चलित-फलित
स्थिर यह आकाश शून्य है,लेकिन सूर्य चलायमान है
कितनो को दे रहा रोशनी,कितनो में भर रहा प्राण है
चलना गति है,चलना जीवन,चलने से मंजिल मिलती है
वृक्ष खड़ा ,स्थिर रहता है,किन्तु हवाएं जब चलती है
शाखें हिलती,पत्ते हिलते,वृक्ष अचल,चल हो जाता है
कभी पुष्प की बारिश करता है,और कभी फल बरसाता है
नदिया का जल,होता चंचल,जब वो चलती,कल कल करती
उदगम से लेकर सागर तक,अपना नीर,बांटती ,चलती
पाती है संपर्क धरा जो,हो जाती,उपजाऊ,सिंचित
स्थिर ,कूप,सरोवर,इनका,सीमा क्षेत्र,बड़ा ही सीमित
सूर्य ताप से ,वाष्पित होकर,हो जाते है,शुष्क सरोवर
लहरे बहा,तरंगित रहता,पूरित जल से,हरदम सागर
चंदा चलित,चांदनी देता,बादल चलित ,नीर बरसाते
धरा चलित ,अपनी धुरी पर,दिन और रात तभी है आते
यह ऋतुओं का चक्र चल रहा,वर्षा,गर्मी या फिर सरदी
हम मे सब मे,तब तक जीवन,जब तक सांस,हमारी चलती
चलित फलित है,चलना ऊर्जा ,जड़ता लाती है स्थिरता
चलने से ही गति मिलती है,गति से ही है प्रगति,सफलता
चंचल चपल,बाल्यपन होता,होती चंचलता यौवन में
होती बड़ी चंचला लक्ष्मी, जो सुख सरसाती जीवन में
नारी नयन बड़े चंचल है,सबसे ज्यादा चंचल मन है
स्थिरता,स्थूल बनाती,चलते रहना ही जीवन है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Saturday, October 20, 2012
Friday, October 19, 2012
हे भगवान्!ये क्या हो रहा है?
हे भगवान्!ये क्या हो रहा है?
हे भगवान्! ये क्या हो रहा है
शासन करने वाले माल लूट रहे है,
और बेचारा आम आदमी रो रहा है
सत्ता से जुड़े लोग,और जो उनके सगे है
सब अपनी अपनी तिजोरियां भरने में लगे है
कोई करोड़ों की रिश्वतें खा रहा है
कोई अपने दामाद को फायदा पहुंचा रहा है
सत्ता में हो या विपक्ष
सब का है एक ही लक्ष्य
जितना हो सके देश को लूट लें
पता नहीं बाद में ये मौका मिले ,ना मिले
तुम करो मेरे चार काम
मै करूं तुम्हारे चार काम
'ओपोजिशन ' तो दिखने का है
हमारा मुख्य ध्येय तो पैसा कमाने का है
देश की जमीन है,
थोड़ी मै अपने नाम करवालूँ
थोड़ी तुम अपने नाम करवालो
आधी मै खालूं,आधी तुम खालो
मिलजुल कर जमाने में गुजारा करलो
और अपनी अपनी तिजोरियां भरलो
एक मंत्री ,विकलांगों के नाम पर,
झूंठे दस्तावेजों से,लाखों रूपये उठाता है
और कोई जब ये तथ्य सामने लाता है
तो देश का कानून मंत्री,
कानून को ताक पर रख कर,उसे धमकाता है
मेरे विरुद्ध यदि कुछ बताओगे
और मेरे क्षेत्र में आओगे
तो देखते है कैसे वापस जा पाओगे
कानून का मंत्री खुले आम,
कानून की धज्जियाँ उड़ा देता है
और इस पर देश का दूसरा मंत्री ,
(जो कोयले की दलाली में खुद काला है)
ये प्रतिक्रिया देता है
केन्द्रीय मंत्री सिर्फ लाखों में करे घोटाला ,
इस बात पर विश्वास नहीं कर,सकता कोई समझवाला
अरे केन्द्रीय मंत्रियों का स्टेंडर्ड तो है,
करने का करोड़ों का घोटाला
मंहगाई का दंश गरीब झेल रहे है
और राजनेता करोड़ों में खेल रहे है
अब तो तेरे अवतार लेने का सही टाईम आगया है ,
और तू सो रहा है
हे भगवान!ये क्या हो रहा है?
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
हे भगवान्! ये क्या हो रहा है
शासन करने वाले माल लूट रहे है,
और बेचारा आम आदमी रो रहा है
सत्ता से जुड़े लोग,और जो उनके सगे है
सब अपनी अपनी तिजोरियां भरने में लगे है
कोई करोड़ों की रिश्वतें खा रहा है
कोई अपने दामाद को फायदा पहुंचा रहा है
सत्ता में हो या विपक्ष
सब का है एक ही लक्ष्य
जितना हो सके देश को लूट लें
पता नहीं बाद में ये मौका मिले ,ना मिले
तुम करो मेरे चार काम
मै करूं तुम्हारे चार काम
'ओपोजिशन ' तो दिखने का है
हमारा मुख्य ध्येय तो पैसा कमाने का है
देश की जमीन है,
थोड़ी मै अपने नाम करवालूँ
थोड़ी तुम अपने नाम करवालो
आधी मै खालूं,आधी तुम खालो
मिलजुल कर जमाने में गुजारा करलो
और अपनी अपनी तिजोरियां भरलो
एक मंत्री ,विकलांगों के नाम पर,
झूंठे दस्तावेजों से,लाखों रूपये उठाता है
और कोई जब ये तथ्य सामने लाता है
तो देश का कानून मंत्री,
कानून को ताक पर रख कर,उसे धमकाता है
मेरे विरुद्ध यदि कुछ बताओगे
और मेरे क्षेत्र में आओगे
तो देखते है कैसे वापस जा पाओगे
कानून का मंत्री खुले आम,
कानून की धज्जियाँ उड़ा देता है
और इस पर देश का दूसरा मंत्री ,
(जो कोयले की दलाली में खुद काला है)
ये प्रतिक्रिया देता है
केन्द्रीय मंत्री सिर्फ लाखों में करे घोटाला ,
इस बात पर विश्वास नहीं कर,सकता कोई समझवाला
अरे केन्द्रीय मंत्रियों का स्टेंडर्ड तो है,
करने का करोड़ों का घोटाला
मंहगाई का दंश गरीब झेल रहे है
और राजनेता करोड़ों में खेल रहे है
अब तो तेरे अवतार लेने का सही टाईम आगया है ,
और तू सो रहा है
हे भगवान!ये क्या हो रहा है?
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
कमबख्त यार
कमबख्त यार
बड़ा कमबख्त यार है मेरा
गुले गुलज़ार प्यार है मेरा
बहुत वो मुझसे प्यार करता है
मस्तियाँ और धमाल करता है
ख्याल रखता है वो मेरा हरदम,
जान मुझ पर निसार करता है
मेरी साँसों की मधुर सरगम है,
मुझपे अनुरक्त यार है मेरा
बड़ा कमबख्त यार है मेरा
देखता तिरछी जब निगाहों से
रिझाता है नयी अदाओं से
कभी खुद आके लिपट जाता है,
कभी जाता है छिटक बाहों से
सताता मुझको अपने जलवों से,
वक़्त,बेवक्त यार है मेरा
बड़ा कमबख्त यार है मेरा
कभी सावन सा वो बरसता है
कभी बिजली सा वो कड़कता है
कभी बहता है नदी सा ,कल कल,
कभी वो बाढ़ सा उमड़ता है
कभी मख्खन सा वो मुलायम है,
तो कभी सख्त यार है मेरा
बड़ा कमबख्त यार है मेरा
जब भी हँसता है,मुस्कराता है
आग सी दिल में वो लगाता है
रोशनी बन के झाड़ फानूस की,
मेरे घर को वो जगमगाता है
मेरे जीवन को जिसने महकाया,
ऐसा जाने बहार है मेरा
बड़ा कमबख्त यार है मेरा
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
बड़ा कमबख्त यार है मेरा
गुले गुलज़ार प्यार है मेरा
बहुत वो मुझसे प्यार करता है
मस्तियाँ और धमाल करता है
ख्याल रखता है वो मेरा हरदम,
जान मुझ पर निसार करता है
मेरी साँसों की मधुर सरगम है,
मुझपे अनुरक्त यार है मेरा
बड़ा कमबख्त यार है मेरा
देखता तिरछी जब निगाहों से
रिझाता है नयी अदाओं से
कभी खुद आके लिपट जाता है,
कभी जाता है छिटक बाहों से
सताता मुझको अपने जलवों से,
वक़्त,बेवक्त यार है मेरा
बड़ा कमबख्त यार है मेरा
कभी सावन सा वो बरसता है
कभी बिजली सा वो कड़कता है
कभी बहता है नदी सा ,कल कल,
कभी वो बाढ़ सा उमड़ता है
कभी मख्खन सा वो मुलायम है,
तो कभी सख्त यार है मेरा
बड़ा कमबख्त यार है मेरा
जब भी हँसता है,मुस्कराता है
आग सी दिल में वो लगाता है
रोशनी बन के झाड़ फानूस की,
मेरे घर को वो जगमगाता है
मेरे जीवन को जिसने महकाया,
ऐसा जाने बहार है मेरा
बड़ा कमबख्त यार है मेरा
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
हम पंछी एक डाल के
हम पंछी एक डाल के
समझदार चिड़ियायें,
सुबह जल्दी से उठ कर,
बिजली के खम्बों के नीचे,
पा जाती ढेर सारे कीड़े
जैसे 'सेल' लगने पर,
समझदार महिलायें,
सुबह सुबह जल्दी जा,
चुन लेती अच्छे कपडे
सुबह सूर्य उगने पर,
बिजली के तारों पर,
पंक्तिबद्ध होकर के,
चहचहाती चिड़ियायें
काम काज निपटाकर ,
सर्दी के मौसम में,
धूप भरे आँगन में,
गपियाती महिलायें
आसमां में कुछ पंछी,
पंखों को फैलाये,
चुहुलबाजियाँ करते,
बस यूं ही उड़ते है
रिटायर्मेंट होने पर,
समय काटने को ज्यों,
कुछ बूढ़े संग बैठ,
गप्प मारा करते है
कुछ पंछी,सुबह सुबह,
नीड़ छोड़ उड़ जाते,
चुगने को दाना और,
शाम ढले आते है
जैसे हम सुबह सुबह,
दफ्तर को जाते है,
नौकरी कर दिन भर,
शाम को आते है
पंछी के जीवन सा,
हम सबका है जीवन
सपनो के पंख लगा,
हम उड़ते है हर क्षण
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
समझदार चिड़ियायें,
सुबह जल्दी से उठ कर,
बिजली के खम्बों के नीचे,
पा जाती ढेर सारे कीड़े
जैसे 'सेल' लगने पर,
समझदार महिलायें,
सुबह सुबह जल्दी जा,
चुन लेती अच्छे कपडे
सुबह सूर्य उगने पर,
बिजली के तारों पर,
पंक्तिबद्ध होकर के,
चहचहाती चिड़ियायें
काम काज निपटाकर ,
सर्दी के मौसम में,
धूप भरे आँगन में,
गपियाती महिलायें
आसमां में कुछ पंछी,
पंखों को फैलाये,
चुहुलबाजियाँ करते,
बस यूं ही उड़ते है
रिटायर्मेंट होने पर,
समय काटने को ज्यों,
कुछ बूढ़े संग बैठ,
गप्प मारा करते है
कुछ पंछी,सुबह सुबह,
नीड़ छोड़ उड़ जाते,
चुगने को दाना और,
शाम ढले आते है
जैसे हम सुबह सुबह,
दफ्तर को जाते है,
नौकरी कर दिन भर,
शाम को आते है
पंछी के जीवन सा,
हम सबका है जीवन
सपनो के पंख लगा,
हम उड़ते है हर क्षण
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
पत्नी,प्रियतमा और प्यार
पत्नी,प्रियतमा और प्यार
पत्नी को प्रियतमा बना कर प्यार कीजिये
महका कर इस जीवन को गुलजार कीजिये
घर की मुर्गी दाल बराबर नहीं समझिये
बल्कि बराबर दिल के उसे सजा कर रखिये
मान तुम्हे परमेश्वर ,जान लुटा वो देगी
तुम मानोगे एक बात वो दस मानेगी
इधर उधर ना फिर तुम्हारा मन भटकेगा
हर पल तुमको जीने का आनंद मिलेगा
बन कर एक दूजे का संबल जीओ जीवन
और कहीं भी नहीं मिलेगा ये अपनापन
सदा रहोगे जवां,बुढ़ापा भाग जाएगा
तुमको सचमुच में ,जीने का स्वाद आएगा
खुशियाँ भरिये,और सुखमय संसार कीजिये
पत्नी को प्रियतमा बनाकर प्यार कीजिये
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
पत्नी को प्रियतमा बना कर प्यार कीजिये
महका कर इस जीवन को गुलजार कीजिये
घर की मुर्गी दाल बराबर नहीं समझिये
बल्कि बराबर दिल के उसे सजा कर रखिये
मान तुम्हे परमेश्वर ,जान लुटा वो देगी
तुम मानोगे एक बात वो दस मानेगी
इधर उधर ना फिर तुम्हारा मन भटकेगा
हर पल तुमको जीने का आनंद मिलेगा
बन कर एक दूजे का संबल जीओ जीवन
और कहीं भी नहीं मिलेगा ये अपनापन
सदा रहोगे जवां,बुढ़ापा भाग जाएगा
तुमको सचमुच में ,जीने का स्वाद आएगा
खुशियाँ भरिये,और सुखमय संसार कीजिये
पत्नी को प्रियतमा बनाकर प्यार कीजिये
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Saturday, October 13, 2012
मरने पर ........
मरने पर ........
जीते जी तीर्थ न करवाये,
मरने पर संगम जाओगे
भर पेट खिलाया कभी नहीं,
पंडित को श्राद्ध खिलाओगे
बस एक काम ही एसा है,
जो तब भी किया और अब भी किया,
जीते जी बहुत जलाया था,
मरने पर भी तो जलाओगे
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
जीते जी तीर्थ न करवाये,
मरने पर संगम जाओगे
भर पेट खिलाया कभी नहीं,
पंडित को श्राद्ध खिलाओगे
बस एक काम ही एसा है,
जो तब भी किया और अब भी किया,
जीते जी बहुत जलाया था,
मरने पर भी तो जलाओगे
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
Thursday, October 11, 2012
बहू तो आखिर बहू है
बहू तो आखिर बहू है
क्या हुआ जो नहीं तुमसे,ठीक से वो बात करती
क्या हुआ घर पर न टिकती,करती रहती मटरगश्ती
क्या हुआ जो उसे खाना बनाने से बहुत चिढ है
क्या हुआ जो छोटी छोटी बात पे वो जाती भिड़ है
क्या हुआ कर बंद कमरा,देखती रहती है टी.वी.
अपने बेटे की बना कर ,लाये हो तुम उसे बीबी
इसलिए ये उसे हक है,जी में आये,वो करे वो
तुम्हारी करके बुराई,कान निज पति के भरे वो
पति जो भी कमाता है,उस पे अपना हक जमाये
सास,ननदों की न पूछे,मौज मइके में उडाये
तुम्हारा ही पुत्र तुमसे,छीन यदि उसने लिया है
बढाया है वंश तुम्हारा,तुम्हे पोता दिया है
है पराये घर की बेटी,था पराया खून पर अब
इतने दिन से ,चूस करके,खून तुम्हारा ,मगर सब
तुम्हारे ही लहू जैसा, हो गया उसका लहू है
बहू तो आखिर बहू है
मदन मोहन बाहेत'घोटू'
क्या हुआ जो नहीं तुमसे,ठीक से वो बात करती
क्या हुआ घर पर न टिकती,करती रहती मटरगश्ती
क्या हुआ जो उसे खाना बनाने से बहुत चिढ है
क्या हुआ जो छोटी छोटी बात पे वो जाती भिड़ है
क्या हुआ कर बंद कमरा,देखती रहती है टी.वी.
अपने बेटे की बना कर ,लाये हो तुम उसे बीबी
इसलिए ये उसे हक है,जी में आये,वो करे वो
तुम्हारी करके बुराई,कान निज पति के भरे वो
पति जो भी कमाता है,उस पे अपना हक जमाये
सास,ननदों की न पूछे,मौज मइके में उडाये
तुम्हारा ही पुत्र तुमसे,छीन यदि उसने लिया है
बढाया है वंश तुम्हारा,तुम्हे पोता दिया है
है पराये घर की बेटी,था पराया खून पर अब
इतने दिन से ,चूस करके,खून तुम्हारा ,मगर सब
तुम्हारे ही लहू जैसा, हो गया उसका लहू है
बहू तो आखिर बहू है
मदन मोहन बाहेत'घोटू'
Subscribe to:
Posts (Atom)