Friday, September 26, 2014

महाराष्ट्र के महत्वकांक्षी

       महाराष्ट्र के महत्वकांक्षी

महत्वकांक्षाओं को ,
अगर दबाया  नहीं जाए  थोड़ा 
तो बन  जाती है,
 जीवन की राह का रोड़ा
रेस में दौड़ना चाह रहा था,
तांगे वाले का घोडा
और इसी चक्कर में ,
उसने ,उससे  गठबंधन तोडा
अक्सर  इस तरह के ,
कई  वाकये नज़र आते है
लोग न इधर के रहते है,
न उधर के हो पाते है
पूरी  पाने की चाह  में,
अपनी आधी  भी  गमाते है
चौबेजी ,छब्बे बनने के चक्कर में ,
दुबे बन कर रह जाते है
घोटू '

महाराष्ट्र का महाभारत

         महाराष्ट्र का महाभारत

                      १
एक तरफ तो पहुँच गया है,यान हमारा मंगल में
एक तरफ हम उलझ रहे हैं,महाराष्ट्र के दंगल में
पदलिप्सा ,अच्छे अच्छों की,मति भ्रस्ट कर देती है ,
और बिचारे फंस जाते है,विपदाओं के  जंगल में
                          २    
एक तरफ बेटा कहता है,पापाजी सी एम  बनो,
          और दूसरी तरफ  भाई ही बढ़ कर राह रोकता है
साथ पुराने साथी का है जिस दिन से हमने छोड़ा,
         अब तो जिसको मिलता मौका ,आकर हमें टोकता है
 जब भी महत्वकांक्षाएं ,होती है हावी हक़ीक़त पर,
         लेते लोग इस तरह निर्णय ,सुन कर हरेक चौंकता है
एकलव्य के तीर हमेशा ,उसका मुंह  बंद कर देते,
          जरुरत से ज्यादा बेमौके,जब भी कोई भोंकता है 
 'घोटू '

Thursday, September 25, 2014

आशिक़ की आरजू

          आशिक़ की आरजू

रात को आते हो अक्सर,ख्वाबगाह में मेरी ,
        एक झलक अपनी दिखाते ,और जाते हो चले
हमने बोला,छोड़ दो यूं ,आना जाना ख्वाब में ,
        बहुत है हमको सताते ,इस तरह के सिलसिले
ये भी कोई बात है ,जब बंद आँखें हमारी ,
       तब ही मिल पाता हमें है,आपका दीदार  है
खोलते है  आँख जब हम  ,नज़र तुम आते नहीं,
             बीच में मेरे तुम्हारे ,पलक की दीवार है
ना तो तुमको छू सकें ना भर सकें आगोश में,
        दूर मुझसे इतने रहते, नज़र आते पास हो      
भला ये भी इश्क़ करने का तरीका है कोई,
              उड़ा देते नींद मेरी,बढ़ा देते प्यास हो
इसतरह से आओ अब वापस कभी ना जा सको,
            रूबरू अहसास तुम्हारा करूं  मैं  रात दिन
अब तो शिद्दत हो गयी है,तुम्हारे इन्तजार की,
           आओ ना आजाओ बस  अब ,मन लगे ना आप बिन

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'

सीताफल

सीताफल

बाहर से कितनी आँखे पर बंधे हुए हम ,
बहुमुखी प्रतिभा वाला है यक्तित्व हमारा
हरेक आँख का अपना गूदा ,अपनी गुठली ,
किन्तु साथ है,तब ही है अस्तित्व हमारा
भीतर से हम मीठे है ,स्वादिष्ट ,रसीले,
बाहर हरे भरे ,आकर्षक दिखलाते है
सीताजी जैसे नाजुक हम सीताफल है,
भरी शराफत,तभी शरीफा कहलाते है
सीताफल जैसा ही भारत देश हमारा ,
अलग अलग है धर्म,आस्था अलग अलग है
किन्तु साथ में बंधे हुए है ,इक दूजे से,
मीठे और शरीफ ,चाहता सारा जग है
घोटू

सीताफल     बाहर से कितनी आँखे पर बंधे हुए हम ,   बहुमुखी प्रतिभा वाला है यक्तित्व  हमारा   हरेक आँख का अपना गूदा ,अपनी गुठली ,  किन्तु साथ है,तब ही है अस्तित्व हमारा   भीतर से हम मीठे है ,स्वादिष्ट ,रसीले,  बाहर हरे भरे ,आकर्षक दिखलाते है   सीताजी जैसे नाजुक हम सीताफल है,  भरी शराफत,तभी शरीफा कहलाते है   सीताफल जैसा ही भारत देश हमारा ,  अलग अलग है धर्म,आस्था अलग अलग है   किन्तु साथ में बंधे हुए है ,इक दूजे से,  मीठे और शरीफ ,चाहता सारा   जग है   घोटू
सीताफल
बाहर से कितनी आँखे पर बंधे हुए हम ,
बहुमुखी प्रतिभा वाला है यक्तित्व हमारा
हरेक आँख का अपना गूदा ,अपनी गुठली ,
किन्तु साथ है,तब ही है अस्तित्व हमारा
भीतर से हम मीठे है ,स्वादिष्ट ,रसीले,
बाहर हरे भरे ,आकर्षक दिखलाते है
सीताजी जैसे नाजुक हम सीताफल है,
भरी शराफत,तभी शरीफा कहलाते है
सीताफल जैसा ही भारत देश हमारा ,
अलग अलग है धर्म,आस्था अलग अलग है
किन्तु साथ में बंधे हुए है ,इक दूजे से,
मीठे और शरीफ ,चाहता सारा जग है
घोटू

Wednesday, September 24, 2014

              कमजोरी (A )
बहुत दिन में वो मिले ,हमने कहा,तुम हे कहाँ,
        लग रहे बीमार से ,मुख पर उदासी  छा गयी
न बोला कुछ दिनों को ,गए हम 'थाईलैंड' थे,
        'थाइराइड' से वहां  पर ,कमजोरी है आ गयी

                    राज-मस्ती का (A )
मस्तियाँ मन में हिलोरें ले रही है ,
                  प्यार का सागर उछालें भर रहा है
न बसंती रुत न सावन का महीना ,
                  आज मन इतना प्रमुदित क्यों हुआ है
तड़फता है आज को ये मन मिलन को,
                  पिय मिलान का आज मन में जलजला है
ओह!अब समझे ,पजामे में हमारे , 
                  उनके पेटीकोट का नाड़ा डला है
      
घोटू            

   
             
          शरारती कविता (A )

एक दिन उनकी ब्रा का हुक ,मेरे बनियान से बोला ,
               कहा ,होते बड़े ही बेरहम ये हुस्नवाले है
सुबह से शाम तक हम करते है मेहनत कुली जैसे,
        बोझ उनकी जवानी का ,सदा रहते संभाले है
कभी उनके उभारों को,ढलकने हम नहीं देते ,
       तभी जलवा जवानी का,लोग  सब देख लेते  है
नज़र है सबकी ललचाती ,उन्हें पाने को है लेकिन,
      मिलन की घड़ियों में हमको,खोल कर फेंक देते है
गुफ्तगू ,सुन रहा था उनके पेटीकोट का नाड़ा ,
       कहा भैया है जो भी तुम,बड़े तक़दीरवाले  हो
सदा चिपके तो रहते हो,बदन पे उनके नाजुक से ,
       तरसते लोग छूने को ,और तुम रहते सम्भाले हो
हमारी ओर देखो क्या ,तुम्हे बदमाश दिखते हम,
      हमें जो बाँध कर के सारा दिन ही है रखा  जाता
कमर के नीचे या ऊपर ,न जाने की इजाजत है,
      मिलन में,खोल कर के फेंक हमको है दिया जाता 
रात दिन करते पहरेदारी उनकी लाज की हम है ,
       बुरी नज़रों से दुनिया की ,उन्हें महफूज है  रखते
 भला दुनिया में हम से बढ़,कौन सा होगा  बदकिस्मत,
      मज़ा ले लेती है दुनिया ,मगर हम छू नहीं सकते

घोटू