तुमने ऐसी आग लगा दी
मै पग पग रख ,धीरे चलती
तुम चलते हो जल्दी ,जल्दी
मै बस चार कदम चल पायी,और तुमने तो दौड़ लगा दी
मंद आंच सी, मै हूँ जलती
और तुम तो हो लपट दहकती
तुमने अपनी चिंगारी से ,तन मन में है आग लगा दी
ऊष्मा है तो मेघ उठेंगे
घुमुड़ घुमुड़ कर वो गरजेंगे
रह रह कर बिजली कड़केगी ,
तप्त धरा पर फिर बरसेंगे
बहुत चाह थी मेरे मन की
भीगूं रिमझिम में सावन की
लेकिन तुम तो ऐसे बरसे,प्रेम झड़ी ,घनघोर लगा दी
मै बस चार कदम चल पायी,और तुमने तो दौड़ लगा दी
मै हूँ पानी,तुम हो चन्दन
हम मिल जुल ,करते आराधन
तुम घिस घिस इस तरह घुल गये
महक गया तन मन का आँगन
चाहत थी तन में खुशबू भर
चढूँ देवता के मस्तक पर
तुम को अर्पित करके सब कुछ,जीवन की बगिया महका दी
मै बस चार कदम चल पायी ,और तुमने तो दौड़ लगा दी
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
http://blogsmanch.blogspot.com/" target="_blank"> (ब्लॉगों का संकलक)" width="160" border="0" height="60" src="http://i1084.photobucket.com/albums/j413/mayankaircel/02.jpg" />
Thursday, February 21, 2013
शिशु की भाषा
शिशु की भाषा
नन्हे शिशु की,होती बस दो भाषा है
एक तो वो हँसता है ,एक वो रोता है
इन्ही दो भाषाओँ में वो,सब कुछ व्यक्त किया करता है
इन भाषाओँ की ,कोई लिपि नहीं होती,
और इन्हें समझने के लिए ,
कोई अक्षर या भाषा के ज्ञान की जरुरत नहीं होती
बच्चा जब हँसता है ,
किलकारियां भरता है ,
तो सभी के चेहरे पर खुशियाँ छाती है
उसकी मुस्कान की भाषा ,
सबको समझ में आ जाती है
पर बच्चा जब रोता है,
अपने कोमल से कपोलों को आंसूं से भिगोता है
सारा घर परेशान होता है
क्योंकि ये भाषा ,हर एक को समझ नहीं आती है
सिर्फ एक माँ है ,जो कि समझ पाती है
कि उसे भूख लगी है या पेट में दर्द है
या उसके कपडे गीले हो गए है और सर्द है
अपने कलेजे के टुकड़े की ये दो भाषाएँ
पूर्ण रूप से जिन्हें ,समझ सकती है बस मायें
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
नन्हे शिशु की,होती बस दो भाषा है
एक तो वो हँसता है ,एक वो रोता है
इन्ही दो भाषाओँ में वो,सब कुछ व्यक्त किया करता है
इन भाषाओँ की ,कोई लिपि नहीं होती,
और इन्हें समझने के लिए ,
कोई अक्षर या भाषा के ज्ञान की जरुरत नहीं होती
बच्चा जब हँसता है ,
किलकारियां भरता है ,
तो सभी के चेहरे पर खुशियाँ छाती है
उसकी मुस्कान की भाषा ,
सबको समझ में आ जाती है
पर बच्चा जब रोता है,
अपने कोमल से कपोलों को आंसूं से भिगोता है
सारा घर परेशान होता है
क्योंकि ये भाषा ,हर एक को समझ नहीं आती है
सिर्फ एक माँ है ,जो कि समझ पाती है
कि उसे भूख लगी है या पेट में दर्द है
या उसके कपडे गीले हो गए है और सर्द है
अपने कलेजे के टुकड़े की ये दो भाषाएँ
पूर्ण रूप से जिन्हें ,समझ सकती है बस मायें
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Wednesday, February 20, 2013
पेट के खातिर
पेट के खातिर
पेट के खातिर न जाने ,क्या क्या करता आदमी
पेट के खातिर ही जीता और मरता आदमी
पेट में जब आग लगती ,तो बुझाने के लिये ,
जो न करना चाहिए ,वो कर गुजरता आदमी
नौकरी ,मेहनत ,गुलामी,में स्वयं को बेच कर,
अपना और परिवार सबका ,पेट भरता आदमी
खेत में हल चला कर के,अन्न उपजाता कई ,
तब कहीं दो रोटियां खा,गुजर करता आदमी
मूक ,निर्बल जानवर को,काट,उनका मांस खा,
भूख अपनी मिटाने में,नहीं डरता आदमी
पाप और अपराध इतने,हो रहे संसार में ,
पेट पापी के लिए ,बनता बिगड़ता आदमी
पेट हो खाली अगर तो,भजन भी होता नहीं,
इसलिए ,पहले भजन के ,पेट भरता आदमी
कहते हैं कि दिल का रास्ता,पेट से है गुजरता ,
पहले भरता पेट है फिर इश्क करता आदमी
पेट भरने के लिये ,खटता है और जीता है वो,
या कि जीने के लिये है,पेट भरता आदमी
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
पेट के खातिर न जाने ,क्या क्या करता आदमी
पेट के खातिर ही जीता और मरता आदमी
पेट में जब आग लगती ,तो बुझाने के लिये ,
जो न करना चाहिए ,वो कर गुजरता आदमी
नौकरी ,मेहनत ,गुलामी,में स्वयं को बेच कर,
अपना और परिवार सबका ,पेट भरता आदमी
खेत में हल चला कर के,अन्न उपजाता कई ,
तब कहीं दो रोटियां खा,गुजर करता आदमी
मूक ,निर्बल जानवर को,काट,उनका मांस खा,
भूख अपनी मिटाने में,नहीं डरता आदमी
पाप और अपराध इतने,हो रहे संसार में ,
पेट पापी के लिए ,बनता बिगड़ता आदमी
पेट हो खाली अगर तो,भजन भी होता नहीं,
इसलिए ,पहले भजन के ,पेट भरता आदमी
कहते हैं कि दिल का रास्ता,पेट से है गुजरता ,
पहले भरता पेट है फिर इश्क करता आदमी
पेट भरने के लिये ,खटता है और जीता है वो,
या कि जीने के लिये है,पेट भरता आदमी
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Monday, February 18, 2013
राजभोग से
राजभोग से
भोज थाल में सज,सुन्दर से
भरे हुऐ ,पिस्ता केसर से
अंग अंग में ,रस है तेरे
लुभा रहा है मन को मेरे
स्वर्णिम काया ,सुगठित,सुन्दर
राजभोग तू ,बड़ा मनोहर
बड़ी शान से इतराता है
तू इस मन को ललचाता है
जब होगा उदरस्त हमारे
कुछ क्षण स्वाद रहेगा प्यारे
मज़ा आएगा तुझ को खाके
मगर पेट के अन्दर जाके
सब जाने नियति क्या होगी
और कल तेरी गति क्या होगी
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
भोज थाल में सज,सुन्दर से
भरे हुऐ ,पिस्ता केसर से
अंग अंग में ,रस है तेरे
लुभा रहा है मन को मेरे
स्वर्णिम काया ,सुगठित,सुन्दर
राजभोग तू ,बड़ा मनोहर
बड़ी शान से इतराता है
तू इस मन को ललचाता है
जब होगा उदरस्त हमारे
कुछ क्षण स्वाद रहेगा प्यारे
मज़ा आएगा तुझ को खाके
मगर पेट के अन्दर जाके
सब जाने नियति क्या होगी
और कल तेरी गति क्या होगी
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
अपने अपने ढंग
अपने अपने ढंग
जब भी ये आये है तो ,रोकी नहीं जाये फिर ,
करोगे नहीं तो देगी ,दम ये निकाल कर
बैठे बैठे नारी करे,खड़े खड़े नर करे ,
सड़क किनारे कभी ,तो कभी दीवार पर
शिशु करे सोते सोते ,गोदी में या रोते रोते,
पंडित करे है कान पे जनेऊ डाल कर
कोई डर जाये करे,कोई पिट जाये करे,
बूढ़े करे धीरे धीरे ,देर तक ,संभाल कर
टांग उठा ,करे कुत्ता,जगह को सूंघ सूंघ ,
बिजली का खम्बा कोई,पास देख भाल कर
करने के सबके है ,अपने तरीके अलग,
बड़ा ही सुकून मिले ,इसको निकाल कर
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
जब भी ये आये है तो ,रोकी नहीं जाये फिर ,
करोगे नहीं तो देगी ,दम ये निकाल कर
बैठे बैठे नारी करे,खड़े खड़े नर करे ,
सड़क किनारे कभी ,तो कभी दीवार पर
शिशु करे सोते सोते ,गोदी में या रोते रोते,
पंडित करे है कान पे जनेऊ डाल कर
कोई डर जाये करे,कोई पिट जाये करे,
बूढ़े करे धीरे धीरे ,देर तक ,संभाल कर
टांग उठा ,करे कुत्ता,जगह को सूंघ सूंघ ,
बिजली का खम्बा कोई,पास देख भाल कर
करने के सबके है ,अपने तरीके अलग,
बड़ा ही सुकून मिले ,इसको निकाल कर
मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
Sunday, February 17, 2013
माँ की महानता
माँ की महानता
माँ महान है बुद्धि दायिनी
माँ उड़ान है सुख प्रदायिनी
स्वाभमान है -माँ जन्मदायिनी--माँ
माँ विशेष है ज्ञान सुरसरी
माँ सन्देश है प्यार से भरी
माँ स्वदेश है -माँ ममता माधुरी -माँ
माँ तरंग है माँ जीवन है
माँ उमंग है माँ आँगन है
सदा संग है -माँ वृन्दावन है-माँ
माँ संगीत है माँ है जननी
माँ पुनीत है ज्ञान वर्धिनी
प्रेमगीत है --माँ पथप्रदार्शिनी -माँ
माँ है शिक्षा माँ गंगा है
माँ है दीक्षा जगदम्बा है
और परीक्षा -माँ अनुकम्पा है-माँ
सद विचार है बुद्धि प्रदाता
प्रीत धार है सुख की दाता
मधुर प्यार है -माँ भाग्य विधाता -माँ
माँ भोली है माँ कविता है
माँ डोरी है माँ सरिता है
माँ लोरी है-माँ और गीता है -माँ
माँ विकास है आशीषें भर
माँ प्रकाश है करे निछावर
माँ मिठास है-माँ जो जीवन भर -माँ
माँ अनूप है माँ पोषण है
ज्ञान कूप है माँ चन्दन है
देवी रूप है -माँ आराधन है -माँ
माँ दीया है माँ ममता है
कुछ न लिया है, माँ समता है
सदा दिया है-माँ माँ बस माँ है -माँ
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
माँ महान है बुद्धि दायिनी
माँ उड़ान है सुख प्रदायिनी
स्वाभमान है -माँ जन्मदायिनी--माँ
माँ विशेष है ज्ञान सुरसरी
माँ सन्देश है प्यार से भरी
माँ स्वदेश है -माँ ममता माधुरी -माँ
माँ तरंग है माँ जीवन है
माँ उमंग है माँ आँगन है
सदा संग है -माँ वृन्दावन है-माँ
माँ संगीत है माँ है जननी
माँ पुनीत है ज्ञान वर्धिनी
प्रेमगीत है --माँ पथप्रदार्शिनी -माँ
माँ है शिक्षा माँ गंगा है
माँ है दीक्षा जगदम्बा है
और परीक्षा -माँ अनुकम्पा है-माँ
सद विचार है बुद्धि प्रदाता
प्रीत धार है सुख की दाता
मधुर प्यार है -माँ भाग्य विधाता -माँ
माँ भोली है माँ कविता है
माँ डोरी है माँ सरिता है
माँ लोरी है-माँ और गीता है -माँ
माँ विकास है आशीषें भर
माँ प्रकाश है करे निछावर
माँ मिठास है-माँ जो जीवन भर -माँ
माँ अनूप है माँ पोषण है
ज्ञान कूप है माँ चन्दन है
देवी रूप है -माँ आराधन है -माँ
माँ दीया है माँ ममता है
कुछ न लिया है, माँ समता है
सदा दिया है-माँ माँ बस माँ है -माँ
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
Saturday, February 16, 2013
भाग्य का आलेख
भाग्य का आलेख
कोई कितना भ्रमित करदे ,स्वप्न सुनहरे दिखा कर
हमें बस मिलता वही है,लाये है जो हम लिखा कर
भाग्य के आलेख को ,कोई बदल सकता नहीं है
लिखा है तकदीर में जो,हमें बस मिलता वही है
हम कहाँ की सोचते है,पहुँचते है कहाँ जाकर
हमें बस मिलता वही है ,लाये हैं जो हम लिखा कर
कर्म निज करते रहें हम,स्वयं में विश्वास रख कर
बढ़ें आगे ,लक्ष्य पाने ,धेर्य को निज,साथ रख कर
नियति अपने आप देगी,सफलताओं से मिला कर
हमें बस मिलता वही है,लाये है जो भी लिखा कर
दिग्भ्रमित करने तुम्हारी,राह में अड़चन मिलेगी
कभी कांटे भी चुभेंगे , कभी ठोकर भी लगेगी
अँधेरे में ,पथ प्रदर्शन,करे वो दिया जलाकर
हमें बस मिलता वही है,लाये है,जो भी लिखाकर
भाग्य में यदि महाभारत ,लिखी है जो विधाता ने
कृष्ण खुद ही आयेंगे ,बन सारथी ,रथ को चलाने
युद्ध में तुमको जिताएंगे तुम्हारा हक दिला कर
हमें बस मिलता वही है ,लाये हैं हम जो लिखा कर
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
कोई कितना भ्रमित करदे ,स्वप्न सुनहरे दिखा कर
हमें बस मिलता वही है,लाये है जो हम लिखा कर
भाग्य के आलेख को ,कोई बदल सकता नहीं है
लिखा है तकदीर में जो,हमें बस मिलता वही है
हम कहाँ की सोचते है,पहुँचते है कहाँ जाकर
हमें बस मिलता वही है ,लाये हैं जो हम लिखा कर
कर्म निज करते रहें हम,स्वयं में विश्वास रख कर
बढ़ें आगे ,लक्ष्य पाने ,धेर्य को निज,साथ रख कर
नियति अपने आप देगी,सफलताओं से मिला कर
हमें बस मिलता वही है,लाये है जो भी लिखा कर
दिग्भ्रमित करने तुम्हारी,राह में अड़चन मिलेगी
कभी कांटे भी चुभेंगे , कभी ठोकर भी लगेगी
अँधेरे में ,पथ प्रदर्शन,करे वो दिया जलाकर
हमें बस मिलता वही है,लाये है,जो भी लिखाकर
भाग्य में यदि महाभारत ,लिखी है जो विधाता ने
कृष्ण खुद ही आयेंगे ,बन सारथी ,रथ को चलाने
युद्ध में तुमको जिताएंगे तुम्हारा हक दिला कर
हमें बस मिलता वही है ,लाये हैं हम जो लिखा कर
मदन मोहन बाहेती'घोटू'
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