Friday, October 11, 2013

प्रणय निवेदन

     प्रणय निवेदन

मुझमे ना है लाग लगावट ,न ही बनावट ,लीपापोती ,
मुझको अपने मूल रूप में ,क्या स्वीकार करोगे प्रियतम 
मै भोलीभाली सी निश्छल ,मुझे न आती दुनियादारी ,
सच्चे मन से और लगन से ,दासी बन कर रहूँ तुम्हारी
मै जैसी हूँ,बस वैसी ही ,हो जाऊं तुम पर न्योछावर ,
पर तुम भी क्या सच्चे दिल से ,मुझसे प्यार करोगे प्रियतम
मुझको अपने मूल रूप में ,क्या स्वीकार करोगे प्रियतम
तुम कान्हा हो ,रास रचैया ,मै सीधी  सादी सी राधा
कहीं अचानक छोड़ न जाना ,प्यार हमारा रहे न आधा
मै गोकुल में ,अश्रु बहाती रहूँ,द्वारिकाधीश बने तुम ,
आठ आठ पटरानी  के संग,जा अभिसार करोगे प्रियतम
मुझको अपने मूल रूप में ,क्या स्वीकार करोगे प्रियतम
तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो ,ऊंचा  नाम,राम तुम्हारा
सीता वन वन ,भटकी संग संग ,तुमने घर से उसे निकाला
क्या उस पर विश्वास नहीं था ,या था प्यार तुम्हारा झूंटा ,
अगर अहिल्या बनी शिला मै ,क्या उद्धार करोगे प्रियतम
मुझको अपने मूल रूप में ,क्या स्वीकार करोगे प्रियतम

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  

सबसे अच्छा धन्धा

       सबसे अच्छा धन्धा

मेरे मन में ,एक बड़ा था ये  कन्फ्यूजन
आने वाले जीवन में लूं ,क्या प्रोफेशन
क्योंकि होने वाला हूँ मै शीध्र रिटायर
मुझमे ऊर्जा भरी ,अनुभव का मै सागर
बाद रिटायर्मेंट ,काम में क्या अपनाऊं
नेता बनूँ,या कि फिर मै बाबा बन जाऊं
क्योंकि इन दोनों ही धंधों में इज्जत है
खूब कमाई होती,दौलत ही दौलत  है
जनता अपने सर ,आँखों पर तुम्हे बिठाती
एक बार जो चल निकला ,चांदी ही चांदी
ये दोनों ही ,बड़े आदमी  कहलाते है
भक्तों ,चमचों से हरदम पूजे जाते है
आवश्यक ,होना जुबान में जोर चाहिए
नाटकबाजी आती ,करना    शोर चाहिए
वैसे होता  मुश्किल है नेता बन पाना
जगह जगह होर्डिंग लगवा कर नाम जमाना  
हाई कमान के थोड़े चरण चाटने होंगे
और मीडिया को उपहार बांटने  होंगे
एक बार टी वी पेपर में  अगर छाओगे
तो चुनाव में टिकिट शीध्र ही पा जाओगे 
जीते अगर चुनाव ,समझ लो,लगी लाटरी
पाँचों उंगली घी में है और किस्मत संवरी
जोड़ तोड़ कर एक  बार मंत्री पद पालो
एक झटके में ,कई करोड़ों ,आप कमालो
भाई,बंधू को ,ठेका दिलवा ,करो तरक्की
पांच साल में पांच पुश्त  की,दौलत पक्की
लेकिन थोडा मुश्किल है ये नेता बनना
एक बार हारे चुनाव, कोई  पूछे  ना
इससे ज्यादा अच्छा ,संत महात्मा बनना
क्योंकि इस धंधे में लगता धन ना 
नहीं फिटकड़ी,हींग ,रंग भी आये चोखा
ज्ञान चाहिए थोडा वेद ,और शास्त्रों का  
थोड़े भजन कीर्तन करना ,गाना गाना
चंद चुटकुले ,किस्से कहना ,शेर सुनाना
थोड़े भगवा कपडे ,थोड़े बाल बड़े  हो
कुछ ऐसे चेला चेली ,गुणगान करें जो
खुल्ले हाथों ,आशीर्वाद बांटने होंगे
उनमे ,कम से कम आधे तो सच ही होंगे
जिसका काम बनेगा ,वो जब गुण गायेगा
सात आठ वो नए भक्त लेकर आयेगा
प्रवचन सुनने फिर भक्तों की भीड़ लगेगी
तो समझो तुम्हारी गाडी  चल निकलेगी
बढ़ती जायेगी फिर जयजयकार ,हमेशा
खूब चढ़ावा  आयेगा,  बरसेगा  पैसा
अगर आचरण अपना सात्विक रख पाओगे
निज भक्तों से जीवन भर पूजे जाओगे
इन सारी बातों को मैंने परखा ,तोला
किया विवेचन मैंने तो मेरा मन बोला
राजनीति का धंधा होता जाता रिस्की
वही पनप पाता ,अच्छी हो 'बेकिंग'जिसकी
पर मुझ सा ,विद्वान्,अनुभवी ,अच्छा वक्ता
बाबा बन कर पा सकता है ,शीध्र सफलता
सबसे अच्छा ,'सेफ',अगर धंधा है चुनना
तो फिर नेता नहीं,ठीक है  बाबा   बनना
क्योंकि बाबाओं से डरते सब नेता गण
'बाबागिरी'ही है सबसे अच्छा प्रोफेशन

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 
 

Thursday, October 10, 2013

विनती प्रभु से

         विनती प्रभु से

मुझको बस इतना छोटा सा वर दो भगवन ,
सच्चे दिल से ,दीन  दुखी की मदद कर सकूं
जिनके मन में एकाकीपन,थकन ,दहन हो,
दो लम्हे भी ,अगर ख़ुशी के ,वहां भर सकूं
सबके अपने अपने दुःख है ,पीडायें है
सुखी न कोइ ,सबकी अपनी ,चिंतायें है
कोई रुग्ण बदन है तो कोई निर्धन है,
खडी मुसीबत ,रहती हरदम ,मुंह बायें  है
हे प्रभु,मुझको उनकी सेवा का अवसर दो,
तृप्ति मिलेगी ,थोड़ी पीड़ा ,अगर हर सकूं
जिनके मन में ,एकाकी पन  ,थकन,दहन हो,
दो लम्हे भी ,अगर खुशी के,वहां भर सकूं
कोई बेटे,पोतों वाला ,मगर अकेला
कोई निर्बल,वृद्ध ,रोज दुःख ,करता झेला
लेकिन स्वाभिमान का जज्बा मन में भर के ,
विपदाओं से ,जूझां करता ,वो अलबेला
उसे सहारा दूं ,मै बन कर उसकी लाठी ,
उसके अंधियारे जीवन में ,ज्योत भर सकूं
जिसके मन में एकाकीपन,थकन,दहन हो,
दो लम्हे भी अगर खुशी के ,वहां भर सकूं

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Tuesday, October 8, 2013

ऊंचे लोग-नीची हरकत


           ऊंचे लोग-नीची हरकत

यहाँ सब है केंकड़े ही केंकड़े ,
एक दूजे के है सब पीछे पड़े
कोई भी जब निकलने ऊपर चढ़ा ,
                दूसरों ने टांग उसकी खींच ली
किसी ने की अगर थोड़ी गलतियाँ
दूसरों ने बवंडर जम  कर किया
दूसरों की गलती सब आई नज़र ,
                   अपनों की गलती पे आँखे मींच ली
मिला मौका लेने का,जम कर लिया
भरी दोनों हाथ अपनी झोलियाँ
और अवसर देने का जब आया तो,
                     उनने कस कर,अपनी मुट्ठी भींच ली
साम्यता का गीत गाते थे बड़ा
मगर जब भी पानी का टोटा पड़ा
लोग प्यासे तरस कर मरते रहे ,
                     मगर उनने अपनी बगिया सींच ली
हुआ जब उपहास तो आ क्रोध में
इस तरह से वो जले प्रतिशोध में
द्रोपदी की तरह साडी खींच कर,
                      उसकी इज्जत इनने सबके बीच ली
उनके आशीर्वाद से होकर खड़े ,
मुश्किलों से ही थे हम ऊपर चढ़े
ये तरक्की उनको यूं चुभने लगी ,
                       उनने झट नीचे से सीढ़ी खींच ली

मदन मोहन बाहेती'घोटू'     

Monday, October 7, 2013

शिकायत पत्नी की -जबाब पति का

   शिकायत पत्नी की -जबाब पति का

पत्नी की शिकायत 
 
दुबली पतली मै कनक की थी छड़ी ,
                      क्या थी मै और आपने क्या कर दिया
प्यार कुछ अपना दिखाया इस तरह ,
                       देखो मुझको कितना मोटा कर दिया
       रोज अपने प्यार का टोनिक पिला
        बदन मेरा कर दिया है थुलथुला
        मांस देखो कितना तन पर चढ़ गया 
       वजन मेरा देखो कितना बढ़  गया
       अंग सारे इस कदर है बढ़ गए
        सभी कपडे मेरे छोटे पड़ गये
        कभी रबडी और जलेबी खिलाई
        तली चीजें और मख्खन मलाई
       प्यार का एसा चलाया सिलसिला
       फूल मेरा तन गया ,अच्छा भला
और मैंने शिकायत जब भी करी ,
                      प्यार से बस एक चुम्बन जड़ दिया
दुबली पतली मै कनक की थी छड़ी ,
                       क्या थी मै और आपने क्या कर दिया

जबाब पति का -

कौन कहता है की तुम मोटी  हुई हो ,
                        सिर्फ यह तो तुम्हारे मन का भरम है

  आई थी,सकुचाई सी दुल्हन बने जब ,
                          उस समय तुम एक थी कच्ची कली  सी
मुख म्रदुल था ,बड़ा भोलापन समेटे ,
                             और चितवन भी बड़ी चंचल भली थी
किन्तु मेरे प्यार का आहार पाकर ,
                               अब विकस पाया तुम्हारा तन सलोना
गाल भी फूले हुए लगते भले है ,
                                गात का गदरा गया है हरेक कोना
तो कली से फूल बन कर अब खिली हो ,
                                 अब निखर  पाया तुम्हारा रूप प्यारा
अब कली वाली चुभन चुभती नहीं है ,
                                  अब हुआ कोमल बदन ,कंचन तुम्हारा
बढ़ गया यदि भार थोडा नितंबों का,
                                    रूप निखरा है भली सेहत हुइ है  
पड़  गए छोटे अगर कपडे पुराने ,
                                    है खुशी मेरी सफल चाहत हुई है 
और मोटापा समझती हो इसे तुम ,
                                    देख कर के आइना आती शरम है
कौन कहता  है कि तुम मोटी हुई हो,
                                   सिर्फ यह तो तुम्हारे मन का बहम है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'     


Sunday, October 6, 2013

हुआ करता काँटों में भी दिल तो है

  हुआ करता काँटों में भी दिल तो है

भावनाएं सिर्फ फूलों में नहीं ,
                    हुआ करता काँटों में भी दिल तो है
जरूरी ना प्यार ही हरदम मिले ,
                     जिन्दगी में ,नफरतें ,मुश्किल तो है
देवता गण ,सिर्फ आशीर्वाद ना ,
                      श्राप भी दे देते  कितनी  बार  है
पवन शीतल ,जाती बन तूफ़ान है ,
                       वरुण लाता क़यामत ,बन बाढ है ,
 कोप से  करते सभी को राख है ,
                        भड़क यदि जाते है अग्नी देवता
छुपा हर इंसान में एक राक्षस ,
                         नहीं लग पाता मगर इसका पता
राक्षस भी भक्त बन भगवान के,
                          कठिन करते तपस्या और ध्यान है
बदल जाता उनका सब व्यवहार है ,
                           जैसे ही  मिलता उन्हें  वरदान  है
भस्मासुर की तरह जाते पीछे पड ,
                             दाता के,जिनने था उनको वर दिया
निकलता मतलब तो देतें है भुला ,
                               बड़े नाशुक्रे ,न कहते  शुक्रिया
कौन कैसा दिखता है ,दिल में है क्या ,
                                 बड़ा ही दुरूह है पहचानना
कौन कब व्यवहार कैसा करेगा ,
                                  बड़ा मुश्किल होता है  यह जानना
   
मदन मोहन बाहेती'घोटू'   

पत्थर के भी दिल होता है

             पत्थर के भी दिल होता  है

दिखती  काली  घनघोर घटा ,पर उसमे होता शीतल जल
बाहर से सख्त मगर अन्दर ,होता है स्वाद भरा नारियल
मिलती गुणकारी शिलाजीत ,पत्थर पसीजते है जब जब
कांटे तन  पर,पर  तना चीर ,देते   तरु  गोंद , शक्तिवर्धक
पत्थर दिल लोगों के मन में ,भी रहता छुप,दब ,दया ,रहम
दुर्दान्त दस्यु भी बाल्मीकि  बन कर लिख देते रामायण
कोई कितना भी सख्त ह्रदय ,दिखता हो पर उसके अन्दर
कोमलता होती छुपी हुई ,देखो टटोल कर उर अंतर
जो विषम परिस्तिथी के कारण ,पाषाण ह्रदय जा बनता है
पर  उसे प्रेम की गरमी से ही पिघलाया  जा  सकता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'