Monday, September 17, 2018

आओ ,यादें ओढ़े 

आयी शीत ऋतु  जीवन की ,यूं ना बदन सिकोड़े 
जीवन में ले  आये ऊष्मता ,आओ  यादें   ओढ़ें 
पहली पहली बारिश में फिर उछल कूद कर भीगे ,
बहती नाली में कागज की किश्ती, फिर से छोड़े 
यह जीवन का अंकगणित है लंगड़ी भिन्न सरीखा ,
अबतक जो भी घटा,भाग दे ,.कई गुना कर जोड़े  
जाने क्या क्या सपने देखे ,थे हमने  जीवन में ,
पूर्ण हुए कुछ ,किन्तु अधूरे है अब तक भी थोड़े
अपनी मन मरजी करते है ,नहीं हमारी सुनते ,
बड़े हो गए  बच्चे ,कैसे उनके कान मरोड़े 
जबसे पंख निकल आये है ,उड़ना सीख गए है ,
सबने अपने नीड़ बसाये ,तनहा हमको छोड़े 
नहीं किसी से ,कभी कोई भी रखें अपेक्षा मन में ,
हमें पता है पूर्ण न होगी ,क्यों अपना दिल तोड़े 
जीवन की आपाधापी में रहे हमेशा उलझे ,
बहुत अभी तक सबके खातिर ,इतने भागे दौड़े
भुगत गयी सब जिम्मेदारी ,अब ही समय मिला है,
आओ खुद के खातिर जी लें ,दिन जीवन के थोड़े 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 

 

         मोदी जी के जन्मदिन पर 

आज विश्वकर्मा दिवस है,करें हम उनको नमन, 
      सृष्टिकर्ता ,देवता वह,सृजन का ,निर्माण का 
आज मोदी का जन्मदिन ,यह सुखद संयोग है,
      लिया है संकल्प जिसने ,देश नवनिर्माण का 
देश का 'प्रगति पुरुष'यह,बड़ी लम्बी सोच है ,
      हौसला मन में भरा है,साथ ले विज्ञान का 
 आओ हम तुम, सच्चे दिल से,करें प्रभु से प्रार्थना ,
    पूर्ण होवे स्वप्न उसका ,देश के  उत्थान का 

घोटू  

Saturday, September 8, 2018

प्रातः भ्रमण

रोज रोज,हर प्रातः प्रातः 
पति पत्नी दोनों साथ साथ 
सेहत के लिए भ्रमण करते,
हँस करते सबसे मुलाकात

कुछ प्रौढ़ और कुछ थके हुए
कुछ वृद्ध और कुछ पके हुए 
कुछ जैसे तैसे बिता रहे ,
अपने जीवन का उत्तरार्ध 
रोज रोज हर प्रातः प्रातः

कुछ रहते निज बच्चों के संग 
कुछ कभी सुखी ,कुछ कभी तंग 
एकांत समय में बतलाते ,
अपने सुख दुःख की सभी बात 
रोज रोज हर प्रातः प्रातः

कह बीते कल के हालचाल 
देते निकाल ,मन का गुबार 
हलके मन प्यार भरी बातें ,
करते हाथों में दिए हाथ 
रोज रोज हर प्रातः प्रातः

कोई प्रसन्न है कोई खिन्न 
सबकी मन स्तिथि भिन्न भिन्न 
सब भुला ,पुनः चालू करते ,
एक अच्छे दिन की शुरुवात 
रोज रोज हर प्रातः प्रातः

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '


प्रातः भ्रमण 

रोज रोज,हर प्रातः प्रातः 
पति पत्नी दोनों साथ साथ 
सेहत के लिए भ्रमण करते,
हँस करते सबसे मुलाकात

कुछ प्रौढ़ और कुछ थके हुए
कुछ वृद्ध और कुछ थके हुए 
कुछ जैसे तैसे बिता रहे ,
अपने जीवन का   उत्तरार्ध 
रोज रोज हर प्रातः प्रातः 

कुछ रहते निज बच्चों के संग 
कुछ कभी सुखी ,कुछ कभी तंग 
एकांत समय में बतलाते ,
अपने सुख दुःख की सभी बात 
रोज रोज हर प्रातः प्रातः 

कह बीते कल के हालचाल 
देते निकाल ,मन का गुबार 
हलके मन प्यार भरी बातें ,
करते हाथों में दिए हाथ 
रोज रोज हर प्रातः प्रातः 

कोई प्रसन्न है कोई खिन्न 
सबकी मन स्तिथि भिन्न भिन्न 
सब भुला ,पुनः चालू करते ,
एक अच्छे दिन की शुरुवात 
रोज रोज हर प्रातः प्रातः 


मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 
 

Thursday, September 6, 2018


              अलग अलग मापदंड 

सत्तासीनों का दम्भ ,रौब ,स्वाभिमान हमारा,  है  घमंड 
अलग अलग लोगों खातिर ,क्यों अलग अलग है मापदंड 

कान्हा माखनचोरी करते ,वो बचपन क्रीड़ा  कहलाती 
हम करें जरा सी भी चोरी ,तो जेल हमे है  हो जाती 
वो गोपी छेड़े ,चीर हरे ,तो वह होती उसकी लीला 
हम वैसा करें मार डंडे ,पोलिस  कर देती है ढीला 
उनके तो है सौ खून माफ़ ,हम गाली भी दें ,मिले दंड 
अलग अलग लोगो खातिर क्यों अलग अलग है मापदंड

है मुर्ख ,भोगती पर सत्ता ,सत्तरूढ़ों की संताने 
हो रहे उपेक्षित बुद्धिमान ,कितने ही जाने पहचाने 
कितने लड्डू प्रसाद चढ़ते ,मंदिर में पत्थर मूरत पर 
और हाथ पसारे कुछ  भूखे ,भिक्षा मांगे मंदिर पथ पर 
कोई को मट्ठा  भी न मिले ,कोई खाता है श्रीखंड 
अलग अलग लोगो खातिर क्यों अलग अलग है मापदंड 

कोई प्रतियोगी अधिक अंक ,पाकर भी जॉब नहीं पाते 
कुछ वर्गों को आरक्षण है ,कुर्सी पर काबिज़ हो जाते 
लायक होने की कद्र नहीं ,जाती विशेष आवश्यक है 
कितने ही प्रतिभावानों का ,मारा जाता यूं ही हक़  है 
कोई उड़ता है बिना पंख ,कोई के सपने खंड खंड 
अलग अलग लोगों खातिर ,क्यों अलग अलग है मापदंड 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू ' 
डंडे का डर 

पहले राजे महाराजे फिर मुगल सल्तनत 
और कई वर्षों तक फिर अंग्रेजी हुकूमत 
हुए  गुलाम  बने  रहने  के इतने  आदी 
हमें कठिन हो रहा पचाना अब आजादी
इसीलिये हम आपस में ही झगड़ रहें है 
एक दूजे की टांग खींच कर पकड़ रहे है 
बात बात पर चिल्लाते है,लगते  लड़ने 
एक केंकड़ा  दूजे का  ना देता  बढ़ने 
मुश्किल से जिस आजादी का स्वाद चखा है 
हमने उसको एक मखौल बना रख्खा  है  
आसपास दुश्मन है ,विपदा कई खड़ी है 
लेकिन हमको सबको अपनी सिर्फ पड़ी है 
अपनी ढपली अपना राग पीटते हरदम 
मिल कर कभी न कोरस में कुछ गा पाते हम  
भले देश में  इतने ज्यादा  संसाधन है 
उन्हें लूट बस अपना पेट भर रहे हम है 
बात बात ,बेबात ,करें आपस में दंगे 
इस हमाम में तो हम सब के सब है नंगे 
रहा यही जो हाल अगर तो मुश्किल होगी 
कैसे हमको प्राप्त हमारी मंजिल होगी 
इतनी अधिक गुलामी खूं में बैठ गयी जम 
बिन डंडे के डर से काम न कर पाते हम 
हो डंडे का जोर तभी आता अनुशासन 
वरना इधर उधर बिखरे रहते है कण कण 
फहराता है सदा किसी का तब ही झंडा 
नीचे लगा हुआ  होता जब उसमे डंडा 

मदन मोहन बाहेती 'घोटू '   

Monday, September 3, 2018

कबड्डी का खेल-हमारा मेल 

तुमने खूब कब्बडी खेली ,
हूँ तू तू कहते तुम मेरे पाले में आये 
इसको छुवा,उसको छुवा ,
लेकिन मुझको हाथ लगा भी तुम ना पाए 
वो मैं ही थी कि जिसने आगे बढ़ कर 
रोक लिया था तुम्हे तुम्हारा हाथ पकड़ कर 
और मेरे जिन हाथों को तुम कहते कोमल 
उन हाथों ने रखा देर तक तुम्हे जकड़ कर 
हुआ तुम्हारा हू तू कहना बंद,
 और तुम आउट होकर  हार गए  थे 
लेकिन तुमने जीत लिया था मेरे दिल को ,
और तुम बाजी मार गए थे 
पर मैं जीती और तुम हारे 
स्वर्ण पदक सी वरमाला बन ,
लटक गयी मैं गले तुम्हारे 
तब से अब तक ,मेरे डीयर 
घर से दफ्तर ,दफ्तर से घर 
रोज कबड्डी करते हो तुम 
और मैं घर में बैठी गुमसुम 
रहती हूँ इस इन्तजार में 
वही पुराना जोश लिए तुम डूब प्यार में 
हूँ तू करते कब आओगे ,
और मैं कब पकड़ूँगी तुमको 
अपने बाहुपाश में कब जकड़ूँगी तुमको 
पर तुम इतने पस्त थके से अब आते हो 
खाना खाते  ,सो जाते हो 
वह चंचल और चुस्त खिलाडी फुर्तीला सा 
कहाँ  खो गया ,रोज पड़ा रहता ढीला सा 
जी करता बाहों में लेलो 
फिर से कभी कबड्डी खेलो 

घोटू