उस दिन होली खेल कर,मन में भरे हुलास
ख़ुशी ख़ुशी जब मेनका,पहुंची दर्पण पास
पहुंची दर्पण पास,रूप जब अपना देखा
उजला उजला लगा रंग अपने चेहरे का
ले धूनी से राख, रोज़ वो मुंह उजलाती
शुरू पाउडर का प्रचलन है तबसे साथी
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
१
तप से विश्वामित्र से,हुए इंद्र जब तंग
उनने भेजी मेनका,करने को तप भंग
करने को तपभंग,रूप का जाल बिछाया
था ऋतुराज बसंत,पर्व होली का आया
कह घोटू कवि चली मेनका भर पिचकारी
विश्वामित्र मुनिजी की सूरत रंग डाली
२
ज्ञानी विश्वामित्र पर,बरसी रंग फुहार
उनको गुस्सा आ गया,देखा जब निज हाल
देखा जब निज हाल,उठे वो जल्दी जल्दी
ले धूनी से राख,मेनका मुख पर मल दी
पा नारी स्पर्श गये तप भूल मुनिवर
खेली होली खूब मेनका के संग जी भर
३
उस दिन होली खेल कर,मन में भरे हुलास
ख़ुशी ख़ुशी जब मेनका,पहुंची दर्पण पास
पहुंची दर्पण पास,रूप जब अपना देखा
उजला उजला लगा रंग अपने चेहरे का
ले धूनी से राख, रोज़ वो मुंह उजलाती
शुरू पाउडर का प्रचलन है तबसे साथी
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
अबकी होली
अबकी होली
कई रंग से खेली होली
और उमंग से खेली होली
याद रहेगी वो होली जब,
तीन ढंग से खेली होली
सुबह उठा बीबीजी बोली,सुनो दर्द है मेरे सर में
वैसे आज तुम्हे छुट्टी है,दिन भर रहना ही है घर में
देखो मुझको नींद आ रही,सुबह हो गयी तो होने दो
प्लीज बुरा तुम नहीं मानना,थोड़ी देर और सोने दो
सच डीयर कितने प्यारे हो,अच्छा सोने दो ना जाओ
सच्चा प्यार तभी जानू जब ब्रेकफास्ट तुम बना खिलाओ
कह उनने तो करवट बदली,नींद हमारी टूट चुकी थी
काफी दिन भी चढ़ आया था,बड़ी जोर की भूख लगी थी
फिर उनकी प्यारी बातों ने,जोश दिया था कुछ एसा भर
हम भी कुछ कर दिखला ही दें,सोच घुसे चौके के अन्दर
कौन जगह क्या चीज रखी है,इसकी हम को खबर नहीं थी
उचका पैर ढूंढते चीनी,आसपास कुछ नज़र नहीं थी
रखा एक डिब्बा गलती से,गिरी मसालेदानी हम पर
पहली होली उसने खेली,कई रंगों से दिया हमें भर
लाल रंग की पीसी मिर्च थी,और हरे रंग का था धनिया
पीला रंग डाला हल्दी ने, बना अजीब हमारा हुलिया
काला काला गरम मसाला,राई,जीरा अजब रंग थे
हर रंग की अपनी खुशबू थी,मगर मिर्च से हुए तंग थे
छींक छींक हालत खराब थी ,आँखों में थी मिर्च घुल गयी
दुःख तो ये है,छींके सुन कर ,बीबीजी की नींद खुल गयी
उठ आई तो देखा हमको,शक्लो सूरत रंग भरी थी
मै गुस्से में था लेकिन वो मारे हंसी हुई दोहरी थी
देख हमारी हालत उनको,प्यार या दया ऐसी आयी
हमें दूसरी होली उनने,अपने रंगों से खिलवायी
काली काली सी जुल्फें थी,रंग गुलाबी सा चेहरा था
हरा भरा था उनका आँचल ,लाल होंठ का रंग गहरा था
पहली होली भूल गए हम,रंग दूसरी का जब आया
लेकिन इसी समय दरवाजा,आकर यारों ने खटकाया
और तीसरी होली हमने खेली मित्रों की टोली से
बड़ी देर तक धूम मचाई,रंग गुलाल भरी झोली से
पहली थी कुछ तीखी होली
दूजी प्यारी पिय की होली
और तीसरी नीकी होली
सच अबके ही सीखी होली
तीन ढंग से खेली होली
और उमंग से खेली होली
याद रहेगी वो होली जब,
तीन ढंग से खेली होली
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
कई रंग से खेली होली
और उमंग से खेली होली
याद रहेगी वो होली जब,
तीन ढंग से खेली होली
सुबह उठा बीबीजी बोली,सुनो दर्द है मेरे सर में
वैसे आज तुम्हे छुट्टी है,दिन भर रहना ही है घर में
देखो मुझको नींद आ रही,सुबह हो गयी तो होने दो
प्लीज बुरा तुम नहीं मानना,थोड़ी देर और सोने दो
सच डीयर कितने प्यारे हो,अच्छा सोने दो ना जाओ
सच्चा प्यार तभी जानू जब ब्रेकफास्ट तुम बना खिलाओ
कह उनने तो करवट बदली,नींद हमारी टूट चुकी थी
काफी दिन भी चढ़ आया था,बड़ी जोर की भूख लगी थी
फिर उनकी प्यारी बातों ने,जोश दिया था कुछ एसा भर
हम भी कुछ कर दिखला ही दें,सोच घुसे चौके के अन्दर
कौन जगह क्या चीज रखी है,इसकी हम को खबर नहीं थी
उचका पैर ढूंढते चीनी,आसपास कुछ नज़र नहीं थी
रखा एक डिब्बा गलती से,गिरी मसालेदानी हम पर
पहली होली उसने खेली,कई रंगों से दिया हमें भर
लाल रंग की पीसी मिर्च थी,और हरे रंग का था धनिया
पीला रंग डाला हल्दी ने, बना अजीब हमारा हुलिया
काला काला गरम मसाला,राई,जीरा अजब रंग थे
हर रंग की अपनी खुशबू थी,मगर मिर्च से हुए तंग थे
छींक छींक हालत खराब थी ,आँखों में थी मिर्च घुल गयी
दुःख तो ये है,छींके सुन कर ,बीबीजी की नींद खुल गयी
उठ आई तो देखा हमको,शक्लो सूरत रंग भरी थी
मै गुस्से में था लेकिन वो मारे हंसी हुई दोहरी थी
देख हमारी हालत उनको,प्यार या दया ऐसी आयी
हमें दूसरी होली उनने,अपने रंगों से खिलवायी
काली काली सी जुल्फें थी,रंग गुलाबी सा चेहरा था
हरा भरा था उनका आँचल ,लाल होंठ का रंग गहरा था
पहली होली भूल गए हम,रंग दूसरी का जब आया
लेकिन इसी समय दरवाजा,आकर यारों ने खटकाया
और तीसरी होली हमने खेली मित्रों की टोली से
बड़ी देर तक धूम मचाई,रंग गुलाल भरी झोली से
पहली थी कुछ तीखी होली
दूजी प्यारी पिय की होली
और तीसरी नीकी होली
सच अबके ही सीखी होली
तीन ढंग से खेली होली
और उमंग से खेली होली
याद रहेगी वो होली जब,
तीन ढंग से खेली होली
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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