Saturday, May 4, 2013

खबर क्या होती है ?

खबर क्या होती है ?

खबर वो होती है जो सबसे अलग दिखाये
जिसमे कुछ नवीनता नज़र आये
 नेताजी ने कहीं रिबिन काटा
या नेताजी को कुत्ते ने काटा  
ये तो 'रूटीन' समाचार है ,
खबर तब बनती है जब रिबिन काटनेवाले ,
नेताजी कुत्ते को काट खाये
अब जैसे पुलिसवाले,
 रिश्वतखोरी के लिये बदनाम है 
बिना पैसा लिए करते नहीं कुछ काम है
आम आदमी परेशान है
शिकायत या ऍफ़ आई आर दर्ज करने में भी ,
पुलिसवाले रिश्वत लेते है
पर खबर तब बनती है जब,
एक बच्ची पर बलात्कार की शिकायत ,
दर्ज ना करवाने के लिए ,
थानेदार साहब ,लडकी के बाप को ,
दो हज़ार रुपयों की रिश्वत देते है 
नेताओं के अनर्गल प्रलाप ,
तो यूं ही अक्सर सुनते रहते है आप
पर खबर तब बनती है जब ,
सूखे तालाबों को भरने के लिए ,
नेताजी कहते है 'करो पेशाब'
मंत्री और नेताओं के,
 भ्रष्टाचार के किस्से रोज आ रहे है 
और शासनकर्ता ,एक दूसरे को बचा रहे है
एक केन्द्रीय मंत्री ने किसी,
 सामुदायिक विकास के कार्य में ,
लाखों रुपयों की हेराफेरी की ,
जब ये समाचार टी .वी .पर आता है
तो खबर तब बनती है ,
जब दूसरा केन्द्रीय मंत्री  उसे बचाता है 
कहता , है केंद्र का मंत्री और बस लाखों की हेराफेरी ,
यह अविश्वसनीय लगता है 
क्योंकि केंद्र का मंत्री तो ,
करोड़ों की हेराफेरी करता है
ऐसी हास्यप्रद,फूहड़ ख़बरें ,आपको गुदगुदायेगी
मन में पीड़ा भी होगी ,हंसी भी आयेगी
और भाई साहब ,खबर तो तब बनेगी ,
जब ऐसे भ्रष्ट लोगों की चोकड़ी की सरकार ,
फिर से सत्ता में आ जायेगी 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

दास्ताने इश्क

      दास्ताने इश्क

थी बला की खूबसूरत ,वो हसीना ,नाज़नीं ,
                   देख कर के जिसको हम पे छा गयी दीवानगी
शोख थी,चंचल वो जालिम,कातिलाना थी अदा ,
                   छायी जिस की छवि दिल पर ,रहती सुबहो-शाम थी 
इश्क था चढ़ती उमर का,सर पे चढ़ कर बोलता ,
                   त़ा उमर रटते रहे हम ,माला जिसके   नाम की
उसने नज़रे इनायत की,जब बुढ़ापा आ गया ,
                    सूख जब फसलें गयी तो बारिशें किस काम की

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, May 2, 2013

छोटी इलायची -बड़ी इलायची

 

एक बड़ी नाजुक सी,एक बड़ी  फूहड़ सी 
एक बाल बिखराये ,और एक सुगढ़  सी 
एक हरी भरी सुन्दर ,नन्ही सी ,प्यारी सी 
एक बड़ी मोटी और बेडोल ,काली   सी 
एक रम्य ,रम्भा सी ,एक राक्षस वर्णी 
खुशबूए दोनों की ,मगर एक ही  धर्मी 
भोजन ,मिष्ठानो में ,वही स्वाद लाती है 
बार बार हमको ये,लेकिन सिखलाती है 
रूप रंग भ्रामक है ,सिर्फ शकल मत देखो 
सही परख आवश्यक ,अन्दर के गुण देखो 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  

Wednesday, May 1, 2013

टी की वेरायटी

          टी की वेरायटी

चाय की होती है अलग अलग वेरायटी
जैसे आसाम की टी
गोल गोल बारीक दाने ,जब लेते है उबाल 
तो चाय बनती है कड़क और रंगत दार
और दार्जिलिग टी की
होती है बड़ी नाजुक,लम्बी ,छारहरी  पत्ती
उबलते पानी को जरा देर ही छूती
आ जाती है हलकी सी रंगत ,पर खुशबू अनूठी
और फिर ग्रीन चाय ,न फ्लेवर ,न रंगत
मगर एन्टी ओक्सिडेंट से भरी है,
देती है अच्छी सेहत
कहने को तो सब चाय होती है
पर सब का स्वाद,रंगत और तासीर ,
अलग अलग होती है
और जिसको ,जिसकी आदत पड़ जाती है
वो ही उसके मन भाती  है
बीबियाँ भी  होती है,चाय की तरह,
कोई कड़क,कोई रंगीली
कोई छरहरी ,खुशबू से भरी
कोई बेरंग,पर गुणों की खान
आपको कौनसी वाली पसंद है श्रीमान ?
पीछे से किसी की आवाज आई,
भैया ,हमको तो बुरके  वाली है पसंद
'टी बेग 'लेते है और गरम पानी में ,
डुबा डुबा कर लेते है स्वाद का आनंद

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 

सुरक्षा

                सुरक्षा 
आपने पढ़ा क्या आज का अखबार
कुछ दरिंदों ने ,एक पांच वर्ष की ,
अबोध बालिका के साथ,किया बलात्कार
हाँ,हाँ,पढ़ा तो है ,पर ये खबर पुरानी लगती है
आजकल तो  रोज अखबारों में ,
ऐसी  खबर छपती है
चलती बस या सड़कों पर दौड़ती कार
महिलाएं हो रही है बलात्कार की शिकार
और सत्ताधारी,जो भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हुए है
अपनी कुर्सी बचाने में जुटे हुए है
कहते है हम कर रहे है घटना की छानबीन
और इस दरमियान फिर  हो जाती है,
ऐसी ही घटनाएं दो तीन
ऐसी दरिंदगी के समाचारों से ,
हमारा तो कलेजा हिल जाता है
और टी .वी .चेनलो को दो दिन का मसाला,
और विपक्ष को सरकार को घेरने का ,
मुद्दा मिल जाता है 
सब अपनी अपनी राजनेतिक रोटियां सेकते है
और हम मूक दर्शक से देखते है 
अब तो इस माहोल से घृणा होने लगी है
इंसानियत चिन्दा चिन्दा होने लगी है
देश की महिलायें भले ही हो कितनी ही असुरक्षित 
उन्हें  इसकी कोई परवाह नहीं ,
चिंता  तो ये है कि उनकी कुर्सी रहे सुरक्षित

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, April 30, 2013

अब बुढ़ापा आ गया है

        अब बुढ़ापा आ गया है

फुदकती थी,चहकती थी ,गौरैया सी जो जवानी ,
                       आजकल वो धीरे धीरे ,लुप्त सी  होने लगी है
प्रभाकर से, प्रखर होकर,चमकते थे ,तेजमय थे ,
                        आई संध्या ,इस तरह से ,चमक अब खोने लगी है
'पियू '  पियू'कह मचलता था पपीहा देख पावस ,
                          इस तरह हो गया बेबस ,उड़ भी अब पाता नहीं है
भ्रमर मन,रस का पिपासु ,इस तरह बन गया साधु ,
                           देखता खिलती कली  को,मगर मंडराता  नहीं है
इस तरह हालात क्यों है ,शिथिल सा ये गात क्यों है ,
                            चाहता मन ,कर न पाता ,हुई इसी बात क्या है
देख कर यह परिवर्तन,बड़ा ही बेचैन  था मन,
                             समय ने हँस कर बताया ,अब बुढ़ापा आ गया है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

निद्रा के पंचांग

                 निद्रा के पंचांग
                            १
                         तन्द्रा
     एक तरफ दिल ये कहता है,सोना बहुत जरूरी
     लेकिन एक तरफ होती है ,जगने की मजबूरी
     जागे भी हम,ऊंघें भी हम,झपकी भी है आती
     ऐसी हालत जब होती है ,तन्द्रा है कहलाती
                              २
                          करवट  
       कभी सोचते है ,इधर आयेगी   वो 
        कभी सोचते है ,उधर   आयेगी  वो
        इधर ढूंढते है,उधर  ढूंढते  है
         हम नींद को हर तरफ ढूंढते है
        इन्ही उलझनों में पड़े जब भटकना
       इसको ही कहते है ,करवट बदलना
                               ३ 
                          खर्राटे
        मन में जो भी  दबी हुई , रहती  है  बातें
        कुछ मजबूरी वश जिनको हम कह ना पाते 
        जल्दी जल्दी  बाहर निकले ,जब सो जाते
         समझ में नहीं आते ,बन  जाते है खर्राटे
                               ४
                         सपने
         मन के अन्दर  की दबी हुई भावनायें
        या किस्से ,अनसुने ,अनकहे ,अनचाहे
         छिपा हुआ डर  और अनसुलझी समस्यायें
        अधूरे अरमान  ,सब,सपने बन कर आये
                               ५
                         नींद
          न इधर की खबर है
          न उधर की खबर है
          पड़ी शांत    काया ,
          बड़ी  बेखबर    है
          दबी बंद आँखों में ,
          सपने है रहते 
           रहे शांत तन मन ,
           उसे  नींद  कहते

मदन मोहन बाहेती'घोटू'