Friday, December 6, 2013

खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचेगी


   खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचेगी

चार राज्य में हार ,सभी को कोसेगी
अब खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचेगी
कई करोड़ों रुपिया जनता का लूटा
हुई जागरूक जनता ,जब भाण्डा फूटा
अपनी छवि साफ़ दिखलाने जनता को,
पड़ विपक्ष के पीछे ,उसे  दबोचेगी
अब खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचेगी
कर कितने ही घोटाले ,बदनाम हुए
पांच साल में कितने काले काम हुए
काला मुंह है और हाथ भी काले है,
इतनी कालिख लगी ,कहाँ तक पोंछेगी
अब खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचेगी
दूध मलाई खाई,हजम किया सबको
नौ सौ चूहे मार चली है अब हज़ को
या फिर ये है नाटक उसका कोई नया ,
फिर से मोटा चूहा कोई दबोचेगी
अब खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचेगी
भ्रष्टाचारी भांडा सदा  फूटता है
बार बार तो छींका नहीं टूटता है
बदकिस्मत थी,अबके छींका ना टूटा ,
जोड़ तोड़ कर क्या छींके तक पहुंचेगी
अब खिसियानी बिल्ली खम्बा नाचेगी
खेल पुराना है ये चूहे बिल्ली का
कौन बनेगा अब के राजा दिल्ली का
आदत बिगड़ी  दूध ,मलाई खाने  की ,
खाने का कुछ नया तरीका खोजेगी
अब खिसियानी बिल्ली खम्बा नोचेगी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, December 5, 2013

शब्दों का जमावड़ा

      शब्दों का जमावड़ा

भावों को प्रकट करता ,शब्दों का जमावड़ा
कविता के रूप में है सबके  सामने  खड़ा
कह देता गहरी बात ये थोड़े से शब्द में ,
लगता सुहाना है ये अलंकार से जड़ा
दो पंक्तियों के दोहे में रहीम ने कहा ,
रसखान ने रस से है भरा ,अपने छंद में
मीरा ने भजन,सूर ने पद में इसे कहा , ,
तुलसी ने समेटा इसे ,मानस के ग्रन्थ में
ग़ालिब ने ग़ज़ल,मीर  ने शेरों  में उकेरा ,
बिलकुल सपाट शब्दों में बोला कबीर ने
केशव ने गहरी बात कही अपने ढंग से,
बिहारी ने सतसैया के ,नाविक के तीर में
वेदों में संजोया था इसे वेद  व्यास ने,
 गीता में बात ज्ञान की है श्लोक में कही,
 कोई ने यमक में कहा ,कोई ने श्लेष में ,
हर रूप में पर ज्ञान की गंगा सदा बही
कोई ने विरह गीत में आंसू से भिगोया,
कोई ने इसे रंग दिया होली के रंग में
कोई ने इसे व्यंग के तीरों सा चुभोया ,
कोई ने भरा वीर रस ,मैदाने जंग में 
भावों का झरना जब झरा ,शब्दों में स्वर बहे,
प्रेमी का प्रेम उभरा है गीतों में प्यार के
कुछ हास और परिहास में ,कुछ लोकगीत में,
कुछ सज के सुरों में किसी नगमा निगार के
गीतों का रूप धर के जब भी गाया  गया है ,
लोगों के मन को भाया है,जुबान पर चढ़ा
जिस पर भी ,जब भी ,सरस्वती जी कृपा हुई,
शब्दों की माला गूंथ कर,माता पे दी चढ़ा
  भावों को प्रकट करता ,शब्दों का जमावड़ा
कविता के रूप में है सबके सामने खड़ा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

मुफतखोर

    मुफतखोर

कुदरत ने है बिगाड़ दी,इंसां की आदतें
फ़ोकट में बाँट बाँट कर,सारी इनायतें
सूरज ने खुल्ले हाथ से बांटी है रोशनी
चन्दा ने लुटा रातों को ,जी भर के चांदनी
सर्दी में गरम धूप हमको मुफ्त में मिली
गर्मी में ठंडी हवाओं से ताज़गी मिली
नदियों से,तालाबों से है पीने को जल मिला
कितना ही कुछ जो हमको मिला,मुफ्त में मिला
हम मुफतखोर बन गये और बिगड़ी आदतें
फ़ोकट में थी जो हमको मिली ,ये इनायतें

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Wednesday, December 4, 2013

गोरों की कदर

   गोरों की कदर

देखो जिधर ,उधर दुनिया में,श्वेत रंग की बहुत कदर  है
गौर करोगे तो पाओगे  ,गोरेपन में  बहुत असर   है
 सूरज श्वेत ,श्वेत है चन्दा ,करते जो दुनिया को रोशन
चन्दा का टुकड़ा कहलाता है गौरी का गोरा  आनन
दूध,दही,घी और शर्करा ,होता सबका श्वेत रंग है
सदा चढ़ाये जाते प्रभु को,पंचामृत के चार अंग है
पूजन हो या हवन सभी में ,आता काम,श्वेत है चांवल
मस्तक पर रोली के टीके में भी शोभा पाता  चांवल
चांवल जैसी कदर न पाता ,गेंहू भी तो है अक्षत अन्न 
 दीपक तले बिछाया जाता, उसको जब होता है पूजन 
गोरों का ही राज चल रहा ,छाये गोरे  दुनिया भर है
देखो जिधर उधर दुनिया में ,श्वेत रंग की बहुत कदर है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

दलिया बना दिया

        दलिया बना दिया

मै गेहुआं सा ,गेंहूं के दाने की तरह था,
                 तुम चांवलों  सी गौरवर्णी और छरहरी
देखा जो तुमको ,मुझको ,तुमसे प्यार हो गया ,
                  ऐसा लगा कि मिल गई है सपनो की परी
तुम तो उमर के साथ ,उबल कर बड़ी हुई ,
                  आया निखार ऐसा कि रंगत बदल गयी
खुशबू  से भरा,नर्म प्यारा , जिस्म जब खिला ,
                   मुझको लगा कि मेरी तो किस्मत बदल गयी
कह कह के निठल्ला और पीछे पड़ के रात दिन,
                    तुमने बदल के मेरा क्या हुलिया बना दिया
पुचकार कर के प्यार से पीसा है इस तरह ,
                    आटा बना दिया कभी  दलिया  बना दिया

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'            

घोटू का ओपिनियन पोल

      घोटू का ओपिनियन पोल

 

                देहली

अरविन्द आपका है ,कमल हर्ष बढ़ाता ,

                 शीला पुरानी हो गयी पर शीलवान है

लुटियन की इस दिल्ली को तो लूटा है कई ने ,

                  अब देखो किसके हाथ में आती कमान है

आया जो अगर फैसला,जनता का लटकता ,

                   अरविन्द तो कमल है,कमल साथ रहेगा ,

क्या होगी जोड़ तोड़ सियासत के खेल में,

                    ये सोच सोच करके ,जनता परेशान है

 

              अन्य राज्य

एम पी में महाकाल है और ओंकार है,

                            शिव का रहा है,शिवजी का ही राज रहेगा

छत्तीसगढ़ में फिर से रमन करेंगे रमन,

                            और मेघालय के सर पे सदा हाथ रहेगा

मुश्किल है फिर से लौटना ,गहलोत जी का है,

                             हालत ऐसे दिख रहे है,राजस्थान में ,

लगता है इस वसुंधरा में ,कमल खिलेंगे,

                             जादू नमो का ,लगता है,आबाद रहेगा

 

घोटू   

Monday, December 2, 2013

सूखे पत्ते - अंगूठी और दस्ताने

         सूखे पत्ते

रिश्ता हमारा बहुत पुराना है पेड़ से ,
               कोंपल से फूटे,धीरे धीरे  पूरे खिल गये
नाचे हवा के संग बहुत ,जब जवान थे ,
                आया बुढ़ापा ,पीले पड़े,और गिर गये
हम सूखे हुए पत्ते है अब इतना समझ लो ,
                 ढंग से जो लोगे काम तो हम खाद बनेंगे
हमको जलाया गलती से भी तुमने जो अगर ,
                   जंगल को जला देने वाली आग बनेंगे

              अंगूठी और दस्ताने
 
जबसे चढ़ी है उँगली पे हीरे की अंगूठी,
                        इतरा रही नसीब पर है सारी उँगलियाँ
दस्ताना मुस्कराया ,बोला जब मै चढूंगा ,
                        ना तो दिखेगी अंगूठी और ना ही उँगलियाँ 

घोटू