Saturday, May 7, 2016

                  परिवर्तन

साथ उमर के आया इतना परिवर्तन है ,
               हुई सूर्य की ऊर्जा ,चंदा की  शीतलता
धीरे धीरे ओज बदन का हुआ पलायन ,
            और हो गयी गुम सारी मन की चंचलता
 जिसे कभी घेरे रखती ,सुंदर ललनाये ,
             कई व्याधियों ने उस तन को घेर रखा है
उस जिव्हा को मिले खिचड़ी,दलिया खाने ,
            जिसने हरदम पकवानो का स्वाद चखा है 
बार बार करवट ले उनसे लिपटा करना ,
                याद बहुत आती वो रातें मधुर नेह की
बार बार उठ ,लगुशंका के निस्तारण को ,
                    जाने वाली रातें है, अब मधुमेह की
जो था कभी दमकता यौवन की कांति से,
                वह  कृषकाय शरीर ,झुर्रियों का पिंजर है
ज्योतिर्मय नयनो  पर मोटा सा चश्मा है,
               और दांत कितने ही,साथ छोड़ बाहर है 
कलुषित सारे कर्म,केश से श्वेत हो गए,
               अब तो स्मरण करते केवल रामनाम है
स्वर्ण हो गया ,रजत सूर्य ढलने के पहले ,
                  व्याप्त हो रही है शीतलता ,अविराम है
 थी कमनीय,कभी जो काया ,कहाँ खोगई ,
             अब खाते कम ,पचता कम,दिखता भी कम है
बची बहुत कम साँसें ,कम है दिन जीवन के ,
                 हाय बुढ़ापे  ,तूने कितने  , दिये   सितम  है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'               
                       छत

याद गाँव के घर आते जब ,हर एक घर पर छत होती थी
सर्दी ,गर्मी  हो  या  बारिश, हर  ऋतु  मे ,राहत  होती थी
जहां रोज सूरज की किरणे, अठखेलियां किया करती थी
शीतल ,मंद हवाएं अक्सर ,सुबह कुलांचे आ भरती  थी
बारिश की पहली रिमझिम में,यहीं भीज ,नाचा करते थे
और गर्मी वाली रातों में ,सांझ ढले ,बिस्तर  लगते थे
जहां मुंडेर पर बैठ सवेरे ,कागा देता था सन्देशा
करवा चौथ,तीज के व्रत में ,चाँद देखते ,वहीँ हमेशा
दिन में दादी,अम्मा,चाची ,बैठ यहां पंचायत करती
गेहूं बीनती,दाल सुखाती ,दुनिया भर की बातें करती
घर के धुले हुए सब कपड़े ,अक्सर ,यहीं सुखाये जाते
उस छत पर  मैंने सीखा ,कैसे नयन लड़ाये  जाते
सर्दी में जब खिली धूप में ,तन पर मालिश की जाती थी
तभी पड़ोसन ,सुंदर लड़की ,बाल सुखाने को आती थी
नज़रों से नज़रें मिलती थी ,हो जाता था नैनमटक्का
और इशारों में होता था ,कही मिलन का ,वादा पक्का
कभी लड़ाई,कभी दोस्ती,कितने ही रिश्ते जुड़ते थे
और यहीं से पतंग उड़ाते ,आसमान में हम उड़ते थे
किन्तु गाँव को छोड़ ,शहर जब,आया कॉन्क्रीट जंगल में
छत तो मिली,मगर छत का सुख ,नहीं उठा पाया पल भर मैं
मेरी छत,कोई का आंगन,उसकी छत पर कोई का घर
मुश्किल से सूरज के दर्शन ,खिड़की से हो पाते ,पल भर
बहुमंजिली इमारतों का ,ऐसा जंगल खड़ा हो गया
हम पिंजरे में बंद हो गए ,छत का सब आनंद खो  गया

मदन मोहन बाहेती'घोटू'  


      मै खाउं ठंडी हवा,धूप तुम खाओ

इस मंहगाई में ,ऐसे पेट भरे हम ,
   मै खाऊं ठंडी हवा ,धूप  तुम खाओ
मै पीयू गम के घूँट ,पियो तुम गुस्सा ,
    जैसे तैसे भी अपनी प्यास बुझाओ
हम नंगे क्या नहाएंगे,क्या धोएंगे
छलका अश्रुजल ,सौ आंसू राएंगे
मै तेरे ,  तू मेरे   आंसूं  पी लेना
जी लगे ना लगे ,बस यूं ही जी लेना
मै नकली हंसी ओढ़ कर खुश हो लूँगा ,
तुम मुख पर, फीकी हंसी लिए मुस्काओ
इस मंहगाई में ऐसे पेट भरे हम,
मै खाउं ठंडी हवा ,धूप तुम खाओ
ऐसी होती यह आश्वासन की रोटी
कितनी ही खालो,भूख नहीं कम होती
वादों की बरसातें कितनी बरसे
जनता बेचारी पर प्यासी ही तरसे
मै खाकर  के ,ख्याली पुलाव जी लूँगा,
तुम झूंठे सपनो की बिरयानी खाओ
इस मंहगाई में ऐसे पेट भरे हम,
मै खाऊं ठंडी हवा,धुप तुम खाओ

मदन मोहन बाहेती'घोटू' 

Saturday, April 30, 2016

              ये दिल मांगे मोर 

हमने सारी उमर बिता दी ,करने में 'टू प्लस टू 'फोर '
जितना ज्यादा इसको मिलता ,उतना 'ये दिल मांगे मोर '
पहले पैदल ,बाद सायकल ,फिर स्कूटर,मोटरकार
ज्यों ज्यों करते रहे तरक्की ,त्यों त्यों बदला ये संसार
पहले 'सेकण्ड हेंड'मारुति,फिर 'टोयोटा' मर्सिडीज '
जैसे जैसे  पैसा आया ,'स्टेंडर्ड' में ,थी 'इनक्रीज '
छोड़ा गाँव,शहर आये थे ,लिया किराए ,एक मकान
और बाद में फ्लेट खरीदा ,अब बंगला है आलिशान
बदल गया परिवेश,हमेशा ,रहे  दिखाते   झूंठी शान
मंहगा सूट पहनते बाहर ,अंदर फटा हुआ बनियान
बाहर इन्सां ,कितना बदले ,अंदर बदल न पाता है
सब कुछ होता ,देख पराई,पर फिर भी ललचाता है
तुमने कभी नहीं सोचा ये ,नित इतनी खटपट करके
काली पीली करी कमाई , रखी तिजोरी में भरके
नहीं तुम्हारे काम आएगी,तुम्हारी  सारी  माया
जाता खाली हाथ आदमी ,खाली ही हाथों आया
बाहर का परिवेश न बदलो,अंतर्मन  बदलाओ तुम
प्रभु ने अगर समृद्धि दी है ,थोड़े पुण्य  कमाओ  तुम
क्योंकि एक यही पूँजी जो जानी साथ तुम्हारे  है
रिश्ते नाते ,धन और  दौलत ,यहीं छूटते सारे है
मेरा ये है,मेरा वो है ,जितनो  के गुण  गाओगे
जीर्णशीर्ण जब होगी काया ,फूटी आँख न भाओगे
दीन दलित की सेवा में तुम,हो देखो ,आनंद विभोर
वर्ना जितना इसको मिलता ,उतना'ये दिल मांगे मोर '

 मदन  मोहन बाहेती'घोटू'


विवाह की वर्षग्रन्थी पर

मिलन का पर्व है ये ,आज बंधा था बंधन ,
ऐसा लगता है जैसे बात कोई हो कल की
बड़ी शर्माती तुम सिमटी थी मेरी बांहों में,
भुलाई जाती नहीं ,यादें सुहाने पल  की
तुम्हारे आने से ,गुलजार हुआ ये गुलशन,
बहारें छा गई,रंगीन  हुआ हर मौसम ,
बड़ा खुशहाल  हुआ,खुशनुमा मेरा जीवन,
मिली है जब से मुझे ,छाँव  तेरे आंचल की  

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Thursday, April 28, 2016

   'जस्य नारी पूज्यन्ते '

मेरा एक यार है
जो अपनी पत्नी से करता तो बहुत प्यार है
पर कभी भी ,अपने प्यार का प्रदर्शन नहीं करता
बीबी को है टाइट रखता
हमेशा रौब दिखलाता है
बेचारी का दिल जलाता है
एक दिन मैंने पूछ लिया यार
तू  भाभीजी से करता है इतना प्यार
तो सबके सामने ,
क्यों करता है एसा कटु व्यवहार
क्यों इस तरह से उसे रहा है सता
क्या तुझे नहीं पता
'जस्य नारी पूजयन्ते ,रमन्ते तत्र देवता '
पत्नी की पूजा कर , देवता आएंगे
तेरे घर को स्वर्ग बनाएंगे
मित्र बोला,बस बस ,ये ही तो कारण है
जिसकी वजह से ,
तुम्हारी भाभी को पूजने का ,
नहीं होता मेरा मन है
मै चाहता देवता आएं
मेरे घर के आसपास मंडराएं
क्योंकि स्वर्ग की अप्सराओं ने ,
उन्हें इतना दिया है बिगाड़
हमेशा मौके की तलाश में ,
ढूंढते  रहते है जुगाड़
और उनका राज इंद्र तो ख़ास
है एक नंबर का बदमाश
गौतम ऋषि का रूप धर ,
अहिल्या को भरमाया
बेचारी को श्राप से ,पत्थर की शिला बनाया
मै ,पत्नी को पूजूँगा तो ये,
 मेरे घर के आसपास करेंगे विचरण
मै ऐसे मनचलों को,क्यों दूँ  निमंत्रण
बड़े आशिक़ मिज़ाज़ है ये सारे के सारे
और मै  नहीं चाहता ,
मेरी बीबी पर कोई लाइन मारे

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
        पत्नीजी का ब्यूटी ट्रीटमेंट
                      १
 मैंने पत्नी से कहा  ,तुम हो यार  गुलाब
पर रहती हो चिड़चिड़ी ,लगता बड़ा खराब
लगता बड़ा खराब ,पलट कर बोली   पत्नी
हंसमुख ,खुश जो रहती,हो जाती है हथिनी
मेरा चिडचिड करना ,तुमको लगता तीखा
पर स्लिम रहने का मेरा है यही  तरीका

पत्नी  अपनी  थी तनी ,उसे मनाने यार
हमने उनसे कह दिया ,गलती से एक बार
गलती से एक बार ,लगे है हमको प्यारा
गुस्से में दूना निखरे  है रूप   तुम्हारा  
कह तो दिया मगर अब घोटू कवि रोवे है
बात बात पर वो जालिम , गुस्सा होवे  है

घोटू