Saturday, May 28, 2016

            क्या सोचेंगे लोग

सोच कभी मत मन में लाना,क्या सोचेंगे लोग
नहीं सोच कर ,ये घबराना ,क्या सोचेंगे  लोग
लोगों की तो आदत ही है, टोका  करते  है,
अच्छा बुरा करो कुछ भी ,तुमको टोचेंगे  लोग 
खाना अपने ढंग से खाओ ,जैसे भाता  हो,
वर्ना भूखे रह जाओगे  ,क्या सोचेंगे   लोग
नहीं भरोसा ,कभी किसी का,मतलब के सब यार,
जब भी मौका ,जिसे मिलेगा ,आ नोचेंगे लोग
जनमदिवस की खुशियां हो या मरने का गम हो,
अगर मुफ्त की दावत है तो ,आ पहुंचेंगे  लोग
अपनी ऊँगली ,उसे थमाना ,जो इस काबिल हो,
वर्ना ऊँगली से पोंची तक ,जा पहुंचेंगे  लोग
भला बुरा सब किस्मत के ही बस में  होता है,
हरेक बात में तुम्हारी ,गलती खोजेंगे  लोग

मदन मोहन बाहेती 'घोटू'
 
        मन को खलता है

पास पास बैठें ,पर चुपचुप ,मन को खलता है
हाथ न जिसके कुछ आता ,हाथों को मलता है
यूं तो तन के ,एक कोने में ,धक धक करता है,
पर जब जिद पर आजाता दिल ,बहुत मचलता है
दुबली पतली तीली का मुंह,यूं   ही, काला   है ,
तो माचिस से ,टकराने  पर ,वो क्यों जलता है
नित नित ,झाग झाग हो साबुन ,जीवन  जीता है,
साफ़ दूसरों को  करता ,खुद तिल तिल  गलता है
 जलती हुई आग की ज्वाला ,भी बुझ जाती है,
शीतल शीतल ,जल का जादू,सब पर चलता है
रोज मुसाफिर ,आते जाते ,रात  बिताते  है ,
जग ,होटल के बिस्तर सा है,नहीं बदलता है
अलग मान्यता,अलग अलग ,जगहों पर होती है ,
पूजा जाता कहीं,कहीं पर ,रावण जलता  है
कंकरीले,पथरीले पथ पर ,ठोकर लगती है ,
एक बार जो गिर जाता है ,वही संभलता है
डंडे से यदि जो अनुशासन ,आये ,लाएंगे ,
हमको सोच बदलनी होगी ,सब कुछ चलता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Friday, May 27, 2016

   आदत बिगाड़ दी हमने

उनके चेहरे पे निगाह ,अपनी गाढ  दी हमने
हुस्न के उनकी और  ,रंगत  निखार दी हमने
उनके  गालों के गुलाबों  को  थोड़ा सहलाया ,
उनकी उलझी हुई ,जुल्फें संवार  दी  हमने
उनके बहके थे कदम,डगमगा के गिर न पड़ें ,
थामने  उनको  थी,बाहें  पसार दी हमने
उनकी हाँ में हाँ करी ,और ना में ना बोला ,
हम पे इल्जाम है,आदत बिगाड़ दी  हमने
हुस्न के उनकी जो ,तारीफ़ के दो  कहे ,
लोग कहते है कि  किस्मत सुधार दी हमने
देखते  देखते हर और खबर फ़ैल गयी ,
प्यार की दौड़ में तो बाजी मार ली हमने

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

             अच्छा लगता है
कभी किसी पर,दिल आना भी ,अच्छा लगता है
सपनो  से ,मन बहलाना भी ,अच्छा  लगता है
वो जब गिरते हुए थामते ,अपनी बाहों में  ,
कभी कभी ठोकर खाना भी ,अच्छा लगता है
एक तरह का खाते  खाते  ,  मन उकताता है ,
कभी कभी  होटल जाना भी ,अच्छा लगता है
जब मन करता ,अपनी मरजी ,जी लें कभी कभी,
बीबी का मइके जाना भी ,अच्छा  लगता  है
अपने हाथों ,यदि वो पोंछें ,अपने आंचल से ,
तो कुछ आंसू ढलकाना भी ,अच्छा लगता है
फ़िल्मी गाने ,सुनते सुनते ,जब मन भरता है,
कभी कभी ,पक्का गाना भी ,अच्छा लगता है    
जब अपनी तारीफें सुन सुन ,वो इतराते है ,
उनका ऐसे इतराना भी ,अच्छा लगता है
दिन भर करके काम ,थके हम जल्दी सोते है,
पत्नी का मीठा ताना भी,अच्छा लगता  है
यही सोच कर ,साथ हूर का ,होगा जन्नत में,
कुछ लोगों को ,मर जाना भी ,अच्छा लगता है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'


Wednesday, May 25, 2016

               मै पानी हूँ 

भरे सरोवर में ,मै मीठा ,और विशाल सागर में खारा
कभी छुपा गहरे कूवे में,कभी नदी सा बहता  प्यारा
कभी बादलों में भर उड़ता,कभी बरसता,रिमझिम,रिमझिम
गरमी में मै भाप जाऊं बन,सर्दी में बन बरफ जाऊं जम
मै धरती की प्यास बुझाता ,बीजों को मै करता विकसित
सत्तर प्रतिशत ,तन मानव का ,मुझसे ही होता है निर्मित
मैं  पानी  हूँ, बूँद  बूँद  में ,मेरी  जीवन  भरा  हुआ  है
मुझसे ही दुनिया का कानन ,फला ,फूलता हरा हुआ है
नहीं मिला यदि जो पीने को ,तुम प्यासे ही ,मर जाओगे
मैंने अन्न नहीं उपजाया ,कुछ न मिलेगा ,क्या खाओगे
शुद्ध रखो,मुझ को संरक्षित ,तो आबाद तुम्हे कर दूंगा
यदि मुझको बरबाद करोगे ,तो बरबाद तुम्हे कर दूंगा

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
         नदिया से

दौड़ समंदर से मिलने ,मत जा री नदिया
वरना  तू भी ,हो  जाएगी ,खारी  नदिया
निकल पहाड़ों से जंगल को कूदी,फांदी ,
कल कल करते,चलते चलते, हारी नदिया
जिसमे नहा ,पवित्र हो रहे ,जिसे पूजते,
हम मूरख ,हमने गन्दी कर डाली नदिया
सबका गंदापन ,सीने में रखे दबाये ,
बहती जाती,क्या करती ,बेचारी नदिया
जब जन्मी थी ,दुबली पतली ,प्यारी सी थी,
साथ समय के ,फैल गई ,दुखियारी नदिया
इसकी बिजली,बाँध ,बाँध लोगो ने छीनी ,
पर न पड़ी कमजोर ,न हिम्मत हारी नदिया
पिया मिलन की आस लगाए भाग रही है ,
सागर उर में,समा जायेगी ,प्यारी नदिया

मदन मोहन बाहेती'घोटू'
 मंहगाई का त्रास

बहुत मंहगा हो गया हर ग्रास अब  है
हो रहा  मंहगाई का अहसास  अब है
बिकता पानी बंद होकर  बोतलों में ,
बहुत मंहगी हो गई ये प्यास अब है
दाल मोतीचूर से भी अधिक  मंहगी,
सब्जियों ने भी मचाया  त्रास अब है
अरसे से हमने नहीं ली है डकारें ,
पेट ये पिचका बिचारा ,पास अब है
अंतड़ियां ये पूछती है ,क्या पचाएं ,
क्या चबाएं ,पूछते  सब  दांत अब है
भूखे रह कर ,सूखते ही जा रहे है ,
हो रहा ,अकाल का आभास अब है
बादलों ,बरसो ,धरा को तृप्त करदो,
एक तुम ही से बची कुछ आस अब है

मदन मोहन बाहेती'घोटू'