Monday, December 16, 2013

फ्लेट संस्कृती

           फ्लेट संस्कृती

कोई को किसी की नहीं परवाह यहाँ पर ,
वो खुश हैं अपने फ्लेट में ,तुम अपने फ्लेट  में
होती है 'हाई 'हल्लो'जब मिल जाते लिफ्ट में ,
पर दोस्ती होती नहीं ,पल भर की भेट में
कल्चर गया ,गली का,मोहल्ले ,पड़ोस का,
रहते है व्यस्त टी वी में और इंटरनेट  में
सब अपनी अपनी खा रहे,मस्ती में जी रहे ,
किसको पडी है झाँके जो,औरों की प्लेट में

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

सर्दी में -सवेरे सवेरे

 सर्दी में -सवेरे सवेरे

कहा बीबी ने ये डीयर ,
बड़ी ही सर्दी है बाहर ,
रहो दुबके यूं ही अंदर ,रजाई ये सुहाती है
ये मौसम सर्द है आया
बड़ा कोहरा ,घना छाया
कि बाहर  देखो बर्फानी ,हवायें सनसनाती है
कहा मन ने यूं भर आलस
आज सोये रहो तुम बस
नहीं उठने का जी करता ,आँख भी खुल न पाती है
भले मन कितना ही चाहे ,
मगर हम रुक नहीं पाये
भली सेहत की चाहत ही,सवेरे नित  जगाती  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

कोंग्रेस -कथा

    कोंग्रेस  -कथा

पहले थी 'जोड़ी बैल की'फिर ' गाय और बछड़ा',
फिर 'हाथ',बदले रंग कितने कांग्रेस  ने
नाना से नातियों के युग में आते आते ही ,
थी जो रईस ,अब है भिखारी के भेस में
आयी अर्श से फर्श तक ,इस अंतराल में,
बेडा किया है गर्क,मचा लूट देश में
खा खा के मोटी हो गयी है दौड़ ना पाती ,
कितने ही दल निकल गए है आगे रेस में

घोटू

शादी -दो प्रतिक्रियायें

       शादी -दो प्रतिक्रियायें

                     १
था पाला पोसा प्यार से और बेटे को बड़ा किया
की शादी उसकी ,बहू लाये,उसका घर बसा दिया
अपना घर उजाड़ने की ये तो शुरुवात थी ,
चार दिन की इस खुशी में ,हमने या भुला दिया
                    २
वो कल तलक थी जो बहू ,अब सास बन बदल गयी
 ये खेल चूहे बिल्ली का है, जिंदगी  निकल  गयी
ये सास क्या ये बहू क्या ,है सिर्फ इतना फर्क कि,
जमाये रौब ,सास वो,और वो बहू ,जो डर गयी

घोटू

Sunday, December 15, 2013

आप का कनफफ्यूजन

   आप का कनफफ्यूजन

किसी भूखे के आगे जो ,तुम छप्पन भोग गर रखदो ,
देख कर इतनी मिठाई ,बड़ा पगला वो है जाता
मै ये खाऊं या वो खाऊं ,उसे होजाता कन्फ्यूजन ,
इसी चक्कर में बेचारा ,नहीं कुछ भी है खा पाता
किसी मुफलिस की कोई दिन ,अगर जो लॉटरी खुलती,
करे क्या इतनी दौलत का ,समझ में है नहीं आता
यही है हाल अरविंद का,आप पार्टी का बहुमत है,
दे रही साथ कोंग्रेस पर ,राज करने में घबराता

घोटू

Saturday, December 14, 2013

बेचारा आदमी

         बेचारा आदमी

कितना भला ,मासूम सा है प्यारा आदमी
कहता है कौन ,होता है बेचारा    आदमी
उसको दुधारू जीव समझ बड़े प्यार से ,
डाले है बीबी ,और  खाता ,चारा आदमी
उसकी कदर होती है घर में सिर्फ इसलिए ,
पैसा कमाके लाता ,ढेर सारा  आदमी
करती है ऐश बीबियाँ ,और काम में जुटा ,
बन कोल्हू  बैल,घूमता ,दिन सारा आदमी
ऐसा क्या लॉलीपॉप चुसाती है बीबियाँ ,
लालच में जिसके फिरता मारा मारा आदमी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, December 13, 2013

लेट लतीफ़

        लेट लतीफ़

बचपन के कच्चे दांत तो होते है दूध के ,
                    जो बाद में आते है वो टिकाते बहुत है
आते उभार कुछ है जब आती है जवानी ,
                     सीने पे सज के सब पे सितम ढाते बहुत है
कुछ लोगों की आदत है कि वो देर से आते ,
                      सबको ही इन्तजार वो कराते  बहुत है
खाने में सबके बाद में आती है'स्वीट डिश',
                       मीठे के प्रेमी 'घोटू'है,वो खाते बहुत है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'