Sunday, January 22, 2017

खराब मौसम

जब कभी भी ये मौसम खराब होता है
अपने हाथों में तो जाम ए शराब होता है
क्योंकि कहते है उसे काटता नहीं जूता ,
जो कि पैरों में ,पहने  जुराब  होता है
ठिठुरती सर्दियों में नींद आती मुश्किल से ,
चैन से  सोता ,जो ओढ़े लिहाफ होता है
चांदनी रोज कहाँ,एक दिन अमावस को,
न जाने गुम कहाँ ,वो आफताब  होता है
हजारों हसरतें होती सभी की दुनिया में,
नहीं पूरा किसी का ,हरेक ख्वाब होता है
एक दो चार ही अम्बानी ,बिरला बनते है,
मेहरबां अल्ला न ,सब पर जनाब होता है
कभी इठलाता जो जुल्फों में हुस्न की सजकर ,
 कभी मैयत में वो बिखरा  गुलाब होता  है
आज तो जी लें,मरेंगे तो देखा जाएगा ,
कयामत को तो सभी का हिसाब होता है

मदनमोहन बाहेती'घोटू'          
बूढा आशिक़

बूढा आशिक़ लोग कहते है मुझे ,
क्या बुढापे में न होती आशिक़ी
कुलबुलाता अब भी कीड़ा इश्क़ का ,
जवानी की उम्र ,जब कि  जा चुकी
क्या जवानों ने ही है लेकर रखा ,
आशिक़ी का ठेका ,बूढ़े कम नहीं
बूढ़े सीने में भी है दिल धड़कता,
बूढ़े तन में ,होता है क्या दम नहीं
दिल तो दिल है,बूढा हो या हो जवां ,
जाने किस पर,क्या पता,आजाय कब
लोग कहते ,छोडो चक्कर इश्क़ का ,
इस उमर में,राम का लो ,नाम  अब
राम को  भी  जो करेंगे याद  हम,
इश्क़ होगा वो भी सच्चा राम से
उम्र कुछ भी हो ,न लेकिन छूटती ,
इश्क़ की आदत  कभी ,इंसान से

घोटू 
घोड़ी पर बैठने की सजा

रहती सवार सर पे,हरदम है बीबीजी ,
सेवा में दौड़ दौड़ ,हुआ जाता पतला हूँ
जिद करते बच्चे की ,घोडा बनो पापाजी,
बिठा पीठ पर उनको,घुमा रहा,पगला हूँ
गृहस्थी की गाडी में ,जुता हुआ हूँ जबसे ,
घरभर का बोझा मैं ,उठा रहा सगला हूँ
गलती से एकबार ,घोड़ी पर क्या बैठा ,
घोडा बन बार बार,चूका रहा बदला हूँ

घोटू
पचहत्तरवें जन्मदिन पर

सही हंस हंस, उम्र की हर पीर मैंने 
नहीं खोया ,मुसीबत में , धीर मैंने
भले  ही हालात अच्छे थे या  बदतर
इस तरह मैं पहुंच पाया हूँ  पिचहत्तर
सदा हंस कर गले सबको ही लगाया
जो भी था कर्तव्य,अपना सब निभाया
खुले हाथों ,खुले दिल से प्यार बांटा
मुस्करा कर हर तरह का वक़्त काटा
धूप में भी तपा और सर्दी में ठिठुरा
बारिशों में भीग कर मैं और निखरा
तभी खुशियां मुझे हो पायी मय्त्सर
इस तरह मै पहुँच पाया हूँ  पिचहत्तर
प्रगति पथ पर ठोकरें थी,छाँव भी थी
मुश्किलें और मुसीबत हर ठाँव भी थी
गिरा,संभला ,फिर चला या डगमगाया
दोस्तों  ने   होंसला  भी  था  बढाया
मिले निंदक भी कई तो कुछ प्रशंसक
करी कोशिश डिगाने की मुझे भरसक
राह  मेरी ,रोक वो पाए नहीं ,पर
इस तरह मैं पहुँच पाया हूँ पिचहत्तर 
साथ मेरे धीर भी था,धर्म भी था
माँ पिता का किया सब सत्कर्म भी था
दुश्मनो ने भले मेरी  राह रोकी
भाई बहनो और सगो ने पीठ ठोकी
निभाने को साथ जीवनसंगिनी थी 
दोस्तों की दुआओं की ना कमी थी
साथ सबने ही निभाया आगे बढ़कर
इसलिए मै पहुँच पाया हूँ पिचहत्तर
अभी तक कम ना  हुई है महक मेरी
वो ही दम है ,खनखनाती चहक मेरी
किया हरदम कर्म में विश्वास मैंने 
सफलता की नहीं छोड़ी आस मैंने
लीन रह कर ,प्रभु  की आराधना में
जुटा ही मैं रहा जीवन साधना में
प्रगतिपथ पर ,अग्रसर था,उत्तरोत्तर
इसलिए मैं पहुँच पाया हूँ पिचहत्तर
तपा हूँ,तब निखर कर कुन्दन बना हूँ
महकता हूँ,सूख कर चन्दन बना हूँ
जाने अनजाने बुरा कुछ यदि किया हो
भूल से  यदि हो गयी कुछ गलतियां हो
निवेदन करबद्ध है ,सब क्षमा करना
प्रेम और शुभकामनाएं ,बना रखना
प्यार सबका ,रहे मिलता  ,जिंदगी भर
इसलिए  मैं पहुँच पाया हूँ पिचहत्तर
तीन चौथाई उमर तो कट गयी  है
रास्ते की मुश्किलें सब हट गयी है
भले ही तन में नहीं वो जोश बाकी
मगर अब भी चल रहा हूँ, होंश बाकी
वक़्त के संग भले जो मैं जाऊं थक भी
कामना है करूंगा ,पूरा शतक भी
पार  करना है  मुझे यह भवसमन्दर
इसलिए मैं पहुँच पाया हूँ पिचहत्तर

मदनमोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, January 21, 2017

ग्रहों का खेल 

कहते है कि आदमी का भाग्य सारा ,
                   नवग्रहों का खेल ये कितना गजब है 
सिर्फ नौ ,बारह घरो की कुंडली में,
                   अपने क्रम से घूमते रहते ही सब  है
 कोई बैठा रहता है कोई के घर में  ,
                 और किसी की किसी के संग दुश्मनी है 
कोई सा ग्रह भाग्य के स्थान पर है ,
                     देखता  पर वक्रदृष्टी से  शनि है
 शुक्र गुरु मिल लाभ के स्थान पर है ,
                       शत्रु के स्थान पर राहु डटा  है 
कर रहा मंगल किसी का है अमंगल ,
                    और किसी का सूर्य केतु से कटा है 
है उदय का ग्रह कोई तो अस्त का है,
                   और किसी का नीच वाला चन्द्रमा है 
और कहीं पर बुध बैठा स्वग्रही बन 
                    अजब सा व्यवहार सबका ही बना है 
सबकी अपनी चाल होती,घर बदलते ,
                   कोई किस से मिल अजब संयोग देता
शत्रु के घर ,मित्र ग्रह रहते कई दिन ,
                     कोई सुख तो कोई प्रगति रोक देता 
सिर्फ नौ ग्रह,रह न पते मगर टिक कर ,
                    जब कि है उपलब्ध बारह घर यहां पर
एक दूजे के घरों में  घुसे रहते, 
                जब कि सबका ,अपना अपना है वहां घर 
मित्र कोई है किसी का, कोई  दुश्मन 
                            चाल अपनी चलते ही रहते है हर दिन 
तो बताओ ,इतने सारे लोग हम तुम,
                       दोस्त बन ,संग संग रहे,क्या है ये मुमकिन 
हम करोड़ों लोग है  और  कई बेघर ,
                          भटकने का सिलसिला ये रुका  कब है 
 कहते है कि आदमी का भाग्य सारा ,
                             नौ ग्रहों का खेल ये कितना अजब है 

मदनमोहन बाहेती 'घोटू'

Friday, January 20, 2017

क्या पता 

कौन की किससे निभेगी,क्या पता 
कौन की   गुड्डी  उड़ेगी,क्या पता 
आज मिल कर उड़ाने आये सभी,
पर पतंग किस की कटेगी.क्या पता 
कुछ धरम की,कुछ का मंजा जात का 
और किसी ने ले लिया संग हाथ का 
बेटे ने ही बाप की जब काट दी ,
पप्पू की कैसे बचेगी, क्या पता 
कौन जाने , किसका  मंजा तेज है 
और किसका,किससे लड़ता पेंच है
 ढील देकर कौन किसकी काट दे,
और फिर किसकी बचेगी.क्या पता 
बहनजी ने सब पतंगे बेच दी 
डोर लेकिन हाथ में अपने रखी
भारी है कुछ ,उड़ने में असमर्थ है,
पर लगा ,फिर भी उड़ेगी ,क्या पता  
बाहुबलियों की पतंगे ,चन्द है 
नोटबन्दी  ने किया सब बन्द है 
अब तो शाही पतंगे ,आकाश में,
बचेगी या फिर उड़ेगी ,क्या पता 

मदन मोहन बाहेती'घोटू'

Saturday, January 14, 2017

जीवन क्रिकेट 

इस जीवन क्रिकेट के पिच पर ,
खेल रहे हम सभी खिलाड़ी 
सबकी अपनी अपनी क्षमता ,
कोई सिख्खड़ ,कोई अनाड़ी 
मै भी जब इस पिच पर उतरा ,
था नौसिखिया ,सभी सरीखा 
हाथों में गिल्ली डंडा ले,
पहला खेल उसी से सीखा 
धीरे धीरे बड़ा हुआ तो ,
ये क्रिकेट सी दुनिया देखी 
तब ही सीखा बेट पकड़ना ,
और बॉल भी तब ही फेंकी 
जब से बेट हाथ में आया  ,
मैंने अपना हुनर दिखाया 
बचा विकेट ,रन लिए मैंने,
थोड़ा मुझे खेलना आया 
धीरे धीरे रन ले लेकर , 
कभी शतक भी मैं जड़ पाया 
  कभी एलबीडब्ल्यू आउट ,
कभी कैच मैंने पकड़ाया 
कभी बॉल संग छेड़छाड़ के ,
लोगों ने इल्जाम लगाए 
कितनी बार अपील करी कि,
मैं आउट हूँ,वो चिल्लाये 
कभी रेफरी ने सच देखा,
कभी तीसरे अम्पायर ने 
किन्तु खेल को पूर्ण समर्पित ,
टिका हुआ अब भी पिच पर मैं 
हारा ,लोगो ने दी गाली,
जीता तो बिठलाया काँधे
पर मैंने धीरज ना खोया,
डिगे न मेरे अटल इरादे 
स्पिन गुगली बॉलिंग करके ,
खूब दिये लोगों ने  धोखे 
लकिन जब भी पाए मौके ,
मैंने मारे ,छक्के,चौके 
धीरे धीरे रहा खेलता ,
आपा ना खोया,धीरज धर 
अपना ध्यान खेल पर देकर 
जमा हुआ हूँ अब भी पिच पर 
पांच दिवस के टेस्ट मैच के ,
चार दिवस तो बीत गए है 
अब तक का स्कोर देख कर ,
लगता है हम जीत गए है 

मदनमोहन बाहेती 'घोटू '