Tuesday, June 26, 2012

ये मेरी कवितायेँ

     ये मेरी कवितायेँ

जो मेरे अंतर को ,हिला हिला देती है

कभी मार देती है,कभी जिला  देती है
कभी रुलाती मुझको और कभी सहलाती
जब मेरी पीडायें,कवितायेँ  बन जाती
मेरे लब मौन और शांत रहा  करते है
आँखों से आंसूं ना,शब्द बहा  करते है
लेखनी दर्दों को,पहनाती जामा  है
सिर्फ चंद लफ्जों में, पीर सब समाना है
उधड़ते रिश्तों को,भावों के धागे से
सुई ले तुरपतें है, पीछे या  आगे से
पत्थर से उर पर है,जमी  काई सी फिसलन
फिसल फिसल कर यादें,कवितायेँ जाती बन
कविता की हर पंक्ति ,कतरन है यादों की
कुछ टूटे सपनो की,कुछ झूंठे   वादों की
जोड़ इसी  कतरन को,बन जाता कम्बल है
एकाकी जीवन का, ये ही तो संबल है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

 

इतना ही काफी है

   इतना ही काफी है 

बच्चे ,अब बढे हो गये है

अपने पैरों पर खड़े हो गये है
ख़ुशी है ,कुछ बन गये है
गर्व से पर तन गये है
 कभी कभी जब मिलते
लोकलाज या  दिल से
चरण छुवा  करते  है
कमर झुका   लेते है
ये भी क्या कुछ कम है
खुश हो जाते हम है
नम्रता  कुछ  बाकी है
इतना ही काफी है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


नाम पर मत जाओ

       नाम पर मत जाओ

सूर है सूरज में,सूर याने चक्षु हीन,

     सबको पथ दिखलाता,जग मग कर के  जगती
सूरज में रज भी है,रज याने धूलि कण,
    जा न सके सूरज तक, बहुत दूर   है धरती
  इसीलिये कहता हूँ,नाम पर मत जाओ,
        डंक बड़ा चुभता है,पर बजता है डंका
नाम भ्रमित करते है,माला के दाने का,
      वजन एक माशा है,पर कहलाता  मनका


मदन मोहन बाहेती'घोटू'    

Monday, June 25, 2012

बूढ़े माँ बाप और बच्चे

   बूढ़े माँ बाप और बच्चे

धरा पर भगवान प्रकटे,कृष्ण के अवतार में

भुलाया माँ बाप का सब प्यार आ  संसार में
यशोदा मैया और बाबा नन्द का दिल तोड़ कर
भुला सब कुछ,गये मथुरा,कृष्ण गोकुल छोड़ कर
राज के और रानियों के,चक्करों में  यूं  फसे
छोड़ कर ,माँ बाप बूढ़े, द्वारिका में  जा बसे
अपने पालक,जन्मदाता ,को भुला एसा  दिया
पलट कर मथुरा न आये,रुख न गोकुल का किया
जब किया भगवान ने, ये चलन है  संसार  का
मोल किसने चुकाया,माँ बाप के उपकार का
खटकने लगते है वो ,आँखों में बन कर किरकिरी
बच्चों को मिल जाती है जब,बीबी,अच्छी नौकरी
छोड़ते माँ बाप बूढों को तडफने   वास्ते
भूल सबको, जीतें है वो सिर्फ अपने  वास्ते

मदन मोहन बाहेती'घोटू'   

परेशानी-गर्मी की

       परेशानी-गर्मी की

गर्मियों में इस कदर ,मुश्किल है जीना हो गया

हवायें लू बन गयी, पानी पसीना   हो गया
और डर ने पसीने के,हाल है  एसा  किया
पास भी अब पटखने में,बिदकती है बीबियाँ
बड़ी मनमौजी हुई है, आती जाती  रात दिन
अंखमिचौली खेलती ,बिजली सताती रात दिन
आजकल उतनी हंसीं ,लगती नहीं है  हसीना
चेहरे का मेकअप  बिगाड़े,गाल पर बह पसीना
कम से कम कपडे बदन पर,जिस्म खुल दिखने  लगे
उनको भी ये सुहाता है,हमको भी अच्छा   लगे
गरमियों के दरमियाँ बस फलों का आराम है
लीचियां है,जामुने है,चूंसने  को आम है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

संगत का असर

        संगत का असर

सुबह की शीतल हवा,

सूरज का  साथ   पा,
               लू बन, सताती है
संगत के असर से,
आदमी की फितरत भी,
               कितनी बदल जाती है
अलग अलग बादल की,
अलग अलग बूँदें भी,
               मिल कर धरती पर से
साथ साथ रहती है,
नदिया बन बहती है,
               मिलने  समंदर   से
 खेल है किस्मत का,
मगर असर संगत का,
               बड़े रंग दिखता   है
शादी हो जाने पर,
आदमी के जीवन का,
               रुख ही बदल जाता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'   

Saturday, June 23, 2012

भगवान तू बनिया है

  भगवान तू  बनिया है

इस धरा पर इतने

अवतार लिए  तूने
बनिये के घर अभी तक,
अवतार ना लिया है
भगवान तू बनिया है
जब काम से थके तो
घर पर ना रह सके तो
ये आजकल का फेशन
जाते है हिलस्टेशन
कर पार लम्बी दूरी
शिमला कभी मसूरी
तो ठीक इस तरह से
तंग आके गृह कलह से
ऊबा जो उधारी से
तकड़ी से ,तगारी से
तो हार करके आया
अवतार धर के आया
सच कहा है किसीने
औरों की थालियों में
दिखता अधिक ही घी है
ये बात भी सही है
बनिया तो रह चुका था
उस काम से थका था
बनिया नहीं बना तू
छोड़ी बही,तराजू
और धनुष बाण धारा
या फरसा फिर संभाला
क्षत्रिय बना, ब्रह्मण
बलराम और वामन
था मच्छ कच्छ जलचर
बन कर वाराह थलचर
नरसिंह भी बना पर
तू बन न पाया नभचर
डरता है उल्लूओं से
पत्नी के वाहनों से
कितने ही रूप धारे
पर बनिया  ना बना रे
बदला है रूप केवल,
बनने से होता क्या है
भगवान तू  बनिया है
सच  कह् दूं इस बहाने
जो तू बुरा न माने
चोला भले था झूंठा
बनिया पना ना छूटा
मछली से तेज चंचल
बनिये का गुण ये अव्वल
कछुवे सी पीठ करले
बनिया पहाड़ धरले
थोडा भी ना हिले वो
पर  रत्न जब मिले तो
एक बात तो बता तू
वाराह क्यों बना  बना तू
भू पर न कर लगाया
दांतों से क्यों उठाया
ये ही दिखने केवल
दांतों में है कितना बल
जो चाहे वो चबाले
बनिये सा सब पचा ले
वामन बना तू छोटा
बनिये सरीखा खोटा
क्या कहूं में छली को
ठग ही लिया बली को
छोटा सा पग बढाया
धरती को नाप आया
बनिया उधार  कर दे
दस के हज़ार कर दे
जो धन मिले तो नर है
साक्षात् ईश्वर है
पैसा जो कम जरा रे
तू सिंह सा दहाड़े
नरसिंह स्वरुप है तू
बनिये का रूप है तू
तू कृष्ण बना राजा
तू राम बना राजा
सोने के मृग पे दौड़ा
बनिया पना न छोड़ा
पूँजी पति है बनिये
लक्ष्मी पति है बनिये
ये बात भी सही है
तू लक्ष्मी पति है
मतलब की तू है बनिया
मै झूंठ कह रहा क्या
हर रूप तेरा भगवन,
बनिये के गुण लिया है
भगवान तू बनिया  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'