Monday, July 21, 2014

मिले है ऐसे प्रीतमजी

               मिले है ऐसे प्रीतमजी

बताएं क्या तुम्हे हम जी
मिले है ऐसे प्रीतम  जी
       पड़े रहते है ये घर पर
        करें ना काम रत्ती भर
        कभी ये लाओ,वो लाओ,
        चलाते हुक्महै दिन भर
तंग हो जाते है हम जी
मिले है ऐसे प्रीतम जी
      दिखाते है कभी पिक्चर
      कराते है डिनर बाहर
      तबियत के रंगीले है,
      सताते है हमें  जी भर
नहीं कोई से है कम जी
मिले है ऐसे प्रीतम जी
       प्यार पर जब दिखाते है
       बनाते   खूब    बातें है
        रात को करते है वादे,
        सवेरे  भूल  जाते है 
निकला करते है दम जी
मिले है ऐसे प्रीतम जी

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

पुराने खिलाड़ी

            पुराने खिलाड़ी

न तो देखो धुला कुरता ,फटी बनियान मत देखो
          धड़कता इनके पीछे जो, दीवाना सा है दिल देखो
सफेदी देख कर सर की ,नहीं बिदकाओ  अपना मुंह,
            पुराने हम खलाड़ी है ,कभी हम से तो मिल देखो
       पुराने स्वाद चावल है ,अनुभव का खजाना है 
        चखोगे ,याद रख्खोगे ,माल परखा ,पुराना है
 नए नौ दिन,पुराने सौ दिनों तक काम आते है ,
       इस भँवरे का दिवानापन,कभी फूलों सा खिल देखो                 
'घोटू '

उम्र है मेरी तिहत्तर

       उम्र है  मेरी तिहत्तर

जिंदगानी के सफर में ,मुश्किलों से रहा लड़ता
आ गया इस मोड़ पर हूँ,कभी गिरता ,कभी पड़ता
ना किया विश्राम कोई,और रुका ना ,कहीं थक कर
                                           उम्र है मेरी तिहत्तर
जवानी  ने बिदा ले ली ,भले कुछ  मुरझा रहा तन
जोश और जज्बा पुराना ,है मगर अब तलक कायम
आधा खाली दिख रहा पर,भरा है आधा कनस्तर
                                           उम्र है मेरी तिहत्तर  
भले ही सर पर हमारे ,सफेदी सी छा रही  है
पर हमारे हौंसले की ,बुलंदी वो की  वो ही है
दीवारें मजबूत अब भी ,गिर रहा चाहे पलस्तर
                                       उम्र मेरी है तिहत्तर  
छाँव दी कितने पथिक को ,था घना मैं जब तरुवर
दिया पंछी को बसेरा और बहाई हवा शीतल
फल उन्हें भी खिलाएं है,मारा जिनने ,फेंक पत्थर
                                           उम्र मेरी है तिहत्तर
किसी से शिकवा न कोई ,ना किसी को कोसता हूँ
न तो कल को भूल पाता और न कल की सोचता हूँ
पा लिया मैंने बहुत कुछ,जैसा था मेरा मुकद्दर
                                      उम्र मेरी है तिहत्तर
बेसुरी सी हो रही है  उमर के  संग  बांसुरी है
लग गयी बीमारियां कुछ,किन्तु हालत ना बुरी है
ज़रा ब्लडप्रेशर बढ़ा है,खून में है अधिक शक्कर
                                         उम्र है मेरी तिहत्तर
कठिन पथ है ,राह में कुछ ,दिक्कतें तो आ रही है 
चाल है मंथर नदी की ,मगर बहती जा रही है
 कौन जाने कब मिलेगा ,दूर है कितना समंदर
                                        उम्र है मेरी तिहत्तर

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, July 19, 2014

बदपरहेजी

         बदपरहेजी

ये सच है मैं तुम्हारा हूँ,तुम्हारा ही रहूंगा पर,
   हुस्न बिखरा हुआ सब ओर है,दीदार करने दो
निमंत्रण दे रहे है फूल इतने,बाग़ में खिलते ,
    ज़रा सी छूट दे दो ,मुझको इनसे प्यार करने दो
यूं तो अक्सर ही तुम इंकार,मुझसे करती रहती हो,
   करोगी आज जो इंकार,  मानूंगा न मैं  हरगिज
रोज ही दाल रोटी, घर की खाता ,जैसी भी मिलती,
     परांठा मिल रहा है,खाऊंगा,मुझको चढ़ी है जिद
मुझे मधुमेह है,मिठाई पर पाबंदियां है पर,
      कब,कहाँ इसतरह मधु के छलकते जाम मिलते है
चार दिन ,चार गोली ज्यादा खा लूँगा दवाई की,
       हमेशा चूसने को कब, दशहरी  आम मिलते है
नहीं रोको तुम मुझे बस थोड़ी  बदपरहेजी करने दो ,
    बड़ी किस्मत से मिल पाते है,ये इतने हसीं  मौके
देखलो फिर बगावत पर ,उतर आऊंगा वर्ना मै ,
    आज पर रुक नहीं सकता ,भले कितना ,कोई रोके

घोटू 

संवाद -बादल से

          संवाद -बादल से

मुझसे कल पूछा बादल ने ,बताओ मैं कहाँ बरसूँ
              चाहते सब है बरसूँ मैं ,पर छतरी तान लेते है
सिर्फ धरती है जो मुझको,समा लेती  सीने में ,
             और बाकी सब बहा देते ,पराया मान लेते है               
बहुत जी चाहता मेरा ,मिलूं आकर के धरती से,
            हवाएँ आवारा  लेकिन मुझे अक्सर उडा लेती ,
सरोवर पीते मेरा जल ,मगर नदियां बहा देती ,
             समंदर भी उडा  देते,नहीं अहसान  लेते  है

घोटू
           सोचो -समझो -करो

आज जो काम करना है,उसे कल पर नहीं टालो ,
             वक़्त जो बीत जाता है,नहीं आता दोबारा है
बड़ा हो या की छोटा हो,मगर ये बात पक्की है,
             हरेक दरिया  का होता है ,कहीं पर तो किनारा है
रात को आते जो सपने ,वो अपने आप आते है ,
             जो होते महत्वाकांक्षी ,वो दिन में देखते सपने
ये क्यों होता बुढ़ापे में,भूल जाते है अपने ही,
              मगर ऐसा भी होता है,पराये जाते हो अपने
हरेक मौसम का अपना ही ,अलग मिजाज होता है ,
              गरम है तो कभी ठंडा ,कभी बरसात होती है
उजेला हो जो सूरज का,तो हम कहते है क़ि दिन है,
               मगर दिन भी बुरे,  अच्छे ,ये कैसी बात होती है ,
मुझे कल पूछा बादल ने ,बताओ मैं कहाँ बरसूँ,
              चाहते सब है बरसूँ मैं ,पर छतरी तान लेते है
बड़े नादान है हम सब,दिया है जिसने ये सब कुछ  ,
               उसी को कुछ चढ़ा सिक्के ,ये कहते दान देते है
आदमी कितना मूरख है,खबर जिसको नहीं कल की,
                  बनाता जिंदगी भर की,हज़ारों योजनाएं वो
व्यर्थ ही कल की चिंता में ,हुआ जाता है वो बेकल,
                  भरोसा कौनसा कल का,कल तलक जी भी पाये वो
व्यर्थ काहे का रोना है ,जो होना है सो होना है,
                  मुसीबत ,आना,आएगी ,हंसो या रो के तुम झेलो
करो बस आज की परवाह,सामने जो खड़ा हाज़िर ,
                  छोड़ दो कल की चिंताएं,मज़ा तुम आज का ले लो
 अरे देखो नदी को ही,जो कल कल करती बहती हैं ,
                  यही आशा लिए मन में,मिलेगी कल समंदर से
लगन से जो चलेंगें हम,ठिकाना मिल ही जाएगा,
                   नहीं कुछ भी है नामुमकिन,अगर हो जोश अंदर से
थी पतली धार उदगम पर,रही मिलती वो औरों से ,
                तभी सागर पहुँचने तक,पाट  हो जाता चौड़ा है
इसलिए सबको अपनाओ,सभी के साथ मिल जाओ,
                बहुत हो जाता है मिल कर,कोई कितना भी थोड़ा हो
हवा तो बस हवा ही है,हमेशा बहती रहती है,
                मगर जब सांस  बनती  है,चलाती जिंदगानी है
हो जैसी भी परिस्तिथियाँ , उसी अनुसार चलना है,
                 किसी भी पात्र में उसके मुताबिक़ ,ढलता पानी है
सुबह टी वी में ज्योतिषी ,ग्रहों की चाल बतलाता ,
               फलाँ है राशियाँ जिनकी ,मिलेगी उनको खुशखबरी
खबर जब है नहीं हमको,कोई भी अगले एक पल की,
               आज हम है  और ज़िंदा है ,बड़ी सबसे ये खुशखबरी
सोच कर ये कि कल पकवान ,मिल सकते है खाने को,
                आज हम भूखे रहने की ,सजा भुगते ,भला क्यों कर
पता है पेट भरना है ,हमें जब दाल रोटी से ,
                 समझ पकवान उनको ही,उठाएँ ना,मज़ा क्यों कर
  तुम्हे लगते है वो सुन्दर ,उन्हें लगे हो तुम सुन्दर ,
                मगर ये सारी सुंदरता ,नज़र का खेल  है केवल
केरियां कच्ची, खट्टी जो ,समय के संग पकेगी जब,
                रसीली ,स्वाद  और  मीठी ,लगेगी आम वो बन कर
हवा के साथ चलने पर ,हवा है पीठ थपकाती ,
                हवा के सामने चलते,हवा भरती है बाहों में
दिक्कते तो हमेशा हैं,मगर जो तुम में जज्बा है ,
              मिलेंगी मंजिलें ,अड़चन ,भले कितनी हो राहों में

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, July 18, 2014

खाते पीते लोग

          खाते पीते लोग

भूख अपनी मिटाने में,
रहे हम व्यस्त  खाने में
बताएं आपको अब क्या,कि हम क्या क्या नहीं खाये
भाव हमने  बहुत खाये
घाव हमने  बहुत  खाये
वक़्त की मार जब खाई ,तब कहीं जा संभल पाये
रिश्वतें भी बहुत खायी
कमीशन भी बहुत खाया ,
बड़े ही खानेपीने वाले,ऑफिसर थे कहलाये 
गालियां खाई लोगों से,
और खाये बहुत  धोखे ,
ठोकरें खा के दर दर की ,मुकाम पे हम पहुँच पाये
मन नहीं लगता था घर में
पड़े उल्फत के चक्कर में ,
पटाने उनको,उनके घर के चक्कर भी बहुत खाये
मिली बस दाल रोटी घर
दावतें खाई,जा होटल,
मिठाई खूब खाई ,चटपटी हम ,चाट चटखाये
डाट साहब की दफ्तर में
और  घरवाली की घर में
खूब खाई ,तभी तो हम,ढीट है इतने बन  पाये
बुढ़ापे में है ये आलम
दवाई खा रहे है हम
हो गया है हमें अरसा ,मिठाई कोई भी खाये
कमाया कम,अधिक खाया
मगर वो पच नहीं पाया
माल चोरी का मोरी में ,बहा  कैसे ,क्या बतलायें
इधर भी जा ,उधर भी जा
सारी दुनिया का  चक्कर खा
गये थे घर से हम बुद्धू ,लौट बुद्धू ही घर आये

मदन मोहन बाहेती'घोटू'