जो दिखता है-वो बिकता है
जो दिखता है -वो बिकता है
बिका हुआ रेपिंग पेपर में ,
छुप प्रेजेंट कहाता है
पर जब रेपिंग पेपर फटता ,
तो फिर से दिखलाता है
बन जाता प्रेजेंट ,पास्ट,
ज्यादा दिन तक ना टिकता है
जो दिखता है -वो फिंकता है
लाख करोडो रिश्वत खाते ,
नेताजी ,कर घोटाले
पोल खुले तो फंसते अफसर ,
मारे जाते बेचारे
छुपे छुपे नेताजी रहते ,
दोषी अफसर दिखता है
जो दिखता है-वो पिसता है
गौरी का रंग गोरा लेकिन,
खुला खुला जो अंग रहे
धीरे धीरे पड़ता काला ,
जब वो तीखी धुप सहे
छुपे अंग रहते गोरे ,
और खुल्ला ,काला दिखता है
जो दिखता है -वो सिकता है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Wednesday, November 21, 2012
Monday, November 19, 2012
दक्षिणा के साथ साथ
दक्षिणा के साथ साथ
अबकी बार ,जब आया था श्राध्द पक्ष
तो एक आधुनिक पंडित जी ,
जो है कर्म काण्ड में काफी दक्ष
हमने उन्हें निमंत्रण दिया कि ,
परसों हमारे दादाजी का श्राध्द है,
आप भोजन करने हमारे घर आइये
तो वो तपाक से बोले ,
कृपया भोजन का 'मेनू 'बतलाइये
हमने कहा पंडित जी,तर माल खिलवायेगे
खीर,पूरी,जलेबी,गुलाब जामुन ,कचोडी ,
पुआ,पकोड़ी सब बनवायेगे
पंडित जी बोले 'ये सारे पदार्थ ,
तले हुए है,और इनमे भरपूर शर्करा है '
ये सारा भोजन गरिष्ठ है ,
और 'हाई केलोरी 'से भरा है '
श्राध्द का प्रसाद है ,सो हमको खाना होगा
पर इतनी सारी केलोरी को जलाने को,
बाद में 'जिम' जाना होगा
इसलिए भोजन के बाद आप जो भी दक्षिणा देंगे
उसके साथ 'जिम'जाने के चार्जेस अलग से लगेंगे
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
अबकी बार ,जब आया था श्राध्द पक्ष
तो एक आधुनिक पंडित जी ,
जो है कर्म काण्ड में काफी दक्ष
हमने उन्हें निमंत्रण दिया कि ,
परसों हमारे दादाजी का श्राध्द है,
आप भोजन करने हमारे घर आइये
तो वो तपाक से बोले ,
कृपया भोजन का 'मेनू 'बतलाइये
हमने कहा पंडित जी,तर माल खिलवायेगे
खीर,पूरी,जलेबी,गुलाब जामुन ,कचोडी ,
पुआ,पकोड़ी सब बनवायेगे
पंडित जी बोले 'ये सारे पदार्थ ,
तले हुए है,और इनमे भरपूर शर्करा है '
ये सारा भोजन गरिष्ठ है ,
और 'हाई केलोरी 'से भरा है '
श्राध्द का प्रसाद है ,सो हमको खाना होगा
पर इतनी सारी केलोरी को जलाने को,
बाद में 'जिम' जाना होगा
इसलिए भोजन के बाद आप जो भी दक्षिणा देंगे
उसके साथ 'जिम'जाने के चार्जेस अलग से लगेंगे
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
दिवाली मन जाती है
दिवाली मन जाती है
जब भी आती है दिवाली ,हर बार
एक जगह ,एकत्रित हो जाता है,
हम सब भाइयों का पूरा परिवार
मनाने को खुशियों का त्योंहार
साथ साथ मिलकर के ,दिवाली मनाना
हंसी ख़ुशी ,चहल पहल,खाना,खिलाना
लक्ष्मी जी का पूजन,पटाखे चलाना
प्रेम भाव,मस्ती,वो हँसना ,हँसाना
भले ही चार दिन ,पर जब सब मिल जाते है
मेरी माँ के झुर्राए चेहरे पर ,
फूल खिल जाते है
सब को एक साथ देख कर ,
उनकी धुंधली सी आँखों में ,
खुशियों के दीपक जल जाते है
प्यार ,ममता और संतोष की,
ऐसी चमक आती है
कि दीपावली,अपने आप मन जाती है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
जब भी आती है दिवाली ,हर बार
एक जगह ,एकत्रित हो जाता है,
हम सब भाइयों का पूरा परिवार
मनाने को खुशियों का त्योंहार
साथ साथ मिलकर के ,दिवाली मनाना
हंसी ख़ुशी ,चहल पहल,खाना,खिलाना
लक्ष्मी जी का पूजन,पटाखे चलाना
प्रेम भाव,मस्ती,वो हँसना ,हँसाना
भले ही चार दिन ,पर जब सब मिल जाते है
मेरी माँ के झुर्राए चेहरे पर ,
फूल खिल जाते है
सब को एक साथ देख कर ,
उनकी धुंधली सी आँखों में ,
खुशियों के दीपक जल जाते है
प्यार ,ममता और संतोष की,
ऐसी चमक आती है
कि दीपावली,अपने आप मन जाती है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
गृह लक्ष्मी
गृह लक्ष्मी
नहीं कहीं भी कोई कमी है
मेरी पत्नी,गृहलक्ष्मी है
जीवन को करती ज्योतिर्मय
उससे ही है घर का वैभव
जगमग जगमग घर करता है
खुशियों से आँगन भरता है
दीवाली की सभी मिठाई
उसके अन्दर रहे समाई
गुझिये जैसा भरा हुआ तन
रसगुल्ले सा रसमय यौवन
और जलेबी जैसी सीधी
चाट चटपटी ,दहीबड़े सी
फूलझड़ी सी वो मुस्काती
और अनार सा फूल खिलाती
कभी कभी बम बन फटती है
आतिशबाजी सी लगती है
आभूषण से रहे सजी है
प्रतिभा उसकी ,चतुर्भुजी है
दो हाथों में कमल सजाती
खुले हाथ पैसे बरसाती
मै उलूक सा ,उनका वाहन
जाऊं उधर,जिधर उनका मन
इधर उधर आती जाती है
तभी चंचला कहलाती है
मेरे मन में मगर रमी है
नहीं कहीं भी कोई कमी है
मेरी पत्नी,गृह लक्ष्मी है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
नहीं कहीं भी कोई कमी है
मेरी पत्नी,गृहलक्ष्मी है
जीवन को करती ज्योतिर्मय
उससे ही है घर का वैभव
जगमग जगमग घर करता है
खुशियों से आँगन भरता है
दीवाली की सभी मिठाई
उसके अन्दर रहे समाई
गुझिये जैसा भरा हुआ तन
रसगुल्ले सा रसमय यौवन
और जलेबी जैसी सीधी
चाट चटपटी ,दहीबड़े सी
फूलझड़ी सी वो मुस्काती
और अनार सा फूल खिलाती
कभी कभी बम बन फटती है
आतिशबाजी सी लगती है
आभूषण से रहे सजी है
प्रतिभा उसकी ,चतुर्भुजी है
दो हाथों में कमल सजाती
खुले हाथ पैसे बरसाती
मै उलूक सा ,उनका वाहन
जाऊं उधर,जिधर उनका मन
इधर उधर आती जाती है
तभी चंचला कहलाती है
मेरे मन में मगर रमी है
नहीं कहीं भी कोई कमी है
मेरी पत्नी,गृह लक्ष्मी है
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Sunday, November 18, 2012
पत्नी-पीड़ित -पति
पत्नी-पीड़ित -पति
सारी दुनिया में ले चिराग ,
यदि निकल ढूँढने जाए आप
मुश्किल से ही मिल पायेगा ,
पत्नी पीड़ित पति सा प्राणी
ये बात नहीं है अनजानी
चेहरे पर चिंतायें होगी ,
माथे पर शिकन पड़ी होगी
मुरझाया सा मुखड़ा होगा ,
सूरत कुछ झड़ी झड़ी होगी
सर पर यदि होंगे बाल अगर ,
तो अस्त व्यस्त ही पाओगे ,
वर्ना अक्सर ही उस गरीब ,
की चंदिया उडी उडी होगी
रूखी रूखी बातें करता ,
सूखा सूखा आनन होगा
निचुड़ा निचुड़ा ,सुकड़ा सुकड़ा ,
ढीला ढीला सा तन होगा
आँखों में चमक नहीं होगी ,
कुछ कुछ मुरझायापन होगा
यदि बाहर से हँसता भी हो,
अन्दर से रोता मन होगा
बिचके जो बातचीत में भी,
कुछ कहने में शरमाता हो
पत्नी की आहट पाते ही ,
झट घबरा घबरा जाता हो
चौकन्ना श्वान सरीखा हो,
गैया सा सीधा सीधा हो
पर अपने घर में घुसते ही ,
भीगी बिल्ली बन जाता हो
दिखने में भोला भोला हो
जिसके होंठो पर ताला हो
बोली हो जिसकी दबी दबी ,
और हंसी हँसे जो खिसियानी
मुश्किल से ही मिल पायेगा ,
पत्नी पीड़ित पति सा प्राणी
उस दुखी जीव को देख अगर ,
जो ह्रदय दया से भर जाए
उसकी हालत पर तरस आये,
मन में सहानुभूति छाये
शायद तुम उससे पूछोगे ,
क्यों बना रखी है ये हालत ,
हो सकता है वो घबराये ,
उत्तर देने में कतराये
तुम शायद पूछो क्या ऐसा ,
जीवन लगता है जेल नहीं
चेहरे पर चिंताएं क्यों है,
क्यों है बालों में तेल नहीं
सूखी सी एक हंसी हंस कर ,
शायद वह यह उत्तर देगा ,
पत्नी पीड़ित ,होकर जीवित ,
रह लेना कोई खेल नहीं
मै खोया खोया रहता हूँ,
मुझको जीवन से मोह नहीं
सब कुछ सह सकता ,पत्नी से ,
सह सकता मगर बिछोह नहीं
शायद मेरी कमजोरी है ,
कायरता भी कह सकते हो,
लेकिन अपनी पत्नीजी से ,
कर सकता मै विद्रोह नहीं
कैसे साहस कर सकता हूँ
उनके बेलन से डरता हूँ
पत्नी सेवा है धर्म मेरा ,
पत्नीजी है घर की रानी
मुश्किल से ही मिल पायेगा ,
पत्नी पीड़ित पति सा प्राणी
ऐसे पत्नी पीड़ित पति की भी,
काफी किस्मे होती है
कितने ही आफत के मारों ,
की गिनती इसमें होती है
कोई के पल्ले बंध जाती,
जब बड़े बाप की बेटी है,
तो छोटी छोटी बातों में ,
भी तू तू मै मै होती है
कोई की पत्नी कमा रही,
तो पति पर रौब चलाती है
कोई सुन्दर आँखों वाली है ,
पति को आँख दिखाती है
कोई का पति दीवाना है ,
कोई के पति जी दुर्बल है ,
पति की कोई भी कमजोरी का ,
पत्नी लाभ उठाती है
कुछ ख़ास किसम के पतियों संग ,
एसा भी चक्कर होता है
पति विरही ,तडफे ,पत्नी को ,
पर प्यारा पीहर होता है
कोई की पत्नी सुन्दर है,
सब लोग घूर कर तकते है
कुछ शकी किस्म के पतियों को,
अक्सर ये भी डर होता है
कोई की पत्नी रोगी है
कोई की पत्नी ढोंगी है
कोई की पत्नी करती है ,
अक्सर अपनी ही मन मानी
मुश्किल से ही मिल पायेगा ,
पत्नी पीड़ित पति सा प्राणी
ये बात नहीं है अनजानी
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
सारी दुनिया में ले चिराग ,
यदि निकल ढूँढने जाए आप
मुश्किल से ही मिल पायेगा ,
पत्नी पीड़ित पति सा प्राणी
ये बात नहीं है अनजानी
चेहरे पर चिंतायें होगी ,
माथे पर शिकन पड़ी होगी
मुरझाया सा मुखड़ा होगा ,
सूरत कुछ झड़ी झड़ी होगी
सर पर यदि होंगे बाल अगर ,
तो अस्त व्यस्त ही पाओगे ,
वर्ना अक्सर ही उस गरीब ,
की चंदिया उडी उडी होगी
रूखी रूखी बातें करता ,
सूखा सूखा आनन होगा
निचुड़ा निचुड़ा ,सुकड़ा सुकड़ा ,
ढीला ढीला सा तन होगा
आँखों में चमक नहीं होगी ,
कुछ कुछ मुरझायापन होगा
यदि बाहर से हँसता भी हो,
अन्दर से रोता मन होगा
बिचके जो बातचीत में भी,
कुछ कहने में शरमाता हो
पत्नी की आहट पाते ही ,
झट घबरा घबरा जाता हो
चौकन्ना श्वान सरीखा हो,
गैया सा सीधा सीधा हो
पर अपने घर में घुसते ही ,
भीगी बिल्ली बन जाता हो
दिखने में भोला भोला हो
जिसके होंठो पर ताला हो
बोली हो जिसकी दबी दबी ,
और हंसी हँसे जो खिसियानी
मुश्किल से ही मिल पायेगा ,
पत्नी पीड़ित पति सा प्राणी
उस दुखी जीव को देख अगर ,
जो ह्रदय दया से भर जाए
उसकी हालत पर तरस आये,
मन में सहानुभूति छाये
शायद तुम उससे पूछोगे ,
क्यों बना रखी है ये हालत ,
हो सकता है वो घबराये ,
उत्तर देने में कतराये
तुम शायद पूछो क्या ऐसा ,
जीवन लगता है जेल नहीं
चेहरे पर चिंताएं क्यों है,
क्यों है बालों में तेल नहीं
सूखी सी एक हंसी हंस कर ,
शायद वह यह उत्तर देगा ,
पत्नी पीड़ित ,होकर जीवित ,
रह लेना कोई खेल नहीं
मै खोया खोया रहता हूँ,
मुझको जीवन से मोह नहीं
सब कुछ सह सकता ,पत्नी से ,
सह सकता मगर बिछोह नहीं
शायद मेरी कमजोरी है ,
कायरता भी कह सकते हो,
लेकिन अपनी पत्नीजी से ,
कर सकता मै विद्रोह नहीं
कैसे साहस कर सकता हूँ
उनके बेलन से डरता हूँ
पत्नी सेवा है धर्म मेरा ,
पत्नीजी है घर की रानी
मुश्किल से ही मिल पायेगा ,
पत्नी पीड़ित पति सा प्राणी
ऐसे पत्नी पीड़ित पति की भी,
काफी किस्मे होती है
कितने ही आफत के मारों ,
की गिनती इसमें होती है
कोई के पल्ले बंध जाती,
जब बड़े बाप की बेटी है,
तो छोटी छोटी बातों में ,
भी तू तू मै मै होती है
कोई की पत्नी कमा रही,
तो पति पर रौब चलाती है
कोई सुन्दर आँखों वाली है ,
पति को आँख दिखाती है
कोई का पति दीवाना है ,
कोई के पति जी दुर्बल है ,
पति की कोई भी कमजोरी का ,
पत्नी लाभ उठाती है
कुछ ख़ास किसम के पतियों संग ,
एसा भी चक्कर होता है
पति विरही ,तडफे ,पत्नी को ,
पर प्यारा पीहर होता है
कोई की पत्नी सुन्दर है,
सब लोग घूर कर तकते है
कुछ शकी किस्म के पतियों को,
अक्सर ये भी डर होता है
कोई की पत्नी रोगी है
कोई की पत्नी ढोंगी है
कोई की पत्नी करती है ,
अक्सर अपनी ही मन मानी
मुश्किल से ही मिल पायेगा ,
पत्नी पीड़ित पति सा प्राणी
ये बात नहीं है अनजानी
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
नुक्सान
नुक्सान
मेरी शादी नयी नयी थी
मेरी बीबी छुई मुई थी
सीधी सादी भोली भाली
एक गाँव की रहने वाली
ससुर साहब ने पाली भैंसे
बेचा दूध,कमाए पैसे
अरारोट ,पानी की माया
बचा दूध तो दही बनाया
मख्खन,छाछ ,कड़ी बनवायी
घर पर सब्जी कभी न आयी
तो भोली बीबी को लेकर
मैंने बसा लिया अपना घर
तरह तरह की बात बताता
ताज़ी ताज़ी सब्जी लाता
एक दिवस ऑफिस से लौटा
आते ही बीबी ने टोका
तुम्हे ठगा सब्जी वाले ने
धोखा खूब दिया साले ने
सब्जी तुम लाये थे जो भी
हाँ हाँ क्या थी,पत्ता गोभी
छिलके ही छिलके निकले जी
गूदे का ना पता चले जी
मैंने छिलके फेंक दिये है
सारे पैसे व्यर्थ गये है
सुन कर बहुत हंसी सी आई
पत्नीजी ने कभी न खायी
थी सब्जी पत्ता गोभी की
वह ना उसकी माँ दोषी थी
कंजूसी से काम हो गया
पर मेरा नुक्सान हो गया
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
मेरी शादी नयी नयी थी
मेरी बीबी छुई मुई थी
सीधी सादी भोली भाली
एक गाँव की रहने वाली
ससुर साहब ने पाली भैंसे
बेचा दूध,कमाए पैसे
अरारोट ,पानी की माया
बचा दूध तो दही बनाया
मख्खन,छाछ ,कड़ी बनवायी
घर पर सब्जी कभी न आयी
तो भोली बीबी को लेकर
मैंने बसा लिया अपना घर
तरह तरह की बात बताता
ताज़ी ताज़ी सब्जी लाता
एक दिवस ऑफिस से लौटा
आते ही बीबी ने टोका
तुम्हे ठगा सब्जी वाले ने
धोखा खूब दिया साले ने
सब्जी तुम लाये थे जो भी
हाँ हाँ क्या थी,पत्ता गोभी
छिलके ही छिलके निकले जी
गूदे का ना पता चले जी
मैंने छिलके फेंक दिये है
सारे पैसे व्यर्थ गये है
सुन कर बहुत हंसी सी आई
पत्नीजी ने कभी न खायी
थी सब्जी पत्ता गोभी की
वह ना उसकी माँ दोषी थी
कंजूसी से काम हो गया
पर मेरा नुक्सान हो गया
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Saturday, November 17, 2012
मात शारदे!
मात शारदे!
मात शारदे !
मुझे प्यार दे
वीणावादिनी !
नव बहार दे
मन वीणा को ,
झंकृत कर दे
हंस वाहिनी ,
एसा वर दे
सत -पथ -अमृत ,
मन में भर दे
बुद्धिदायिनी ,
नव विचार दे
मात शारदे!
ज्ञानसुधा की,
घूँट पिला दे
सुप्त भाव का ,
जलज खिला दे
गयी चेतना ,
फिर से ला दे
डगमग नैया ,
लगा पार दे
मात शारदे !
भटक रहा मै ,
दर दर ओ माँ
नव प्रकाश दे,
तम हर ओ माँ
नव लय दे तू,
नव स्वर ओ माँ
ज्ञान सुरसरी ,
प्रीत धार दे
मात शारदे !
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
मात शारदे !
मुझे प्यार दे
वीणावादिनी !
नव बहार दे
मन वीणा को ,
झंकृत कर दे
हंस वाहिनी ,
एसा वर दे
सत -पथ -अमृत ,
मन में भर दे
बुद्धिदायिनी ,
नव विचार दे
मात शारदे!
ज्ञानसुधा की,
घूँट पिला दे
सुप्त भाव का ,
जलज खिला दे
गयी चेतना ,
फिर से ला दे
डगमग नैया ,
लगा पार दे
मात शारदे !
भटक रहा मै ,
दर दर ओ माँ
नव प्रकाश दे,
तम हर ओ माँ
नव लय दे तू,
नव स्वर ओ माँ
ज्ञान सुरसरी ,
प्रीत धार दे
मात शारदे !
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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