Thursday, September 13, 2012

मुहावरों में माहिर-नेताजी की तक़रीर

 मुहावरों में माहिर-नेताजी की तक़रीर

 दोस्तों,जो भौंकते  है,वो नहीं है काटते,
                               हम है  वो जो भोंकते भी, और काटे  भी  बहुत
लोग कहते ,गरजते बादल बरसते है नहीं,
                                हम गरजते भी बहुत है,और बरसते  भी बहुत
तेल नौ मन हो न हो पर नचाते है राधिका,
                                कितना भी आँगन हो टेड़ा,हम नचाना जानते
सच है जब चलता है हाथी,तो है कुत्ते भौंकते,
                                हम वो हाथी,भौंकते  कुत्तों जो  चिंघाड़ते
राई का पर्वत बनाना,खेल बांयें हाथ का,
                                  ऊँट ये जीरा न खाता,नोट की ये बोरियां
चोर के घर मोर की बातें सुनी है आपने,
                                   चोर हम वो,मोर के घर जा कर करते चोरियां   
चोर की दाढ़ी में तिनका ,आयेगा कैसे नज़र,
                                   हम तो है वो चोर जो कि दाढ़ी रखते ही नहीं
गलत करके रख दिया है,हमने ये मुहावरा,
                                   नाग जो फुंकारते है ,वो कभी डसते  नहीं
  घुसे काजल कोठरी में,बिना कालिख लगाये,
                                कायले कि दलाली में हाथ ना काले किये
लूट का सब माल हमने ,पास अपने ना रखा ,
                                 सभी पैसे हमने स्विस के बेंक में भिजवा दिये
आधुनिक हैं,नहीं है,हम तो लकीरों के फ़कीर,
                                 इसलिए छोड़ी फकीरी,अमीरी से  हम जिये
आपने तो हमको दी थी,एक बस केवल लकीर,
                                  बहुत सारे जीरो हमने  उसके आगे भर दिये
 कम्पूटर लीजिये,लेपटोप,टी वी लीजिये,
                                  दो रुपय्ये किलो चांवल,फ्री बिजली लीजिये
आपसे बस ये हमारी,इतनी सी दरख्वास्त है,
                                 चाहे कुछ भी लीजिये पर  वोट हमको दीजिये

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

इजहारे इश्क-बुढ़ापे में

इजहारे इश्क-बुढ़ापे में

दिल के कागज़ पर लिखा है,नाम केवल आपका

ध्यान मन में लगा रहता है हरेक पल  आपका
क्या गजब का हुस्न है और क्या  अदाएं आपकी,
घूमता आँखों में रहता, चेहरा चंचल    आपका
हम को दीवाना दिया है कर तुम्हारी चाह ने ,
सोने के साँचें से आया , ये बदन ढल आपका
बन संवर के ,निकलती  हो ,जब  ठुमकती चाल से,
दिल करे दीदार करता रहूँ दिन भर   आपका
श्वेत  केशों पर न जाओ,उम्र में  क्या रखा,
प्यार देखो,दिल जवां है,और पागल  आपका
बात सुन वो हँसे,बोले आप है सठिया गये,
जंच रहा है ,नहीं हमको ,ये प्रपोजल  आपका
फिर भी ये तारीफ़ सुन कर,हमको है अच्छा लगा,
तहे दिल से शुक्रिया है,डियर 'अंकल'  आपका
 
मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, September 12, 2012

परेशानी की वजह

        परेशानी की वजह

तुम परेशां,हम परेशां,हर कोई है परेशां,

                         परेशानी किस वजह है,कभी सोचा आपने
बात है ऐसी कोई जो खटकती मन में सदा,
                         याद करिये किया था क्या कोई लोचा आपने
बहुत सी चिंतायें जो रहती लगी घुन की तरह,
                          गलतियां तो खुद करी,औरों को कोसा  आपने
या की फिर बढ़ने को आगे,जिंदगी की दौड़ में,
                           क्या कभी तोडा था ,कोई  का भरोसा आपने
 हमने उनसे पूछा ये,तो उनने हम से ये कहा,
                           जो भी ,जैसा चल रहा है,चलने दो,खामखाँ,
परेशानी की वजह को ढूँढने की फ़िक्र में,
                           एक परेशानी बढ़ा कर, करें खुद को  परेशां

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

चीपट-घिसे हुए साबुन की

चीपट-घिसे हुए साबुन की

घिसे हुए साबुन की चीपट,

न पकड़ में आती है,न काम में आती है
या तो यूं ही गल जाती है,
या व्यर्थ फेंकी जाती है
मगर उस घिसी हुई चीपट को,
अगर नए साबुन के साथ चिपका दो,
तो आखरी दम तक काम आती है
बुजुर्ग लोग भी,
घिसे हुए साबुन की चीपट की तरह है,
उम्र भर काम आते है
और बुढ़ापे में,चीपट से क्षीण हो जाते है
नयी पीढियां यदि नए साबुन की तरह,
उन्हें अपने साथ प्यार से चिपका ले,
तो उम्र भर काम आते है
वर्ना चिंताओं से गल जाते हैं,
या फेंक दिए जाते है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


Tuesday, September 11, 2012

ये पर्वत हैं

               ये पर्वत हैं

इन्हें न समझो तुम चट्टानें, इन्हें न समझो ये पत्थर है

ये सुन्दर है,ये  मनहर है ,झरझर झरते ये निर्झर  है
धरती माँ के स्तन मंडल,ये तो बरसाते अमृत है
                                        ये पर्वत है
हरे भरे हैं,मौन खड़े है,विपुल सम्पदा के स्वामी  है
तने हुए सर ऊंचा करके,निज गौरव के अभिमानी है
कहीं बर्फ से आच्छादित है,कहीं बरसती निर्मल धारा
कहीं अरण्य,कहीं भेषज है,सुन्दर हरित रूप है प्यारा
इनकी कोख भरी रत्नों से,कहीं स्वर्ण है,कहीं रजत है
                                       ये पर्वत  है
हिम किरीट से चमक रहे है,रजत शिखर  आलोकित सुन्दर
सूरज की किरणे भी सबसे,पहले इन्हें चूमती  आकर
कहीं देवियों के मंदिर है,कहीं वास करते  है शंकर
ये उद्गम गंगा यमुना के,इनमे ही है मानसरोवर
ये सीमाओं के प्रहरी है,अटल,अजय है,दुर्गम पथ है
                                      ये पर्वत है
मानव देव और दानव भी,काम सभी के आते है ये
अमृत मंथन को मेरु से,मथनी भी बन जाते है ये
नींव बने प्रगति ,विकास की,इनकी चट्टानों के पत्थर
किन्तु धधकता है  लावा भी,ज्वालामुखी ,सीने के अन्दर
मानव ने कर दिया खोखला,बहुत दुखी है आहत है
                                     ये पर्वत है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


मगर माँ बस एक है

             मगर माँ बस एक है

कई तारे टिमटिमाते,आसमां में रात भर,

                          मगर सूरज एक है  और चंद्रमां बस एक है
कहने को तो दुनिया में कितने करोड़ों देवता,
                           मगर जो दुनिया चलाता,वो खुदा बस एक है
कई टुकड़ों में गयी बंट,देश कितने बन गए,
                           ये धरा पर एक ही है,आसमां भी एक है
 कई रिश्ते है जहाँ में,भाभियाँ है चाचियाँ,
                         बहने है,भाई कई है ,मगर माँ  बस एक है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'    

जिंदगी हमने गमा दी,यूं ही शुभ और लाभ में

जिंदगी हमने गमा दी,यूं ही शुभ और लाभ में

रात दिन कुछ नहीं देखा,उम्र के सैलाब में

जिंदगी हमने गमा दी,यूं ही शुभ और लाभ में

रातदिन खटते रहे बस लक्ष्मी की चाह में

मुश्किलें थी,दिक्कतें थी,उन्नति की राह में
             मगर हम पिसते रहे
             एडियाँ   घिसते  रहे
सिर्फ दौलत और पैसा ही बसा था   ख्वाब में
जिंदगी हमने गमा दी,यूं ही शुभ और लाभ में

पंडितों को जन्मपत्री दिखा किस्मत पूछते

आश्रम,दरगाह,मंदिर, हम सभी को पूजते
              सभी से लुटते रहे
              और हम जुटते रहे
कभी टोने टोटके में,कभी पूजा ,जाप में
जिंदगी हमने गमा दी,यूं ही शुभ और लाभ में

सुख नहीं कोई उठाया,मुफलिसों से हम जिये

बहुत कुछ हमने कमाया,मगर सब किसके लिये
                उम्र के इस मोड़ पर
                गए सब संग छोड़ कर
इस बुढ़ापे में सहारा,कोई भी ना साथ में
जिंदगी हमने गमा दी,यूं ही शुभ और लाभ में

मदन मोहन बाहेती'घोटू'